आद्य नायिका: इतिहास
के तिलस्म में कैद वर्तमान
‘जब इतिहास का शव आपके कंधे पर सवार हो और आप उसे
उठाकर फेंक भी नहीं सकते’ तब आप इस स्थिति में वर्तमान को
समझने के लिए इतिहास एवं इतिहासबोध का सर्जनात्मक उपयोग करते हैं। इसी सर्जनात्मकता का
सहारा लेकर युवा कवि अरुणाभ सौरभ ने ‘आद्य नायिका’ शीर्षक से
लंबी कविता लिखी है। अरुणाभ ने अपनी लंबी कविता ‘आद्य नायिका’ में इतिहास, मिथक और
अपने समकाल को एक विशिष्ट रचनात्मक आयाम दिया है। यह लंबी कविता मौर्य साम्राज्य के पतन एवं शुंग वंश की
स्थापना के साथ ब्राह्मणों द्वारा सत्ता-वर्चस्व
की नीति और षड्यंत्रों के सहारे हो रहे बौद्धों और बौद्धिकों के दमन को केंद्र में
रखकर लिखी गयी है। आज जब हमारी राजनीति इतिहास के गर्भगृह में पहुंचकर परिपक्क हो रहे
भ्रूणों के साथ छेड़छाड़ कर रही है तब राजनीति के नए यथार्थ और नए चरित्र को पकड़ने
के लिए कवि को इतिहास में लौटना पड़ता है। ऐतिहासिकता से संपृक्त यह कविता हमारे समकाल,
समकालीन परिस्थितियों एवं प्रतिकूल वातावरण को व्यक्त करने में सक्षम है।
पटना के नजदीक दीदारगंज
में गंगा नदी के किनारे सन् 1917 ई. में स्त्री की एक कलात्मक प्रस्तर मूर्ति
प्राप्त हुई। इसे दीदारगंज की यक्षिणी के नाम से जाना गया। सन् 2017 में अरुणाभ
सौरभ ने इसकी प्राप्ति के शताब्दी वर्ष पर ‘आद्य नायिका’ नाम की यह लंबी कविता
लिखी और कविता का यह ‘श्रम-साध्य प्रोजेक्ट’ पूरा हुआ। मौर्यकालीन यह मूर्ति
भारतीय सौंदर्यबोध को बखूबी व्यक्त करती है। पटना संग्रहालय में मौजूद मूर्तियों
में यह सबसे सुंदर मूर्ति है और अलग से लोगों का ध्यान खींचती है। कवि युवा अरुणाभ
सौरभ इस मूर्ति से इतने प्रभावित हुए कि इस मूर्ति को केंद्र में रखकर लंबी कविता लिखने
की योजना बनाई। 5 सालों में लिखी गयी यह कविता वर्तमान समय, समाज और राजनीति को
अपने अंदर समेटे हुए है। इसके बावजूद 90 पृष्ठ की इस कविता को ‘प्रेम कविता’ की
तरह पढ़ा जा सकता है। कविता में कवि का अंतर्मन बार-बार यक्षिणी को पुकारता है। पाठ
के दौरान पाठक को ऐसा लग सकता है कि कवि का मन ऐहिक वर्णन में ज्यादा रमा है। कविता
में मुख्य रूप से तीन पात्र हैं - यक्ष, यक्षिणी और सात साल का बच्चा।
इतिहास को अपने नाजुक
कंधे पर लादे यह सात साल का बच्चा, मिथक-पुराण एवं शास्त्रों की यात्रा करने वाला यह
