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Showing posts from May, 2017
“संस्कृति के महारथियों”, आप किनके साथ हैं? और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना                                               (हबीब जालिब) हम एक विद्रूप होते समय को उसकी तमाम विसंगतियों के साथ ढोते जा रहे हैं । हम एक ऐसे समय और समाज से होकर गुजर रहे हैं, जहाँ इन विसंगतियों पर बंद कमरे में या चाय पर चर्चा खूब जमती है । दोस्तों के साथ ड्राइंग रूम में बैठकर खूब लम्बे-लम्बे भाषण हांके जाते हैं, ऐसा लगता है मानों ये समस्याएँ अगली सुबह खत्म हो जाएंगी। लेकिन ज्यों ही हम इन सारे मुद्दों को प्रकाश में लाते हैं, ऐसा क्यों होता है कि ये सारी बातें ‘ओछी हरकत’ लगने लगती हैं? ऐसा क्यों होता है कि ये सारी बातें एक तबके को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ लगने लगती हैं ? जब भी आप इन मुद्दों को गंभीरता से उठाते हैं, ऐसा क्यों होता है कि हम यह कहकर अपना पल्ला ...