फासीवाद के चरमकाल में जर्मनी के ब्रेख्त ने कई नाटक लिखे। इनमें से कुछ नाटकों का अनुवाद अमृतराय ने 'खौफ़ की परछाइयाँ' नाम से किया। वैसे तो इस संग्रह के सभी नाटक महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन इस समय मैं आपके सामने एक नाटक को रखता हूँ। नाटक का शीर्षक- 'रेडियों का वक्त'। भले ही यह नाटक फासीवादी दौर का है लेकिन आप जब इससे होकर गुजरेंगे तो आपको लगेगा यह नाटक तो हमारे समय का है। यह नाटक तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की कहानी कह रहा है। आप इस नाटक से होकर गुजरते जाइए आपको महसूस होगा कि नाटक का मुख्य पात्र तो आपका जाना पहचाना है। आपको महसूस होगा कि आप तो उसे रोज टी.वी. पर देखते हैं।आपको महसूस होगा कि इस नाटक अनाउंसर तो दिनभर प्राइम टाइम तथा अन्य तमाम बहसों में दिखता रहता है।
रेडियो
का वक़्त
(एक कारखाने में शॉप सुपरिटेंडेंट का दफ्तर। एक
रेडियो अनाउंसर हाथ में माइक्रोफोन लेकर एक अधेड़ मजदूर, एक बुड्ढी मजदूरनी और एक कम
उम्र मजदूरनी से बातचीत करता है। इन लोगों से पीछे की ओर एक कारखाने का अफसर और एक
नाजी सैनिक की पोशाक पहने एक मोटा-तगड़ा आदमी खड़ा है।)
अनाउंसर: हम लोग पहियों की गड़गड़ाहट और इधर-उधर
आने-जानेवाली चीजों की चरमराहट के बीच खड़े हैं। हमारे चारों ओर बहुत जांफ़िशानी से
और मन लगाकर काम करने वाले भाई हैं जो अपनी प्यारी पितृभूमि को जरूरत की चीजें
मुहैया करने में लगे हुए हैं। आज इस समय सुबह हम फुक्स स्पिनिंग मिल्स लिमिटेड में
हैं और गोकि काम मुश्किल है और अंग-अंग को थका देने वाला है तब भी हमारे पास जितने
लोग खड़े हैं उनमें सभी के चेहरे पर प्रसन्नता और संतोष लहरा रहा है। लेकिन हम
अपने साथियों को खुद ही बोलने का मौका देना चाहते हैं। (बुड्ढे मजदूर से) आप इस
कारखाने में 21 बरस काम कर चुके हैं। क्या नाम है आपका, हर......?
बुड्ढा मजदूर: सडैलमायर।
अनाउंसर: हर सडैलमायर ! यह क्या बात है कि हमें
यहाँ प्रसन्न और संतुष्ट चेहरे ही दीख रहे हैं?
बुड्ढा मजदूर: (सोचकर) वह हर वक्त आपस में हँसी-दिल्लगी
किया करते हैं।
अनाउंसर: हाँ, यही
बात है। और इसी तरह के हँसी-मजाक के वातावरण में काम बहुत सहूलियत से होता है,
क्यों? राष्ट्रीय समाजवाद किसी तरह की निराशा
का नाम नहीं जानता, तुम्हारे कहने का मतलब यही है न? पहले तो
ऐसा कभी नहीं होता था। नहीं होता था न?
बुड्ढा मजदूर: नहीं, कभी नहीं।
अनाउंसर: तुम्हारे कहने का मतलब है कि वाइमार
प्रजातंत्र के समय में कुछ था ही नहीं जिसमें हर मजदूर हँसता, खुश होता। तब वे पूछा करते थे हमारे काम का क्या उद्देश्य है?
बुड्ढा मजदूर: हाँ, ऐसे कुछ लोग हैं जो यह कहते हैं।
अनाउंसर: क्या कहा! ओह, हाँ, तुम्हारा इशारा उन
लोगों की तरफ है जो हमेशा गड़बड़ मचाए रहते हैं और यहाँ-वहाँ छिटपुट पाए जाते हैं।
मगर ऐसे लोगों की तादाद कम ही होती है, क्योंकि हमारे
राष्ट्र की बाग-डोर एक बार फिर मजबूत हाथों में चली जाने से राष्ट्र लगातार उन्नति
करता जा रहा है। तुम्हारे कहने का यही मतलब था न? हाँ फ्राउलाइन,
क्या नाम है तुम्हारा......?