बालक यक्षिणी की मूर्ति के प्रति इतना आसक्त है कि वह खुद ही यक्ष होना चाहता है। यक्षिणी
के नितंबों पर हाथ फेरकर जवान हो रहा यह बालक यक्षिणी के हाथ के पहले आभूषण ‘केयूर
वलय’ को उतारकर, पट्ट बंद कर दीपक की लौ बुझाते-बुझाते पौराणिक चरित्र यक्ष के
चरित्र में प्रवेश कर जाता है। वह यक्षिणी से आलिंगनबद्ध होना चाहता है। ‘वह
यक्षिणी के देह की सिहरन का साथी है, उसकी त्वचा को गुदगुदाने वाली हवा को अपनी
अंगुलियों में फँसाकर रखने वाला है।’ यक्षिणी के नितंब को छूकर जवान होने वाला
नायक, यक्षिणी से प्रेम निवेदन करने वाला नायक; ‘अँधेरे वर्तमान से प्रकाशमान भूत
कि ओर इतिहास-ग्रंथों के पात्रों के बीच खोते हुए सुनहरे अतीत में विचरने लगता है’।
वह सुव्यवस्थित पाटलीपुत्र में यक्षिणी के साथ वासना की तरल नदी में डूब जाना
चाहता है।
“शरीर के रोमछिद्रों
में
सिहरन के साथ-साथ
और चूमो
रक्तकमल पंखुरियों से
कोमल
होठों के बीच
मेरे ओठ छिपाकर
चूमो
और चूमो
और और
और
चूमो
और डूबने दो
वासना के नशे से तरल
नदी में”[1]
लंबी कविता ‘आद्य
नायिका’ के पाठ के दौरान पाठक को यह लग
सकता है कि कवि आद्य नायिकाओं से स्वयं को प्रेम किये जाने की इच्छा रखता है।
आद्य नायिका द्वारा दंत पंक्ति से कान की तिल्ली को हल्के से काटने एवं पद्म
पंखुरी से नाभि को सहलाने का मनुहार और कविता में इस तरह के तमाम मनुहारों को
देखकर, गहन प्रेम के उत्कट क्षणों के तमाम बिम्बों को देखकर यह धारणा और बलवती होती
है कि इस लंबी कविता में कवि का पुरुष हृदय ‘आद्य नायिका’ के बहाने वासना की
संभावनाओं की तलाश कर रहा है। लेकिन कविता का म्यार तब बदला-बदला लगने लगता है जब प्रेम-मनुहार
के निजी क्षणों में भी नायक की व्याकुलता और नायक का आग्रह प्रपंची संसार एवं इस अनसुलझे
समय से मुक्त होने में है, प्रतिकूल वातावरण में आनंदमयी परिस्थिति सिरजने में है।
कवि सूर्य सा तेज मुखमंडल वाली, अपूर्व शक्तियों की स्वामिनी यक्षिणी के माध्यम से
‘आदि शक्ति’ का आह्वान कर रहा है। ऐसा लगता है कवि इस प्रतिकूल वातावरण में आनंदमयी
परिस्थितियाँ सिरजने के लिए ‘आदि शक्ति’ से गुहार लगा रहा है...
“कला और रस भर दो
जीवन में, प्राणियों के
सौंदर्य और रसमय
सम्मोहन
भरने के लिए
आद्य-नारियों
भर दो सौंदर्य
...
