Skip to main content

"यह समझने के लिए कि मैं क्या कहता हूँ, किसी को भी मेरा आचरण देखना होगा..."- महात्मा गांधी के इस कथन के ठीक बाद, मैं यहाँ एक बड़े आचार्य मने एक प्रोफेसर साहब की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ. शायद उन्होंने यह कविता दीक्षा ग्रहण करते समय अपने किसी आचार्य को ध्यान में रखते हुए लिखी होगी. मैं उनकी यह कविता उनको और उनकी बिरादरी को समर्पित करता हूँ. कविता का शीर्षक है -"इतना तो लोग जानते ही हैं"....  

आचार्य
दुनिया जहान की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं
एक ही कविता और कहानी की
अनेक व्याख्याएं और प्रतिव्याख्याएं कर सकतें हैं
आदर्श और नैतिकता की उनसे अच्छी व्याख्या
कोई क्या कर सकता है

पर अपने जीवन में इसका उलट व्यवहार करते हैं वे
व्याख्या की अद्भुत क्षमता
राजनीति और षडयंत्र द्वारा अर्जित शक्ति के नाते
उनकी पूछ और ज़रुरत बनी रहती है

लोग उनसे डरते हैं, क्योंकि
उन्हीं से अपना काम निकालना होता है
इसलिए कोई कुछ नहीं कहता, पर

इतना तो लोग जानते ही हैं कि
ऐसे लोग किसी का आदर्श नहीं बन सकते
आदर्श बनने के लिए नैतिक आचरण देखते हैं लोग
अनैतिक आचरण से उपजी शक्ति नहीं, और
आचार्य हैं की आचरण में नहीं, शक्ति में विश्वास करते हैं

(दुर्गाप्रसाद गुप्त)  


Comments

Popular posts from this blog

‘देह ही देश’ भग्न देह और विदीर्ण मन का कोलाज आज जब पूरा विश्व साम्राज्यवादी-उग्र राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों और धार्मिक-सांप्रदायिक हिंसा की कार्रवाइयों के साथ-साथ विश्वयुद्ध के ख़तरे की ओर लगातार बढ़ रहा है ; ऐसे समय में युद्ध एवं युद्धनीति की क्रूर सच्चाई बयाँ करती गरिमा श्रीवास्तव की क्रोएशिया प्रवास-डायरी ‘देह ही देश’ वैश्विक साम्राज्यवादी साजिशों एवं षड्यंत्रों से संचालित फासीवादी राष्ट्रवाद के ख़तरों की तरफ इशारा करती है। यह किताब ‘वृहद स्वच्छ सर्बिया’ के नाम पर बोस्निया, हर्जेगोविना, क्रोएशिया की निर्दोष और मासूम जनता के साथ किये जाने वाले बर्बरतम अत्याचारों का ज्वलंत दस्तावेज है। ‘ देह ही देश ’ में सर्ब सैनिक तथा सर्ब प्रतिवेशियों द्वारा स्त्रियों के सामूहिक बलात्कार, एथनिक क्लींजिंग, धार्मिक जेनोसाइट के ब्यौरे गहरी संवेदनात्मक संलग्नता के साथ प्रस्तुत किए गए हैं। किताब में आँकड़े, रिपोर्ट, इंटरव्यू, बातचीत के माध्यम से बताया गया है कि 1991-95 के बीच ‘ग्रेटर सर्बिया’ के नाम पर सर्बियाई जनता के मन में उग्र राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भर दिया गया और उसके बाद शुरू हुआ स्त्रियों के ...

रेडियो का वक़्त - ब्रेख्त

फासीवाद के चरमकाल में जर्मनी के ब्रेख्त ने कई नाटक लिखे । इनमें से कुछ नाटकों का अनुवाद अमृतराय ने 'खौफ़ की परछाइयाँ' नाम से किया ।  वैसे तो इस संग्रह के सभी नाटक महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन इस समय मैं आपके सामने एक नाटक को रखता हूँ।  नाटक का शीर्षक-  'रेडियों का वक्त' । भले ही यह नाटक फासीवादी दौर का है लेकिन आप जब इससे होकर गुजरेंगे तो आपको लगेगा यह नाटक तो हमारे समय का है । यह नाटक तो  दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की कहानी कह रहा है ।   आप इस नाटक से होकर गुजरते जाइए आपको महसूस होगा कि नाटक का मुख्य पात्र तो आपका जाना पहचाना है । आपको महसूस होगा कि आप तो उसे रोज टी.वी. पर देखते हैं । आपको महसूस होगा कि इस नाटक  अनाउंसर  तो दिनभर प्राइम टाइम तथा अन्य तमाम बहसों में दिखता रहता है ।     रेडियो का वक़्त   (एक कारखाने में शॉप सुपरिटेंडेंट का दफ्तर। एक रेडियो अनाउंसर हाथ में माइक्रोफोन लेकर एक अधेड़ मजदूर, एक बुड्ढी मजदूरनी और एक कम उम्र मजदूरनी से बातचीत करता है। इन लोगों से पीछे की ओर एक कारखाने का अफसर और एक नाजी सैनिक की पोशाक...