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                                              ख़ुद को सेंसर करता कवि


पिछले दिनों शोधार्थी समूह दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ने अमित धर्मसिंह को कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधरत अमित कुमार उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर से संबंधित हैं। इनका एक काव्य-संग्रह ‘आस-विश्वास’ प्रकाशित हो चुका है। 11-10-2017 शोधार्थी समूह ने इनकी कविताओं पर चर्चा-परिचर्चा रखा। कार्यक्रम में उपस्थित साथियों के द्वारा इन कविताओं पर जो बातचीत हुई उसे यहाँ साझा कर रहा हूँ साथ ही आपके सामने अमित की कुछ चुनिंदा कविताओं को रख रहा है जिससे आपलोगों को बातचीत को समझने में सहूलियत होगी। कविताओं को पढने के बाद आप भी इस बातचीत का हिस्सा बन सकते हैं...

युवा कवि अमित धर्मसिंह 


ख़ुद को सेंसर करता कवि

11.10.2017 को शोधार्थी समूह, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली द्वारा आयोजित कविता पाठ और परिचर्चा में युवा कवि अमित धर्मसिंह ने अपनी कविताओं का पाठ किया, उसके बाद कला संकाय के स्पीक मैके लान में उपस्थित साथियों ने अमित की कविताओं पर गंभीर बातचीत की। कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत से पहले लान में उपस्थित सारे साथियों ने बिलासपुर की दिवंगत छात्रा पूनम चंद्रा को याद किया। अपनी कुछ चुनिंदा कविताओं को हमलोगों के सामने रखने से पहले अमित धर्मसिंह ने यह ताकीद कर दी कि मेरी कविताओं में कोई वैचारिक आग्रह नहीं है।
कविता पर परिचर्चा की शुरुआत करते हुए शोधार्थी दिनेश कबीर ने ‘बरसात’, ‘कूड़ी के गुलाब’, ‘जीवंत दस्तावेज’ एवं ‘हमारे गाँव में हमारा क्या है’ में हासिये के समाज के संघर्ष और उसकी पीड़ा को रेखांकित किया और साथ ही ‘बहनें’ कविता पर बात करते हुए एक जरूरी बहस की शुरुआत की। दिनेश ने ‘बहनें’ कविता में व्यक्त त्याग एवं समर्पण में पुरुषसत्ता के आग्रह को देखा। इस जरूरी बातचीत को बढ़ाते हुए छात्र एवं रंगकर्मी सोनू ठाकुर दिनेश कबीर से असहमत होते हुए इस बात पर जोर दे रहे थे कि कविता में आए समर्पण एवं त्याग को संवेदना के स्तर पर देखा जाना चाहिए; कविता चूँकि निम्न-मध्यवर्गीय परिवार के सूख चुकी स्मृतियों की कहानी कह रही है इसलिए समर्पण एवं त्याग को उसके कहन में देखा जाना चाहिए। शोध छात्र सुधांशु ने इस बहस को आगे बढ़ाते हुए इस बात की ओर इशारा किया कि पितृसत्ताक संरचना में हमारी संवेदनाओं से लेकर हमारी स्मृतियाँ, भाव-विभाव, संचारी भाव आदि पुंसवादी वर्चस्व से ही संचालित होते हैं। सुधांशु ने आगे कहा कि लेखक का दायित्व इस तरह के किसी भी वर्चस्ववादी संरचना को चिन्हित करना और उसे तोड़ना होता है। युवा कवयित्री डॉ अनुपम सिंह ने अमित की कविताओं के बारे में अपनी बात रखते हुए कहा कि भावनात्मक संबंध एवं संबंधों की मधुरता कविताओं में होती है लेकिन कविता सिर्फ यही नहीं होता। अनुपम सिंह ने अमित धर्मसिंह को कविताओं के शिल्प पर काम करने की सलाह भी दी।
इतिहास विभाग के शोधार्थी संदीप शर्मा ने ‘जीवंत दस्तावेज’ शीर्षक कविता पर बात करते हुए सिंधु सभ्यता से होते हुए मौर्यकाल एवं गुप्तकाल के उन दस्तावेजों की ओर हमलोगों का ध्यान खींचा जिनमें कामगारों के नामों का किंचित उल्लेख मिलता है। साथ ही उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में अभी गंभीरता से और सोचने-समझने की जरूरत है। शोध-छात्र एवं रंगकर्मी ललित कुमार सिंह ‘मेरा डर’ शीर्षक कविता पर बात करते उसे भारत के समकालीन परिदृश्य से जोड़ा। शोधार्थी अशोक बंजारा अमित धर्मसिंह की कविता पर बोलते हुए अमित की कविताओं में अतीत की स्मृति, भाव-विचार तथा सांस्कृतिक आदर्शों को देखा। इस बातचीत के दौरान उपस्थित सभी साथियों ने कमोबेश ‘बरसात’, ‘बहनें’, ‘जीवंत दस्तावेज’, ‘दो रंग का लिखने वाली कलम’, ‘हमारे गाँव में हमारा क्या है’ कविताओं पर गंभीरता से चर्चा-परिचर्चा की। शोधार्थी विपिन प्रसाद ने कविता में किसानी जीवन और कृषक चेतना को रेखांकित किया। शोध छात्र मिथिलेश ‘हमारे गाँव में हमारा क्या है’ शीर्षक कविता एवं ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘ठाकुर का कुआँ’ को सामने रखकर पढ़ने को प्रस्तावित किया। साथ ही मिथिलेश ‘विमर्शों की लड़ाई’ शीर्षक कविता से पूरी तरह असहमत हुए। जिसके बाद बातचीत में सबाल्टर्न विमर्श पर छिटपुट बहस भी हुई। इस बहस को इस आश्वासन के साथ रोका गया कि ‘शोधार्थी समूह’ अगला कार्यक्रम विमर्शों की लड़ाई पर ही रखेगा।