प्रतिकूल वातावरण में
सिरज सकूँ
आनंदमयी परिस्थितियाँ”[2]
ऐतिहासिकता से संपृक्त
यह कविता हमारे समकाल, समकालीन परिस्थितियों एवं प्रतिकूल वातावरण को व्यक्त करने
में सक्षम है। पौराणिक/मिथकीय चरित्र को केंद्र में रखकर लिखी गयी यह कविता विस्मृत
होते जा रही इतिहास की कसकती रग पर हाथ रखती है और हमारा वर्तमान चीख उठता है। आगस्त
काम्टे ने ठीक ही कहा है कि अपने बारे में जानने के लिए इतिहास को जानो। कविता का
नायक अपने वर्तमान को देखने और समझने के लिए मिथक, पुराण, इतिहास, इतिहास ग्रंथों एवं
ऐतिहासिक पात्रों के बीच जाता है। क्योंकि जो व्यक्ति या समाज अपने इतिहास से नहीं
सीखता है वह अपने वर्तमान में घिसट-घिसट कर प्रतिकूल परिस्थितियों के साथ
लिथर-लिथर कर जीता है-
“मिथकों और इतिहासों से
मैं सीख नहीं पाया कुछ
विस्मृत हो गयी मेरी स्मृतियाँ
खो गयीं दिव्य शक्तियाँ”[3]
कार्ल मार्क्स ने कहा है कि-‘इतिहास खुद को
दोहराता है, पहले त्रासदी की तरह, दूसरे मज़ाक की तरह’।
इसलिए हमें अपने वर्तमान को समझने के लिए सबसे पहले इतिहास को समझना होगा। बिना मुक़म्मल
इतिहासबोध के हम अपने समकाल को ठीक ढंग से व्याख्यायित नहीं कर सकते हैं। इसी कारण
से कविता का नायक (मुख्य पात्र) अपने समकाल को समझने के लिए मौर्यकालीन भारत में
प्रवेश करता है। वह जानता है कि उसे अपने वर्तमान को समझने के लिए इतिहास में
उतरना होगा। आज व्यक्ति अपने वर्तमान में इतना उलझा हुआ है या यूँ कहूँ कि उसे
इतना उलझा कर रखा गया है कि वह चाह कर भी अपने इतिहास की तरफ देख नहीं पाता है। आज
जब मनुष्य अपने इतिहास को विस्मृत करते जा रहा है, बाजारवादी फासीवादी ताकतें मनुष्य
को इतिहास और इतिहासबोध से दूर करती जा रही है। तब इतिहास के शव को कंधे पर धारण
कर कविता का नायक त्रासदियों को विस्मृत नहीं करता है बल्कि वह सत्ता के तांत्रिक
कला-क्रिया को देख रहा होता है...
“जनता के मन-बुद्धि-विचारों
पर
अधिकृत हो गयी है सत्ता
और अपनी तांत्रिक कला-क्रिया
से
निरंतर सम्मोहित करती
रही
और अपनी उपलब्धियाँ
गिनाती रही
-सत्ता...।”[4]
वह देख रहा है कि किस
तरह से सत्ता जनमुक्ति की राह को दुरूह बनाते जा रही है। वह देख रहा है कि जो
ताकतें इन समस्याओं को जन्म दे रही हैं, इन समस्याओं को और भी जटिल बना रही हैं वहीं
ताकतें इन समस्याओं पर गंभीरता से अध्ययन भी कर रही हैं। वह देख रहा है कि सत्ता को
संचालित करने वाले अभिजन समस्याओं के समाधान में रूचि नहीं लेते बल्कि वे जानबूझ
कर इन समस्याओं को ठीक उसी तरह बनाये रखना चाहते हैं। कविता का नायक मगध में उत्सव
मनाते ब्राह्मण श्रेष्ठ के दरबार में
