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कि मैं दुनिया की सबसे हसीन औरत के सामने खड़ा हूँ ।

विहाग वैभव काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के गंभीर अध्येता और मधुबन गोष्ठी के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। विहाग सोशल मीडिया पर कविताओं के माध्यम से अपने विचार लगातार साझा करते रहते हैं। विहाग की कुछ कविताओं को मैं एक साथ आपके सामने रख रहा हूँ। अपने समय और समाज से मुठभेड़ करता हुआ यह युवा रचनाकार अपनी बेबाकी और साफगोई के लिए जाना जाता है। विहाग के संपूर्ण व्यक्तित्व को आप उनकी कविताओं में देख सकते हैं। इनकी कविताओं में आक्रोश और गुस्से का स्वर देखने को मिलेगा। कई बार इनका आक्रोश कविताओं को कुछ जगहों पर कमजोर भी करता है। इसके बावजूद विहाग की कविताएं इस आधे-अधूरे समय और समाज को बखूबी व्यक्त करती है, साथ ही ये कवितायें इस फासीवादी समय से जगह-जगह पर दो दो हाथ करती हुई दिखती है। बहरहाल आइये हम इस युवा कवि की कविताओं से को पढ़ते हैं ----                                                                       
                                                                        
                                                                        मेरे बारे में


मेरी आँखों में उतर आया है खून 

चेहरे की मांसपेशियाँ खिंची हुई हैं
बाजुओं पर मछलियाँ तैर रही हैं 
पैरों में थरथराहट जारी है 
मुझे शास्त्रों का धूर्त ज्ञान न देना 
मैं कई जन्मों से गुस्से में हूँ 
पवित्र आत्माओं के अन्दर के 
गिरे हुए भेड़िये 
और जंगलीपन को देखकर ।




दुनिया की सबसे हसीन औरत
समुद्री लहरों का कोई अक्खड़ बंजारा कबीला
चूमकर माथा बस गया है वहीं अभी के अभी
लम्बाई औसत से अधिक नीची होने के बावजूद
आवाज उम्मीद से अधिक ऊँची है
नाक थोड़ी तिरछी है मगर
किसी भी धूर्त विषैली मुस्कान पर फूलने में माहिर
सांवले से अधिक सांवले उसके होंठ
बाख़ुशी विरोध के तीखे शब्द ढो रहे हैं
इसकी आँखे , उफ्फ़..
सदियों से जमे ताजे खून के कुण्ड से
नहाकर निकली सी , बिल्कुल लाल आँखें

ये औरत एकसाथ
मेरी माँ, बहन , दोस्त और प्रेमिका न होती तो
मैं इसे समसारा कहता और चूम लेता
लेकिन जब नाम बंधन का पहला हथियार हो तो
मैं नाम देने से बचता हूँ फिलहाल

समसारा ने परिचय कराते हुए बताया कि
इसे हर गलत बात पर
मुठ्ठियों के कस जाने और
पूरे बदन के थरथराने लगने की
एक खास तरह की बीमारी है

अब मैं यह जानकर
आश्चर्यचकित उत्सुकता और ख़ुशी से भर पड़ा हूँ
कि मैं दुनिया की सबसे हसीन औरत के सामने खड़ा हूँ । 

©विहाग वैभव
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ढाई आखर प्रेम 
तुम्हारी आत्मा के पूरब से उट्ठेगा
ललछौंहा उजास
और तुम गा उठोगे
ढाई आखर प्रेम का

जब जलते हुए जंगल
फूलते फूलों का भ्रम जनम रहे हैं
और शासन के हवसी बुल्डोजरी दाँत
धरती के खूबसूरत उरोजों को
चबा जाने में व्यस्त हैं
ऐसे में तुम प्रेम करो
प्रेम करो प्रकृति से
प्रेम करो जंगली लोगों से
चूम लो झरबेरी के कांटे
सहलाओ पठारों के घाव
हो जाओ भगीरथ
कर दो हर नदी को गंगा
खुद को चमेली के हवाले करो
जिससे महक जाये समूची दुनियां
लिपट जाओ कटते सागौन से
थाम्ह लो कुल्हाड़ी की पहली वार
अपने गर्दन पर
आखिर दद्दा ने भी गाया है -
'शीश उतार भुईं धरे
तब पैठे घर माहीं '...
        और तुम गा उठोगे
        ढाई आखर प्रेम का