पूरी चर्चा-परिचर्चा का समाहार युवा चिंतक डॉ रामनरेश राम एवं युवा आलोचक डॉ आशीष मिश्र करना था। अपनी बात की शुरुआत करते हुए करते हुए डॉ रामनरेश राम ने कहा कि स्मृति सबाल्टर्न विमर्श का महत्त्वपूर्ण बिंदु रहा है। रामनरेश जी कविता के मर्म तक पहुँच कर इस बात को सामने लाते हैं कि कवि ख़ुद को सेंसर कर रहा है। कविता में संवेदना तो है लेकिन आक्रमकता एवं सचेतनता की कमी दिखती है, बदलाव की अकुलाहट एवं छटपटाहट नहीं दिखती। चूँकि वैचारिक सेंसरसिप एवं स्मृति के दवाब से कविता का निर्माण हो रहा है इस कारण ‘बहनें’ शीर्षक कविता पितृसत्ता के आग्रह को तोड़ नहीं पाती। रामनरेश जी कवि को सुझाव देते हुए कहते हैं कि वैचारिक सेंसरसिप को तोड़ने से बात और स्पष्ट हो सकती है। यह पर हम बताते चले कि कवि अपना परिचय देते हुए इस बात जोड़ देते हैं कि मेरी कविताओं में कोई वैचारिक आग्रह नहीं दिखेगा।
डॉ आशीष मिश्र ने बातचीत की शुरुआत में ही ‘बहनें’ कविता पर चल रही बहस को ध्यान में रखते हुए कहा कि कविताएँ कथ्य में नहीं उसकी व्यंजनाओं में होती है और साथ ‘बहनें’ कविता का फिर से पाठ किया। कविता की भाषा के माध्यम से अमित की कविता में पश्चिमी उत्तरप्रदेश के निम्नवर्ग एवं निम्न-मध्यमवर्ग को रेखांकित करते हुए कविता को सहज बताया; लेकिन साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि सहज हमेशा पॉजिटिव हो यह जरुरी नहीं है। डॉ आशीष ने अपनी बात को बढ़ाते हुए कहा कि वैचारिक सेंसरसिप एवं बौद्धिक लड़ाई से कटाव के कारण अमित की कविता ना तो संवेदना के स्तर पर गहरी हो पा रही है और ना ही कोई बौद्धिक फ्लेश ही दे पा रही है। डॉ आशीष अमित धर्मसिंह को सुझाव देते हुए उन बाजारवादी साजिशों एवं फासीवादी प्रोपेगेंडा से भी अवगत कराया जो कि पिछले पांच-सात खूब फला-फूला है। युवा कवि अमित धर्मसिंह को सुझाव देते हुए उन्होंने ने बताया कि बाजारवादी ताकतें बुद्धिजीवियों एवं विचारकों को कमतर आंकने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रच रही हैं लेकिन हम पढ़े-लिखे लोगों का कर्त्तव्य है कि हम बौद्धिक संघर्ष में भाग लें एवं जमीनी स्तर पर लड़ाई लड़ने के लिए तैयार रहे...   