सभी मंत्रीगण को देख रहा है। यह नायक मुक्तिबोध के ‘उस दिन’ के नायक की तरह
मुंशी और मुंसिफ को लुटेरे के अर्दली के साथ रम, शैम्पेन, व्हिस्की पीते देख रहा
है।
‘आज जब हमारा
सांस्कृतिक संकट सर्वग्रासी और भयावह हो चुका है। लोकतांत्रिक मूल्यों की खिलाफ़त
करने वाले तत्व आज इतने चालाक हो गए हैं कि आप विपक्ष की जिस किसी संभावना को
टटोलना आरंभ करते हैं, उसी में सेंध लगा दी जा रही है। आज जब न्याय के लिए संघर्ष
करने वाली शक्तियों की लगातार एक ट्रेजि-कॉमिकल पराजय हम देख रहे हैं।’[5] आज जब मुंशी-मुंसिफ का आंतरिक
गठजोड़ कातिल-लुटेरे को लाभ पहुंचा रहा है। आज जब दमन, शोषण, अत्याचार और हिंसा के
रूपों का इतना विकास, परिमार्जन और संस्थानीकरण हो चुका है कि जब तक आप उनकी
व्याख्या नहीं करते तब तक ये अपने असली रूप में दिखाई भी नहीं पड़ते। तब सांस्कृतिक
संकट के इस सर्वग्रासी दौर में युवा कवि अरुणाभ सौरभ कोई जटिल सैद्धांतिकी नहीं
गढ़ते बल्कि हमारे ट्रेजि-कॉमिकल वर्तमान को दिखाने के लिए हमें इतिहास, पुराण,
मिथक एवं शास्त्रों की यात्रा करवाते हैं।
भारतीय चेतना मूलतः मिथकों, जनश्रुतियों
और मुहावरों से बनती है। यहाँ की जनता इसी तरह
इसी दायरे में सोचती है अतः उस तक कुछ भी संप्रेषित करने के लिए मिथकों के सर्जनात्मक
उपयोग की ज़रूरत पड़ती है। यह संदेह करना औचित्यपूर्ण है कि मिथकों और किंवदंतियों
के बहिष्करण से कविता का पाठकीय आधार कमजोर हुआ है।
“भारतीय वाचिक परंपरा में मिथक और किस्सों की जादुई ताकत की ख़ास अहमियत है।
किस्सागोई की वर्णनात्मक डिजाइन के जरिये अपने केंद्रीय और सामूहिक तात्पर्य
व्यक्त करना भारतवासियों की चारित्रिक विशेषता रही है।...यही कारण है कि चाहे किसी
विषय का मनन करना हो, जटिल गुत्थियाँ सुलझाना हो या यथार्थ की प्रकृति का पता
लगाना हो, भारत में किस्सागोई का बड़े पैमाने पर प्रयोग होता रहा है।”[6] कहने का आशय यह है कि आज भी भारतीय समाज का
बहुत बड़ा हिस्सा किस्सों के जरिए ही यथार्थ की कार्य-कारण समझ बनाता है।
प्रायः जटिल मसलों को अवधारणा के रूप में समझने में दिक्कत होती है इसलिए मनुष्य इन
मसलों को कथाओं के माध्यम से समझने का प्रयास करता है। ‘इसी बात को ओलीवर सैक्स ने ‘मनोजगत
का रागात्मक और नाटकीय स्वभाव’ कहा है’।[7]
अपने इन्हीं विशेषताओं
के कारण अरुणाभ की यह लंबी कविता सांस्कृतिक संवाद स्थापित करने में सफल हुई है।
यह कविता हमारे राजनैतिक-सांस्कृतिक सार का कथात्मक प्रतीकात्मक संग्रह है।
मौर्यवंश के पतन के बहाने कवि ने हमारी सांस्कृतिक पराजय की ओर इशारा किया है...
“हम हार चुके हैं
हमारी पराजय स्वीकार है
अखण्ड भारत के
ग्रामवासियों
ओ! हारे हुए
ग्रामवासियों
...