जब तुम पर पड़ती है
पड़ोसी की तिरछी निगाह
और उसके मन में फूटता है
शक का बारूद
जब तुम्हारे विभागीय प्रमोशन से
उड़ जाती है
तुम्हारे सबसे घनिष्ठ मित्र की नींद
जब भूकम्प- पीड़ित लड़कियां
खिसियाई मजबूरी को घोघते हुए
बाजारू होने के क्रम में कतारबद्ध हैं
या जब
किसी अफवाही दंगे में कूद पड़े
शंकर का त्रिशूल
हनुमान की गदा
मोहम्मद की तलवार
तो ऐसे में , प्रेम करो
प्रेम करो पड़ोसी की अंखुआती सफलता से
धधाकर लगो गले
फफककर होओ खुश
प्रेम करो अपने प्रतिद्वन्दियों से
दो उन्हें वाजिब रास्ता उनका
मर्द औरत भूलकर तुम बस प्रेम करो
और तब तुम देखोगे कि
सोनागाछी , बिसारती बाजार के लिए जाना जायेगा
जी.बी. रोड संगीत विश्वविद्यालय के लिए
और मडुआडिह जाना जाएगा
अपने बाँस के बर्तनों के लिए
प्रेम करो
तुम कृष्ण , मोहम्मद , जीसस , साहेब
सबसे एक साथ प्रेम करो
कुछ यूँ कि
यदि तुम अल्लाह हो तो
मस्जिद से अजान नही
मानस का पाठ कराओ
और मैं यदि राम हूँ तो
मन्दिर के किर्तन में
कुरान की आयतें पढ़ाता हूँ
         और इस तरह हम दोनों गा उठेंगें
         ढाई आखर प्रेम का ।

जब तुम्हारे उम्र की बड़ी आबादी
दुनियां के मानचित्र पर
खून के रंग में लिख रही - ज़िहाद
या जब तुम्हारे सीने पर रखकर
बन्दूक की नली
पढ़ाया जा रहा हो
स्वतंत्रता , समानता , बंधुत्व का पाठ
और प्रश्न करने पर
राख लगाकर खींच ली जा रही हो
जुबान तुम्हारी
ऐसे में भी
तुम सिर्फ प्रेम करो 

तुम पाओगे कि
जिहादी तोपों के गोले
पिघलकर
ढाई आखर का आकार ले लिए होंगें
तुम्हारे सीने पर रखी बन्दूक
फूल में बदल जाएगी
और राख गुलाब-जल में तब्दील हो जायेगा

जलते हुए जंगल
कटते हुए पहाड़
डूबती हुई नदियों
धुँआता हुआ मन
चमकती हुई तलवारें
खिलखिलाते हुए दंगे
बिस्तर होती लडकियाँ
उबलता हुआ जिहाद
गलती हुई जुबान
ओह्ह......
अब प्रेम करो
इसके पहले कि
मानवता जैसे शब्द
पुरातत्व संग्रहालय में नजर आएँ
प्रेम करो इसके पहले कि
हर गली , हर चौराहा हो जाए हिरोशिमा
प्रेम करो इसके पहले कि
तुम बचो ही न

जब तुम सीख लोगे प्रेम करना
तो अपनी ही आँखों में आँखें डाल
मौन में बोल उठोगे - अहं ब्रह्मास्मि
( यह प्रेम का सबसे विराट रूप होगा )
तब तुम पूर्ण होगे
तब तुम मुक्त होगे
प्रेम ही होगा
हमारी अन्तिम परिणति

तब तुम्हारी आत्मा के पूरब से
उट्ठेगा ललछौंहा उजास
और तुम गा उठोगे
ढाई आखर प्रेम का ।

© विहाग वैभव
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घर से भागे लड़के 
वे आँगन या चौखट पर
बिना कोई निशान छोड़े
गर्म खून के तेज चाल पर थरथराते कदम
घर से निकले आधी रात
चाँद को धकियाते हुए

कुछ पूर्व की दिशा में गये
ज्यादातर गये दक्षिण-पश्चिम

वे घर से जेब में
ढेर सारे सपने ठूँसकर निकले
वे भागे कंधे पर कारण लादे -
न भागते तो बँधुआ मजूर होते
या फिर होते हत्यारे
वे अनार में लगते पहले फूल थे
तब मरने और मारने में से
उनका विश्वास किसी में न था

