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"पत्र-निबंध शैली में हरिशंकर परसाई ने ‘कल्पना’ के संपादक को कई व्यंग्य आलेख लिखकर भेजे थे।साहित्य की शोध प्रक्रिया पर लिखा गया यह पत्र-निबंध, साहित्यिक शोध के स्याह पक्ष को न सिर्फ दिखाता है बल्कि उस अंधेर नगरी में भी ले जाता है जहाँ का राजा निरंकुश है"


साहित्य शोध-प्रक्रिया / हरिशंकर परसाई

प्रिय बन्धु,
             इधर हिंदी शोध पर बहुत चर्चा हो रही है। ‘कल्पना’ में सालेक पहले श्री स. ही. वात्स्यायन (‘अज्ञेय’ जी का गद्य नाम) ने लिखा है कि शोध अलग चीज है और हिंदी शोध अलग। जैसे कई लोगों के नजरों में कविता अलग चीज है और नई कविता अलग। और अब, जल्दी ही, कहानी से नयी कहानी अलग हो रही है।
            शोध का बड़ा हल्ला है। साहित्य के डॉक्टरों, कम्पाउंडरों, नर्सों और मलहम-पट्टी करनेवालों का क्रम लगा है। ऐसे में, जो शोध ना करे वह अभागा। अभागा होने से बचने के लिए मैंने भी किसी विषय पर शोध करने का इरादा एक मित्र पर प्रकट किया, तो उसने पूछा, ‘तुम्हारी दादी हैं ?’ मैंने कहा वो तो बहुत पहले ही सिधार गयीं। उसने कहा, ‘तुम सचमुच अभागे हो। दादी होती तो तुम आंचलिक शोध कर सकते थे।’ मैं उसकी बात समझा नहीं। आंचलिक कथा से तो मेरा परिचय है पर हिंदी में ‘आंचलिक शोध’ शोध भी होती है, यह मैं नहीं जानता था। मेरे भले मित्र ने समझाया, आंचलिक शोध यों होती है—अपनी दादी के पास बैठकर उनके अंचल के 100 गीत लिख लो। उनका वर्गीकरण कर दो—विवाह के गीत, गौने के, फाग के, धान कूटने के आदि। फिर हर गीत पर टिप्पणी कर दो। आरम्भ में एक लम्बा ‘प्राक्कथन’ लिखकर इस शोध-प्रबंध को उसी तरह रख दो जिस तरह तुलसीदास ने रामचरितमानस की पांडुलिपि हनुमानजी के हस्ताक्षर के लिए रख दी थी। अगर तुम्हारी भक्ति सच्ची है तो कोई आराध्य आचार्य रात को आकर उस पोथी पर हस्ताक्षर कर जायेंगे ! बस, तुम्हारा प्रबंध हिंदी भाषी उसी तरह गले लगा लेंगे जिस तरह हनुमान की मंजूरी के बाद रामचरितमानस को शीश चढ़ाया है। ‘डॉक्टरी’ तो तुम्हें यों ही मिल जाती। पर तुम्हारी दादी ही नहीं हैं। मुझे इस नुस्खे की जानकारी नहीं थी। मैं बहुत पछताया। पार्थना की कि हे भगवान्, किसी भी हिंदी के एम.ए. की दादी उसे पीएचडी मिलने के पहले ना मरे।
        मित्र पछताने से क्या होता है ! मैंने दूसरा विषय चुना है—‘छायावादी काव्य में नारी’। यह विषय इसलिए चुना गया है कि मुझे ‘प्रसाद’ की दो पंक्तियाँ याद हैं—‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो,विश्वास-रजत-नग पग-तल में !’ विषय तय करके मैंने छायावादी काव्यग्रंथ उठाये और उन पंक्तियों को रेखांकित करने लगा, जिनमें नारी, स्त्री, कामिनी, शुभे, सुभगे, रूपसि, प्रेयसी, सजनी, सखि, प्रिये, सुन्दरी आदि में से कोई शब्द आया हो, तभी मेरा एक अन्य मित्र आया जिसे शोध का अनुभव है। उसने कहा, ‘यह काया कर रहे हो !’ मैंने कहा, ‘क्यों? छायावादी काव्य में नारी को खोज रहा हूँ।’ उसने तरस खायी। बोला, ‘ऐसे शोध कार्य नहीं होता। तुम्हें तो शोध का अ आ नहीं मालूम। मेरे भाई तुम्हें छायावादी काव्य में नारी की शोध नहीं करना है। शोध दूसरे विषयों की होती है पर डिग्री अंत में इसी विषय पर मिल जायेगी।’ मैं चकरा गया ! आखिर वो कौन सी चीजें हैं, जिनकी शोध होगी और इस विषय में पीएचडी मिल जायेगी ! मैंने शस्त्र-समर्पण कर दिया। तब मेरे अनुभवी मित्र ने मेरे शोध-कार्य की रुपरेखा बना दी, जो शोधोत्सुक छात्रों के लाभार्थ यहाँ दे रहा हूँ—