और मुझे
तुम्हारी चुप्पी
अखर रही है
बोलो यक्षिणी
मैं तुमसे कुछ कह रहा
हूँ”[8]
यह पराजय और उसके बाद
की चुप्पी हमारे वर्तमान का सच है। इसी चुप्पी के बीच सत्ता की वर्चस्व नीति और
षड्यंत्रों ने तबाह कर दिया भरे पूरे समृद्ध एवं शांतिप्रिय राज्य को। हत्याओं और
षड्यंत्रों का एक राष्ट्र-राज्य और उसको संचालित करने वाली बाजारवादी ताकतें देश और
समाज को सम्मोहित आतंक से डराती रहीं। जहाँ जनता के मन-बुद्धि-विचारों पर अधिकृत
हो गयी सत्ता, जहाँ सत्ता तांत्रिक कला-क्रिया से निरंतर सम्मोहित करती रही जनता
को। ऐसा लग रहा है मानो किसी सफल अघोरी ने वशीकरण मंत्र से संपूर्ण जनता को अपने
वश में कर लिया हो, ऐसा लग रहा है मानों पूरा का पूरा समाज एक तिलस्मी युग में प्रवेश
कर गया हो। कब किस विचारक को मार दिया जाए, कब किसी पत्रकार को मौत के घाट उतार
दिया जाए, कब कौन-सा लेखक ख़ुद ही अपनी मृत्यु की घोषणा कर दे, कब कोई छात्र गायब
हो जाए पता ही नहीं चलता। सत्ता की तांत्रिक कला-क्रिया तो तब दिखती है जब ‘मुन्सिफ’
ख़ुद न्याय पाने के लिए बार-बार क़ातिल से गुहार लगा रहा होता है, अदालत का दरवाजा पीट
रहा होता है।
“मार दिए गए
असंख्य विचारक
दार्शनिक
कलाकार
और उनकी घरों को
उनकी किताबों के साथ
जला दिए गए
हत्याएं होती रहीं
विचारों की
और फफक-फफक कर
रोता रहा
पाटलिपुत्र
अधजला
अधमिटा
वर्तमान के साथ”[9]
कविता में रक्षक द्वारा
सुग्गी की हत्या प्रश्नों, विचारों और तर्कों की हत्या है। सुग्गी की हत्या के
माध्यम से एक ओर कवि ने वर्तमान समय के सच को प्रतीकार्थ रूप में व्यक्त करने का
रचनात्मक प्रयास किया है। आज जो सत्ता की आलोचना करेगा, सत्ता से सवाल पूछेगा, सत्ता
की कमजोर नीतियों एवं उसके षड्यंत्रों का पर्दाफाश करेगा उसका अंजाम यही होगा। सम्मोहित
जनता और सत्ता के गुलाम रक्षक उन्हें मौत के घाट उतार देंगे...
“और सुग्गी का प्राणांत
विचार फिर-फिर मारा गया
और हत्या हुई कला की”[10]
रक्षक द्वारा सुग्गी की
हत्या और बौद्ध भिक्षुओं का कटा हुआ मस्तक लाने का राजकीय आदेश सनातन धर्म की तथाकथित
‘सहिष्णुता’ के मिथ को तोड़ता है और साथ ही क्रूरता, हिंसा एवं बर्बरता के आख्यान को
प्रस्तुत करता है। आज जब एक कौम ख़ुद
को सहिष्णु बताते हुए दूसरे कौम को आतंकी होने का प्रमाणपत्र बांटे जा रहा है, आज
जब सांप्रदायिक गिरोह भारतीय सभ्यता और संस्कृति के नाम पर नैतिकता के ठेकेदार बने
बैठे हैं, तब अरुणाभ सौरभ की कविता प्रतीकात्मक ढंग से सनातन धर्म के सहिष्णुता के
मिथ को भी तोड़ता है। जी हाँ! वही
सनातन सभ्यता और संस्कृति जिसमें स्त्रियों और दलितों के शोषण-दमन का अपना इतिहास
रहा है।
आज जब ये गिरोह शोषण-दमन के इस इतिहास को क्षणिक भटकाव कहकर आम जनमानस के
बीच शुद्धतावाद का प्रचार करने में जुट जाते हैं। तब यह किताब हमें मौर्यकालीन