उनका घर अगली सुबह बिलखते हुए जगा
बहनों ने पिताओं को
माँओं ने जेठानियों को गले भेंट
मुँह बिसोर , कलप-कलप रोयीं
खूब सुना लड़कों के छालेदार पाँवों ने
वह पछाड़े खाता हुआ शोकगीत
पर पाँव पीछे नहीं लौटे
फिर कभी मुकम्मल लौटने की शर्त पर

जो भागे उनमें से कुछ गुम गये
कुछ अभिनेता बनें
कुछ प्रोफेसर व चित्रकार बनें
कुछ मजदूर ही बन पाए
यह जरूरी भी तो नहीं
कि हर भागा हुआ लड़का बुध्द बने

वे भागे
पर वे भगोड़े नहीं थे

वे भागे क्यों कि
वे भाग सकते थे
वे भागे क्यों कि
उन्हें चाहिए थी दुनियाँ
थोड़ी और खूबसूरत
वे भागे क्यों कि
वे भागने के पहले
अपनी देह में मरे नहीं थे ।

© विहाग वैभव
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ओझौती जारी है
तपते तवे पर डिग्रियाँ रखकर
जवान लड़के जोर से चिल्लाये - रोजगार

बिखरे चेहरे वाली अधनंगी लड़की
हवा में खून सना सलवार लहराई बदहवास
और रोकर चीखी - न्याय

मोहर लगे बोरे को लालच से देख
हँसिया जड़े हाथों को जोड़
किसान गिड़गिड़ाये - अ.. अ..अन्न

उस सफेद कुर्ते वाले मोटे आदमी ने
योजना भर राख दे मारी इनके मुँह पर
और मुस्कुराकर कहा - भभूत  ।

© विहाग वैभव
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सिक्का बदल गया 
भविष्य सिर्फ देखा नही जाता
छपाई भी होती है भविष्य की
सिलाओं पर
चौखटों पर
मुद्राओं पर
चुपके से
छाप दिया जाता है भविष्य

अभी देख रहा हूँ
एक रूपये का पुराना सिक्का
गेहूँ-छाप सिक्का

नियामकों ने छाप दिया था
गेहूँ-छाप सिक्के पर भविष्य
कि भविष्य में
गेहूँ उगाने वालों की कीमत
एक रूपये भी नही होगी
या एक-एक रूपये के लिए
तरस जायेंगें गेहूँ उगाने वाले
या गेहूँ उगाने वाले
खरीद लिए जायेंगें
एक रूपये में
या फिर ये कि
गेहूँ उगाने वाले
गेहूँ उगायें , गेहूँ बेचें
एक रूपये के मुनाफे से
ज़हर खरीदें
खायें और मर जायें

सिक्का बदल गया

एक रूपये के सिक्के पर
छाप दिया गया ठेंगा
क्या आप देख सकते हैं
अपना भविष्य ?

© विहाग वैभव
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मणिकर्णिका 
आप जब कभी भी
मणिकर्णिका जायेंगे
कंधे पर एक भारी बोझ लिये हुए
पहले पत्थर कलेजे की सीढ़ियाँ उतर
गंगा में बोरेंगें दुख अपना
नही डूबेगा जब
तभी आप जानेंगे
दुनियां का एक और आश्चर्य
सम्पूर्ण गंगा की इतनी सामर्थ्य नहीं
की बुझा सके
एकाएक मणिकर्णिका की आग

आप एक और आग खरीदेंगे
ताकि बोझ आपका राख हो जाये
लोहा लोहे को काटे या न काटे
यहां आग आग को काटती है

आप बुझी आग का भ्रम लिए
घर लौटेंगे
लोकाचार होगा , दिन बीतेंगे , महीने , बरस भी
और ऐसे ही किसी एक दिन
घूमने गए सारनाथ
रोने के लिए तलाशते हुए एकांत
आप महसूसेंगे कि
मणिकर्णिका की आग
बुझते बुझते भी नही बुझती
मणिकर्णिका की आग
ताउम्र जलती रहती है भीतर-भीतर
तपती रहती है अंतर् अंतर्  ।

