Skip to main content

Posts

Showing posts from August, 2017
"पत्र-निबंध शैली में हरिशंकर परसाई ने ‘कल्पना’ के संपादक को कई व्यंग्य आलेख लिखकर भेजे थे। साहित्य की शोध प्रक्रिया पर लिखा गया यह पत्र-निबंध, साहित्यिक शोध के स्याह पक्ष को न सिर्फ दिखाता है बल्कि उस अंधेर नगरी में भी ले जाता है जहाँ का राजा निरंकुश है" साहित्य शोध-प्रक्रिया / हरिशंकर परसाई प्रिय बन्धु,              इधर हिंदी शोध पर बहुत चर्चा हो रही है । ‘कल्पना’ में सालेक पहले श्री स. ही. वात्स्यायन (‘अज्ञेय’ जी का गद्य नाम) ने लिखा है कि शोध अलग चीज है और हिंदी शोध अलग। जैसे कई लोगों के नजरों में कविता अलग चीज है और नई कविता अलग। और अब, जल्दी ही, कहानी से नयी कहानी अलग हो रही है।             शोध का बड़ा हल्ला है। साहित्य के डॉक्टरों, कम्पाउंडरों, नर्सों और मलहम-पट्टी करनेवालों का क्रम लगा है। ऐसे में, जो शोध ना करे वह अभागा। अभागा होने से बचने के लिए मैंने भी किसी विषय पर शोध करने का इरादा एक मित्र पर प्रकट किया, तो उसने पूछा, ‘तुम्हारी दादी हैं ?’ मैंने ...