१ बहनें 

बहनें शांत हैं
सौम्य और प्रसन्नचित्त भी;
उनके चेहरे की उजास
कम नहीं हुई
दुनियाभर की
झुलसाहट के बाद ।

बहनें
हमारे हाथ में
बाँधती हैं रक्षासूत्र;
करती हैं कामना
हमारी सुरक्षा की ।

बहनें हमारे घर में नहीं रहतीं
ख्याल में नहीं आतीं
सपने में भी कहाँ आती हैं बहनें;
पता नहीं
किस चोर दरवाज़े से
ले जाती हैं हमारी बलाएँ ।

माँ की नसीहत
पिता की डाँट
भाई की झल्लाहट के बाद भी
खुश दिखतीं हैं बहनें
हमारी ख़ुशी के लिए।

हमारी ख़ुशी के लिये
अपनी ख़ुशी
अपने सपने
अपना मन मारती हैं बहनें

बहनें हमारे पास नहीं
साथ होती हैं
अपनी उपस्थिति
दर्ज़ कराये बगैर ।

सच !
हमसे छोटी हों
या बड़ी ;
हर हाल में
हमसे बड़ी
होती हैं बहनें ।।

२ जीवंत दस्तावेज़
              (पुरखों को समर्पित)

मैंने तुम्हें
बक्से में ढूंढा,
शायद तुम्हारा कोई फोटो हो,
नहीं मिला,
घर में कभी नहीं रही
कोई एलबम।
अख़बारों में कहाँ छपे तुम
जो ढूंढता कतरने,
अखबार तो घर
आया तक नहीं,
आता भी क्यों
तुम पढ़े-लिखे ही कहाँ थे।

स्कूल,
मंदिर,
धर्मशालाओं के शिलालेखों में
नहीं मिला तुम्हारा नाम,
मिलता भी कैसे?
तुमने थोड़े ही बनवाया था इन्हें।
ईंट-गारा पकड़ाने वालों की
कहानी कहाँ लिखी जाती है
शिलालेखों में??

हड़प्पा, सिंधु, मोहनजोदड़ो
हर सभ्यता, घाटी में मौजूद थे तुम,
लेकिन किसी की खुदाई में नहीं मिले
तुम्हारे अवशेष।

तुम्हारे किस्से
ताम्रपत्रों, सिक्कों, मोहरों,
या किसी प्रशस्ति पत्र पर,
गुदे नहीं मिले।

धर्म की,
साहित्य की,
इतिहास की
किसी किताब में नहीं
तुम्हारा उल्लेख,
न कम न ज्यादा।

स्कूल से लेकर
खत्ते-खतौनियों तक के
रजिस्टर में
नहीं चढ़ाया गया
तुम्हारा नाम।

फिर भी
मैं जानता हूँ
तुम थे,
आज भी हो,
मेरी शक्ल में,
मैं तुम्हारे होने का सुबूत हूँ,
लाख मिटाए जाने के बाद
जीवंत दस्तावेज़ हूँ
तुम्हारे होने का।।

३ कूड़ी के गुलाब

हम !
गमले के गुलाब की तरह नहीं,
कुकुरमुत्ते की तरह उगे ।
माली के फव्वारे ने
नहीं सींचीं हमारी जड़ें,
हमारी जड़ों ने
पत्थर का सीना चीरकर
खोजा पानी
कुटज की तरह ।

कुम्हार के हाथों ने नहीं गढ़ा ,
वक़्त के थपेड़ों ने सँवारा हमें ।

किसी की ऊँगली पकड़ने से ज्यादा
हम अपनी ठोकरों से सम्भले ।

हमारी हड्डियों ने कैल्शियम
गोलियों या सिरप से नहीं ,
मिट्टी खाकर प्राप्त किया ।

ज़मीन पर नंगे पाँव चलते
या तसले में
'करनी' की करड़-करड़ से
आज भी नहीं
किटकिटाते हमारे दाँत ।

मिट्टी में जन्मे,
मिट्टी में खेले ,
मिट्टी खाकर पले,
इसलिए मिट्टी से
गहरा रिश्ता है हमारा ।

बेशक आसमान का
इंद्रधनुष कोई हो !
ज़मीन पर-
'कूड़ी के गुलाब'
और
'गुदड़ी के लाल'
हम ही हैं ।।