© विहाग वैभव
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युद्ध के खिलाफ़ युद्ध
किताबों का दूरबीन ले आओ
और झाँको इतिहास के ग्रह पर
तुम पाओगे कि
समूचा ग्रह पटा पड़ा है
मरे हुए युद्धों से
जिसमे सड़ रही है
इंसानों की बेहतरीन नस्ल
जिसकी तलवारें रो रही हैं
खून के आँसू

हमने कितनी ही कितनी बार
कितने ही कितने
लड़े हैं युद्ध
युद्ध धर्म के लिए
युद्ध देश के लिए
युद्ध सम्पत्ति के लिए
स्वाभिमान के लिए
युद्ध सौन्दर्य के लिए

पर ध्यान रहे
हजारों हजार युद्ध भी
एक शांति से मुकाबला नही कर सकते
युद्ध नही कर सकते कोई सृजन

जंग के प्राथमिक संस्करण से पीड़ित
यह समय
जब कराह रहा है
चोटिल आत्मा की आवाज
तो आओ
हम मुट्ठी भर लोग तय करें
एक आखिरी जंग

एक जंग
अपनी शैतानी रूह के खिलाफ़
एक जंग
अपनी अनंत लालसा के खिलाफ़
एक जंग
अपनी हवस के खिलाफ़
एक जंग
अपनी ईर्ष्या के खिलाफ़
एक जंग
अपने बदले के खिलाफ़

आओ लड़े हम
बस एक आखिरी जंग
शांति के लिए
हमारी दुनियाँ को
शांति की जरूरत है ।

© विहाग वैभव
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तलवारों का शोकगीत 
कलिंग की तलवारें
लगकर स्पार्टन तलवारों के गले
खूब रोयीं इक रोज फफक फफक

हिचकियाँ बाँध तलवारें  रोयीं
कि उन्होंने मृत्यु भेंट दिया
कितने ही शानदार जवान लड़को के
रेशेदार चिकने गर्दनों पर नंगी दौड़कर
और उनकी प्रेमिकाएँ
किले के मुख्यमार्ग पर खड़ी
बाजुओं पर बाँधें
वादों का काला कपड़ा
पूजती रह गयीं अपना अपना ईश
चूमती रह गयीं बेतहाशा
कटे गर्दन के खून सने होंठ

तलवारों ने याद किये अपने अपने पाप
भीतर तक भर गयीं
मृत्यु- बोध से जन्मी अपराध- पीड़ा से

तलवारों ने याद किया
कैसे उस वीर योद्धा के सीने से खून
धुले हुए सिन्दूर की तरह से बह निकला था छलक छलक
और योद्धा की आँखों में दौड़ गयी थी
कोई सात आठ साल की खुश
बाँह फैलाये , दौड़ती पास आती हुई लड़की

दोनों तलवारों ने
विनाश की यन्त्रणा लिए
याद किया सिसकते हुए -

यदि घृणा , बदले और लोभ से सने हाथ
उन्हें मुट्ठियों में कसकर
जबरन न उठाते तो
वे कभी भी
अशुभ और अनिष्ट के लिए
उत्तरदायी न रही होतीं

एक दुसरे की पीठ सहलाती तलवारों ने
सांत्वना के स्वर में
एक दूसरे को ढाँढस बँधायी -

तलवारें लोहे की होती हैं
तलवारें गुलाम होती हैं
तलवारें बोल नहीं सकतीं
तलवारें खुद लड़ नहीं सकतीं ।

© विहाग वैभव
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अमेरीकी राष्ट्रपति का स्वागत वक्तव्य 
यह सन् सोलह के
नवम्बर का दूसरा बुधवार है
और अब
वैश्विक इतिहास के
उग्रकाल के पहले दिन में
तुम्हारा स्वागत है समसारा !

हालाँकि मुझे कहते हुए अफ़सोस हो रहा है
पर ये मेरी दिमागी बदहाली के लिए खुराक है
कि अब तुम अपने मुस्लिम दोस्तों से नहीं मिल सकोगी
ऐसा करने पर
तुम्हें देशद्रोही करार करते मुझे अच्छा नहीं लगेगा

अब तुम्हें मुझे प्यार करना ही होगा
क्यूँ कि ऐसा मैं चाहता हूँ

आओ मेरे साथ तुम भी स्वागत करो
और देखो कि
मेरे आने से
बारूदों की बाँहें फिर से फड़कने लगी हैं
बन्दूकों की फसल में बहार आने को ही है
और एक बार फिर से
जंग खाते मिसाइलों को लग गए पंख