मजदूरनी: श्मिट।
अनाउंसर: फ्राउलाइन श्मिट। हमारी किस बड़ी लोहे
की मशीन पर तुम काम करती हो?
मजदूरनी: (जैसे रटा हुआ पाठ सुना रही हो) और फिर
अपने काम की जगह को सजाने का काम भी तो है; हमें बड़ा आनंद आता है। हमने आपस में
चंदा करके फ्यूरर की तस्वीर मंगायी है और हमें अपने जिरेनियम के पौधे पर भी घमंड
है। उन्होंने कारखाने के नीरस वातावरण में जान डाल दी है-यह फ्राउलाइन किंज का
सुझाव था।
अनाउंसर: अच्छा तो तुम लोग अपने काम की जगह को
खेतों के उन हसीन बच्चों, फूलों से सजा रही हो? जब से जर्मनी
की किस्मत ने पलटा खाया, तब से कारखाने में और भी तब्दीलियां
हुई होंगी?
अफसर: नहानघर।
मजदूरनी: नहानघर की बात डिक्टेटर साहब, हर ब्राउश्ल को खुद सूझी और हम उनका शुक्रिया अदा करना चाहते हैं। कोई भी
उन खूबसूरत नहानघरों में जाकर नहा सकता है, अगर बहुत ज्यादा
भीड़ ना हो और आने-जाने का रास्ता ही बंद न हो जाय।
अनाउंसर: शायद सभी पहले पहुंचने की कोशिश में
रहते हैं। काफी पुरलुत्फ ठेल-ठाल रहती होगी, क्यों?
मजदूरनी: पाँच सौ बावन लोगों के लिए सिर्फ छः कमरे
हैं। हर रोज अच्छा खासा दंगा मजा रहता है। बहुतों को तो उसकी जरा-सी परवाह नहीं
है।
अनाउंसर: लेकिन सब काम बड़ी सहूलियत से होता
चलता है। और हमें कुछ बातें.....क्या नाम है?
मजदूर: मान।
अनाउंसर: मान? अच्छा
तो हर मान, आपका क्या ख्याल है। कारखाने में जो बहुत-सी
नई-नई तरक्कियां हुई हैं, उनसे आपके साथी मजदूरों पर कैसा
असर पड़ा है?
मजदूर: यानी?
अनाउंसर: यानी, आपको इस बात की खुशी है न कि
तमाम कलें चलने लगी हैं और सब लोग काम में लगे हुए हैं।
मजदूर: हाँ।
अनाउंसर: और इस बात की भी कि हफ्ते के आखीर में
हर शख्स अपनी तनख्वाह का लिफाफा ले आता है? हमें यह न भूलना
चाहिए।
मजदूर: हाँ।
अनाउंसर: पहले ऐसा नहीं था। वाइमार प्रजातंत्र
के समय बहुत से साथियों को भीख के तल्ख टुकड़े तोड़ने पड़ते थे और तनख्वाह भी कितनी
कम मिलती थी।
मजदूर: साढ़े अठारह मार्क और कोई कटौती नहीं।
अनाउंसर: (बनावटी हँसी हँसकर) हा हा हा ! अच्छी
मजाक की बात कही? कटौती के लिए तब था ही क्या !
मजदूर: अब तो खूब गुंजायश है कटौती की ! (कारखाने
का अफसर आगे बढ़ता है। वर्दी वाला मोटा आदमी भी)
अनाउंसर: और इस तरह फ्यूरर के राज्य में सब को
नौकरी मिली और सब अपनी रोजी कमाने लगे। तुम बिल्कुल ठीक कहते हो.... क्या नाम है
तुम्हारा ! अब कोई कल बेकार नहीं पड़ी हैं और एडोल्फ हिटलर के जर्मनी में किसी आदमी
को बेकार नहीं रहना पड़ता। (वह मजदूर को माइक्रोफोन से खींचकर अलग करता है।) दिमाग
और हाथ से काम करने वालों, मिलकर अपनी प्यारी जर्मन पितृभूमि के पुनर्निर्माण के
लिए आगे बढ़ो। हाइल हिटलर !


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