४ दो रंग का लिखने वाली कलम

हम जब छोटे थे
तो अपने दोस्त को
यह कहकर बेवक़ूफ़ बनाते थे-
ओ देख बे मैं इस नीले पेन से
लाल लिख दूँगा,
उसको लगता
नीला चलने वाला पेन
लाल कैसे लिख सकता है,
वह हमें लाल लिखने को कहता,
हम झट से कॉपी पर लिखते "लाल"
और पूछते-
बता बे ये क्या लिखा?
"लाल", कहकर वह कहता
मैं तो समझा था कि तुम
नीली स्याही वाले पेन से
लाल रंग का लिखोगे।
मगर फिर कौन सुनता,
सब उसकी मज़ाक बनाते,
जबकि वह सही होता,
कि एक रंग की स्याही वाले पेन से
कहाँ लिखा जा सकता है
दो रंग का।

मगर अब ऐसा नहीं
अब एक ही रंग की स्याही से
लिखा जा सकता है कई रंग का,
कम से कम
दो रंग का तो लिखा ही जा सकता है,
आप कह सकते हैं
आदमियों की तरह
कलम भी हो गयी है दोगली,
स्याह को श्वेत और
श्वेत को स्याह करना
खूब आता है अब कलम को।

यह कमाल कलम का नहीं
कलमकार का है,
वही लिख सकता है
एक रंग की स्याही से कई रंग का,
वो भी ठोस प्रामाणिकता
और पूरे दावे के साथ,
और हाँ उसी की कलम को
शब्बीरपुर पर मार सकता है लकवा
तो बनारस पर चल सकती है धाराप्रवाह।।

५  विमर्शों की लड़ाई

आओ बैठे
उन मुद्दों पर चर्चा करें
जिनका हल नहीं खोजना,
बस उलझाये रखना है।

क्रांति, आंदोलन, विद्रोह को
दबाये रखने का यही
बेहतर उपाय है कि,
उन पर विमर्श चलाया जाए।

विमर्श भी ऐसा कि
ज़िन्दगी पूरी हो,
मगर विमर्श ख़त्म न हो।

जिनकी आवाज़ बुलंद है,
जिनकी बात में वज़्न है,
जिनके लिखने में धार है,
या जिन्हें सच देखने
और लिखने की आदत हो चुकी है,
सबको विमर्श में घसीटे
और कुछ सौदे करे।

कुछ सम्मान उन्हें दें
कुछ सम्मान उनसे लें,
उपाधियों और पुरस्कारों को
आपस में बाँटे।

ख़ुशी-ख़ुशी
परेशान लोगों को बताएँ-
यहाँ सब ठीक है,
हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं
वे बस धैर्य बनाये रखे,
संयम न खोये,
हम उनके लिये
आखिरी साँस तक लड़ेंगे।।

६ नींव की ईंट

नींव की ईंट
दिखाई नहीं देती
न टकराती है पाँव से ।
ज़मीदोज़ नींव की ईंट
संभाले रहती है
इमारत को पीठ पर ।

चूँ-चिकारा तो दूर
करवट लिए बगैर
चुपचाप गलती रहती है
नींव की ईंट
इमारत के नीचे ।

नींव की ईंट होती है
तो इमारत होती है,
इमारत नहीं रहती
तो भी रहती है
नींव की ईंट ।

इमारत भले ही
नींव की ईंट का पता न दे,
इमारत का सही पता
नींव की ईंट ही देती है
इमारत के
न रहने पर भी ।।

७ हमारे गाँव में हमारा क्या है !

आठ बाई दस के 
कड़ियों वाले कमरे में पैदा हुए,
खेलना सीखा तो
माँ ने बताया
हमारे कमरे से लगा कमरा
हमारा नहीं है,
दस कदम की दूरी के बाद
आँगन दूसरों का है।
हर सुबह
दूसरों के खेतों में
फ़ारिग़ होने गये
तो पता होता कि खेत किसका है
उसके आ जाने का डर
बराबर बना रहता।
तोहर के पापड़ों पर लपके,
या गन्ने पर रीझे
तो माँ ने आगाह किया कि
खेतवाला आ जायेगा।
दूसरों के कुबाड़े से
माचिस के तास चुगकर खेले
दूसरों की कुड़ियों से
पपैया फाड़कर बजाया
दूसरों के खेतों से बथुआ तोड़कर लाये,
आलू चुगकर लाये,
दूसरों के खेतों में ही
गन्ने बुवाते
धान रोपते, काटते,
दफन होते रहे हमारे पुरख़े
दूसरों के खेतों में ही।
ये खेत मलखान का है
वो ट्यूबवेल फूलसिंह की है
ये लाला की दुकान है
वो फैक्ट्री बंसल की है
ये चक धुम्मी का है
वो ताप्पड़ चौधरी का है,
ये बाग़ खान का है,
वो कोल्हू पठान का है,
ये धर्मशाला जैनियों की है,
वो मंदिर पंडितों का है,
कुछ इस तरह जाना
हमने अपने गाँव को।
हमारे गाँव में हमारा क्या है!
ये हम आज तक नहीं जान पाए।