मैं चाहता हूँ कि विभिन्न देशों से
बम के विभिन्न नमूने लाये जाएं
जिन्हें पिघलाकर
मेरे स्वागत योग्य ताज बनाया जाये

तुम सैनिकों की उदास होती पत्नियों का ध्यान मत करो
प्यार को मत कोसो समसारा
आखिर हत्या कब तक
अपराध बने रहने के लिए शापित रहेगा
मैं हत्या को शौक घोषित करूँगा
और तुम्हारे अन्य सभी प्रेमियों को मार दूँगा
कृपया तुम उन्हें भूल जाना

उदार राष्ट्रवाद किसी की बपौती नहीं है
मैं उसे सोने के शराब में मिलाकर पी जाऊँगा
नीतियों की पीठ से दीवाल तैयार कर
आलीशान हरम बनाऊंगा
सुनिश्चित करूँगा स्थान
गर्भपाती रोजगारियों के लिए

समसारा !
इस दुनिया ने अभी नस्लीय युध्द में मरे
इंसानों की अधजली टंगड़ियां नहीं खायी है
मेरे धर्म समर्थक लोगों ने अभी नहीं लगायी है
अपनी आँखों में वो काजल
जो विधर्मियों की चिता से उठती
खूबसूरत धुँए से बनती है
मेरे लोगों ने नही सुना है अभी वो संगीत
जो विरोधियों की छटपटाती चीखों का राग अलापती है

समसारा मैं इस दुनिया को
बहुत कुछ पहली बार देने वाला हूँ
जिसके लिए मेरा स्वागत होना ही चाहिए

और अन्त में सबसे जरूरी बात
तुम्हें कभी नहीं पढ़नी चाहिए कवितायेँ
लिखनी तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए ।

© विहाग वैभव
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बनारस में बसंत 

इस शहर में बसन्त
गाँव के जैसा हूबहू नही आता

बसन्त का आना गाँव में
उल्लास का आना होता
जैसे लछिमा भौजी सपरिवार
बम्बई से साल में एक बार
आती थी गाँव , लाती थी
आस पड़ोस के सबके लिए कुछ न कुछ जरूर
बसंत का आना गाँव में
हवाओं में सनसनाहट का बढ़ जाना होता
बसंत का आना गाँव में
सरसों के फूलों की जवानी का आना होता
जिसे उनका बिनब्याहा पिया
पछुआ हवा , छेड़ने को आतुर दिखता
बसंत का आना गाँव में
पीपल में लाल पत्तों का आना होता
जो मेरी सालभर की भतीजी केहोंठो की लाली से
होड़ लेने आते
बसंत गाँव में ऐसे आता कि
फगुनाहट पर ही
मेरे गाँव की सांवली
रेणुका , रंभा, उर्वशियों के पाँव थिरकने लगते
बसंत गाँव में ऐसे आता कि
अमवारी में फूल आता
जिसे हम
आमों में बौर लगना कहते
जिसे  हम आमों का बौरा जाना कहते

अब जब
आधे दर्जन बरस बीत गए
गाँव से बाहर आये
तो सोचता हूँ
क्या इस शहर में बसंत नही आता ?
या कुछ ऐसे कि
यहाँ आम नही बौराते
यहाँ बौराते हैं आदमी
ऐसे में इस शहर में
बसंत का कोई निश्चित समय नही
पर हाँ
जब भी आता है इस शहर में बसंत
तो हवाओं में
अमवारी की मादक सुगंध नही होती
सम्प्रदायिकता और मठों की आग में
धूँ धूँ कर जलती आदमियत होती है
और माफ करिये केदार जी !
मंडुआडीह से उठती है सिर्फ
मर्द की पिशाच-नाशक स्त्री-देह की खनखनाती चीख
यह मेरे गाँव के बासन्ती चिचिआहट से
बिल्कुल भिन्न है
वह गाती थी
यह घिघिआती है
इस शहर में बसंत जाति देखकर आता है
इस शहर में बसंत
धर्म देखकर आता है
इस शहर में बसंत खून के रंग में आता है

इस शहर में बसंत
गाँव के जैसा हूबहू नही आता ।


© विहाग वैभव
सम्पर्क सूत्र :-8858356891 
ईमेल:vihagjee1993@gmail.com

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