विषय—छायावादी काव्य में नारी  

शोध कार्य की रूप-रेखा
                  आरम्भिक—(अ) ऐसे आचार्य की शोध करना जो किसी विषय का विशेषज्ञ ना हो, पर जिसके संबंध अन्य विश्वविद्यालयों में ऐसे हों कि डिग्री दिला दे। (विशेषज्ञ से दूर रहना, क्योंकि वह कष्ट देता है) । (आ) ऐसे आचार्य को निर्देशक के रूप में प्राप्त करना।

शोध-प्रक्रिया   
               
   प्रथम चरण—आचार्य की रुचियों की शोध—वे सब्जी कौन सी पसंद करते हैं, लौकी या बैगन। वस्त्र कौन से धारण करते हैं ? पान कौन सा खाते हैं ? तम्बाकू कौन-सी ? मनोरंजन का माध्यम—सिनेमा, संगीत, नाटक, निन्दा या मिथ्याभाषण?
   द्वितीय चरण—आचार्या तथा आचार्य-सन्तति की रुचियों का शोध।
              विशेष—आचार्या की ईर्ष्या-पात्रा नारियों के चरित्रों का शोध।
  तृतीय चरण—आचार्य के साहित्यिक और गैर-साहित्यिक शत्रुओं की तालिका बनाना और हरेक की व्यक्तिगत कमजोरियों की शोध करना—जहाँ कमजोरियाँ ना मिलें, वहां अपनी प्रतिभा का उपयोग करके कमी को पूरा करना।
   चतुर्थ चरण—उपरिलिखित शत्रुओं की हानि करने के साधनों की खोज। इस बात पर ध्यान रखना कि वहां किसका हित-साधन हो रहा है। उसमें यथाशक्य बाधक होना।
  पंचम चरण—आचार्य की साहित्य संबंधी मान्यताओं की शोध करना (यदि हों तो) और उनके मुख से झरनेवाले निर्णयात्मक वाक्यों को मंत्री की रट लेना जैसे—‘प्रेमचंद प्रचारक है!’ ,  ‘यशपाल नारेबाज है!’ ,  ‘उग्र गन्दा है!’ , ‘नया साहित्य कचरा है!’ ,  ‘नयी कविता--हुश्ट!’       
   षष्ठम चरण—आचार्य की महत्त्वाकांक्षाओं की शोध करना जैसे (क) पद-संबंधी, (ख) सम्मान-अभिनंदन संबंधी, (ग) प्रशस्ति-श्रवण, (घ) अपने ऊपर पुस्तक लिखवाना आदि।
   सप्तम चरण—आचार्य की सेवाओं के प्रकारों की शोध। (कहा है—सेवा से मेवा मिलता है)। सेवाओं के प्रकार; यथा, जरूरतें पूरी करना, बाजार से खरीदा आम बनारस से लाया बताना, पान खिलाना, बच्चो को नाटक दिखाना, सौदा-सुलुफ कर देना, प्रशंसा-लेख लिखना, फोटो खिंचवाना आदि।

      शोध प्रक्रिया को इस तरह सात चरणों में बांटकर उसने रूपरेखा तैयार कर दी और कहा, ‘अब इस रूपरेखा के अनुसार कार्य करो। कार्य क्या करना है, यह रूपरेखा में स्पष्ट हो जाता है। जैसे प्रथम चरण के अंतर्गत तुम्हारा तुम्हारा कार्य होगा, आचार्य के घर लौकी पहुंचाना, उनके लिए डब्बे में पान लिए रहना, उनके शत्रुओं की निंदा करते रहना। (अपने मित्र हों तो भी, क्योंकि शोध पतिव्रत-धर्म है )। षष्ठम चरण के अंतर्गत आचार्य के संबंध में लेख लिखना, उनकी और से पुस्तक लिख देना, उनके सम्मान का सिलसिला जमाना, उनकी तस्वीर छपाना आदि कार्य होंगे।’
         
मैंने कहा, ‘जब यह शोध-कार्य पूरा हो जायेगा, तब डिग्री किस विषय पर मिलेगी ?’
उसने कहा, ‘क्यों, जो विषय तुम्हारा है उसी पर मिलेगी, याने ‘छायावादी काव्य में नारी’ पर।’
   बन्धु, रूपरेखा तैयार है। इस पर कार्य करने का साहस जुटा रहा हूँ। अभी आचार्य के प्रति निष्ठा जाग्रत करने में लगा हूँ। रोज पाठ करता हूँ—‘नाते सकल, राम तें मनियत सेवक सेव्य जहाँ लौं !’
        और सब ठीक ही है।
                                                                             सस्नेह
                                                                                           ह.शं.प.       


पुनश्च (गोपनीय)

बन्धु, जैसा कि आप समझ गये होंगे, यह सब मैंने ईर्ष्या से प्रेरित होकर लिखा है। अभी तक मैं पीएचडी नहीं हुआ, इसलिए ईर्ष्याग्रस्त हो गया हूँ। पर यह बात अपने तक ही रखना।   


परसाई रचनावली भाग-३ (पृष्ठ सं ३५७-३५९)


                                       

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