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"यह समझने के लिए कि मैं क्या कहता हूँ, किसी को भी मेरा आचरण देखना होगा..."- महात्मा गांधी के इस कथन के ठीक बाद, मैं यहाँ एक बड़े आचार्य मने एक प्रोफेसर साहब की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ. शायद उन्होंने यह कविता दीक्षा ग्रहण करते समय अपने किसी आचार्य को ध्यान में रखते हुए लिखी होगी. मैं उनकी यह कविता उनको और उनकी बिरादरी को समर्पित करता हूँ. कविता का शीर्षक है -"इतना तो लोग जानते ही हैं"....  

आचार्य
दुनिया जहान की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं
एक ही कविता और कहानी की
अनेक व्याख्याएं और प्रतिव्याख्याएं कर सकतें हैं
आदर्श और नैतिकता की उनसे अच्छी व्याख्या
कोई क्या कर सकता है

पर अपने जीवन में इसका उलट व्यवहार करते हैं वे
व्याख्या की अद्भुत क्षमता
राजनीति और षडयंत्र द्वारा अर्जित शक्ति के नाते
उनकी पूछ और ज़रुरत बनी रहती है

लोग उनसे डरते हैं, क्योंकि
उन्हीं से अपना काम निकालना होता है
इसलिए कोई कुछ नहीं कहता, पर

इतना तो लोग जानते ही हैं कि
ऐसे लोग किसी का आदर्श नहीं बन सकते
आदर्श बनने के लिए नैतिक आचरण देखते हैं लोग
अनैतिक आचरण से उपजी शक्ति नहीं, और
आचार्य हैं की आचरण में नहीं, शक्ति में विश्वास करते हैं

(दुर्गाप्रसाद गुप्त)  


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