भारत में ले जाती है। उसी मौर्यकालीन भारत में ‘जहाँ का ‘देवानं
पिये अशोक’ अपने गिरनार अभिलेख में सभी धार्मिक संप्रदायों के बीच सद्भावना के
महत्त्व को बताते हुए जनता से वाक्यसंयम की अपेक्षा रखता है। इसी अभिलेख में ‘अशोक
महान’ कड़े शब्दों में कहता है कि न केवल अपने धार्मिक विश्वासों की पूजा की जाय वरन्
दूसरों धार्मिक विश्वासों की निंदा न की जाय; मेल-जोल से रहा जाय; दूसरे धर्म के
लोगों की बात सुनी और समझी जाय।’[11] अशोक के इस अभिलेख से इतना तो स्पष्ट तौर पर कहा ही जा सकता है
कि सांप्रदायिक तनाव और संप्रदायिकता का लिखित इतिहास 2500 साल पुराना है। सदियों से धार्मिक-सांप्रदायिक गिरोहों ने इस
देश के लोगों के जीन्स में जातिवाद और साम्प्रदायिकता को कूट-कूट कर भरा है। ‘मनुष्य/अब
यहाँ/ कोई नहीं है/ केवल जाति/ है केवल धर्म है।’[12] यह
सही है कि सेक्युलर आंदोलन की लम्बी परंपरा (बुद्ध और भक्ति आंदोलन से होते हुए
गांधी, अम्बेडकर, भगत सिंह तक की परम्परा) के कारण औपचारिक तौर पर स्थितियां काबू
में दिखती हैं लेकिन जैसे ही इन सांप्रदायिक गिरोहों को राजसत्ता द्वारा खाद-पानी मिलना
शुरू होता है वैसे ही ये गिरोह आमलोगों के अंदर पैबस्त जातिवाद और साम्प्रदायिकता को
बाहर लाने की मुहिम में जुट जाते हैं। जनतांत्रिक ताकतें हाशिये पर चली जाती हैं
और हमारा वर्तमान हजारों साल से चली आ रही दमनकारी फासीवादी प्रवृत्तियों से
संचालित होने लगता है।
“सुनो!
सुनो!!
सुनो...!!!
समाप्त हुआ मौर्यकाल...
...
सुनो! सुनो!! सुनो!!!
राजकीय आदेश है
जो बौद्ध भिक्षुओं का
कटा हुआ मस्तक
लेकर आएगा
उसे स्वर्णमुद्राएँ भेंट की जाएगी”[13]
यह मौर्यकालीन मुनादी, यह राजकीय आदेश हमारे समय का सच है। ऐतिहासिक
आख्यानपरक यह लंबी कविता अपनी अंतर्वस्तु में समकालीन
समस्याओं को समेटे हुए है-
“सभ्यता अब
विचित्र परंपराओं का
करेगी पाठ
संस्कृति अब
एक ब्राह्मण-धर्म के
संरक्षण के निमित्त
गढ़ी जाएगी
अन्य धर्म के लोगों को
इस देश से निकाल दो
पाटलीपुत्र अब
पुष्यमित्र शुंग का है
मगध शुंग वंश का है
और
अखण्ड भारत
केवल ब्राह्मणों का”[14]
आज जब राजसत्ता द्वारा दमनकारी ढंग की सामूहिक चेतना का निर्माण किया जा
रहा है तब अरुणाभ अपनी लंबी कविता के माध्यम से हमें मौर्यकालीन भारत में ले जाकर हमारे
समय, समाज और राजनीति के चरित्र को सफलतापूर्वक उद्धाटित करते हैं। कहना न होगा कि
यह लंबी कविता हमारे समकाल के सामूहिक आवेग एवं नाटकीय भूमिका को समेटे हुए है।
क्रिस्टोफर काडवेल इसी को तो कविता का सत्य मानते हैं। “कविता का सत्य इसका अमूर्त कथन है, इसके तथ्यों की अंतर्वस्तु
नहीं बल्कि समाज में इसकी नाटकीय भूमिका है, सामूहिक आवेग की अंतर्वस्तु है।”[15]
अरुणाभ अपनी इस लंबी कविता में मौर्यकालीन भारत के माध्यम से अपने समय को
समझने और समझाने का पुरजोर प्रयास करते हैं। यह कविता इतिहास और वर्तमान के बीच सांस्कृतिक
संवाद स्थापित करते हुए समकालीन समस्याओं को उद्घाटित करती है। कवि और कविता का सामूहिक
आयोजन हमारी समकालीन राजनीति और समाज को स्वस्थ एवं सुंदर बनाने में है। इसी
सामूहिक आयोजन के मद्देनजर कवि ‘संसार को सुंदर बनाने में अनवरत् प्रयासरत् आद्य
नायिकाओं’ का आह्वान करता है। कविता की लय इसके सामूहिक आयोजन को और अधिक आसान बना
देती है। लंबी कविता ‘आद्य नायिका’ की संगीतात्मकता एवं लयात्मकता इसकी विशिष्ट
पहचान है। कविता की ओज गर्भित भाषा सामूहिक आवेगों को अभिव्यक्त करने में सक्षम है
लेकिन इस लंबी कविता में कई जगहों पर ‘भाषिक बिस्फार’ भी दिखता है जिससे कविता और
लंबी होती है। कुछ जगहों पर यह ‘भाषिक बिस्फार’ पाठ को नीरस और बोझिल करता है।
नीरसता के इस बोझिल क्षण में पाठक को यह महसूस होता है कि यह कविता 90 पृष्ठ की
जगह 40 से 50 पृष्ठ में सिमट सकती थी। युवा कवियों की लंबी कविताओं के साथ यह संकट
प्रायः देखने को मिलता है, युवा कवियों के यहाँ ‘भाषिक बिस्फार’ और ‘वाग्जाल बुनने’
का यह संकट थोड़ा ज्यादा है।
सुधांशु कुमार
शोधार्थी, हिंदी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय
दिल्ली
मो.-7839114692
[1] आद्य नायिका, अरुणाभ सौरभ (पक्षधर
पुस्तिका-2, जनवरी-जून 2017, दिल्ली), पृष्ठ 16
[2] आद्य नायिका, अरुणाभ सौरभ (पक्षधर
पुस्तिका-2, जनवरी-जून 2017, दिल्ली), पृष्ठ 65
[3] आद्य नायिका, अरुणाभ सौरभ (पक्षधर
पुस्तिका-2, जनवरी-जून 2017, दिल्ली), पृष्ठ 45
[4] आद्य नायिका, अरुणाभ सौरभ (पक्षधर
पुस्तिका-2, जनवरी-जून 2017, दिल्ली), पृष्ठ 28
[5]कविता की संगत, विजय कुमार (आधार
प्रकाशन, पंचकूला, 2012), पृ.सं. 50
[6] अंतरंगता का स्वप्न-भारतीय समाज में
प्रेम और सेक्स,सुधीर कक्कड़ (वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007) पृष्ठ 12
[7] अंतरंगता का स्वप्न-भारतीय समाज में
प्रेम और सेक्स,सुधीर कक्कड़ (वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007) पृष्ठ 14
[8] आद्य नायिका, अरुणाभ सौरभ (पक्षधर
पुस्तिका-2, जनवरी-जून 2017, दिल्ली), पृष्ठ 42
[9] आद्य नायिका, अरुणाभ सौरभ (पक्षधर
पुस्तिका-2, जनवरी-जून 2017, दिल्ली), पृष्ठ 28
[10] आद्य नायिका, अरुणाभ सौरभ (पक्षधर
पुस्तिका-2, जनवरी-जून 2017, दिल्ली), पृष्ठ 35
[11] प्राचीन
भारत के प्रमुख अभिलेख, डॉ परमेश्वरीलाल गुप्त (विश्वविद्यालय प्रकाशन, 2007,
वाराणसी), पृष्ठ सं. 34
[12] आद्य नायिका, अरुणाभ सौरभ (पक्षधर
पुस्तिका-2, जनवरी-जून 2017, दिल्ली), पृष्ठ 88
[13] आद्य नायिका, अरुणाभ सौरभ (पक्षधर
पुस्तिका-2, जनवरी-जून 2017, दिल्ली), पृष्ठ 34
[14] आद्य नायिका, अरुणाभ सौरभ (पक्षधर
पुस्तिका-2, जनवरी-जून 2017, दिल्ली), पृष्ठ 80
नोट - यह आलेख 'साखी' पत्रिका के अंक-28 (मार्च 2018) में शामिल है.


Comments
Post a Comment