८ बरसात

हमारी छोटी उम्र में
बरसात बड़ी मुश्किलें लेकर आती।
हालांकि हमने
बरसात में कागज़ की नाँव चलाई,
गलियों में भरे पानी में उछले-कूदे,
ओले चुगकर खाये,
बारिस बंद करवाने के लिए
उलटे तवे-परात बजाये,
मगर यह सब ज्यादा दिन नहीं चला।

हमारे कमरे की छत
घंटे दो घंटे की बारिश ही सह पाती,
झड़ लगता तो हमारी शामत आ जाती,
छत से पानी टपकना शुरू होता तो
सबसे पहले पापा चूने वाली जगह को
लाठी से ठोकते,
ताकि चूने वाला स्थान उभारकर
छत का चूना बंद किया जा सके।

विफल होने पर
कोई कट्टा या बोरी ओढ़कर
घुप अँधेरी रात में ही छत पर चढ़ा जाता,
हाथ से पूरी छत लेहसी जाती।
छत पर चढ़ने-उतरने के लिये
दीवार में निकली ईंटों का प्रयोग होता,
जिनसे रिपटने का खतरा बराबर बना रहता।

तिस पर छत का टपकना बढता जाता,
पूरी छत जगह-जगह से टपकने लगती,
छोटे से कमरे में जगह-जगह
बाल्टी, तसला, भिगौना, आदि रखे जाते,
जिनका पानी बार-बार बाहर फेंकना होता।
फिर भी नौबत
घर में रखे बर्तनों और कपड़ो के
भीगने की आ जाती,
एक खाट दरवाजे के बीचोबीच बिछाई जाती,
जो आधी कमरे में
और आधी बाहर छप्पर में होती,
यही स्थान पानी के चूने से बचा रहता,
इसी खाट पर काम की चीजें
और हम बच्चे सिमटने लगते,
बाकी सब अपनी-अपनी जगह
खामोश भीगते हुए
बारिश बंद होने की बाट जोहते।

भीगते-भीगते हम एक-दूसरे पर
अपनी-अपनी खीज निकालते,
माँ कहती-
इतने दिन हो गये नाशगये को
दूसरों के घर बनाते-बनाते
आज तक अपनी छान पर
ढंग का फूस तक नी डाल सका,
हममें से कोई कहता-
हर बार का यो ही ड्रामा है
एक पन्नी तक नी लाके रखी जा सकती ?
पापा चुपचाप कपड़े संगवाने में लगे रहते
माँ बड़बड़ाती हुई
बर्तन-भांडे सवारती।
माँ की आँख से टपकते आँसू
बारिश के पानी में धुलते रहते।
हम बच्चे एक-दूसरे का मुँह ताकते हुए
पसर जाने की
जगह बनाने के जुगाड़ में लगे रहते;
पूरी-पूरी रात ऐसे ही निकल जाती।

सर्दियों की बारिश में
रिजाई का निचोड़ना सबसे भारी पड़ता।
धीरे-धीरे भीगती रिजाई में
पापा का सुनाया किस्सा याद आता-
'एक साल बहुत ओले पड़े,
हमारे पास बड़ी ठाड़ी भूरी भैंस थी,
कमरे में एक भैंस के खड़े होने की ही जगह थी,
उस रात नन्नो बुढ़िया की लड़ाकू भैंस
खुंटा तुड़ाके हमारे घर में घुस आयी,
काफी कोसिस के बाद
वो घर से ना निकली,
सारी रात भूरी भैंस
छप्पर में खड़ी-खड़ी ओलों में छितती रही,
रींकती रही;
सुबह तक न छप्पर पर फूस बचा
न भूरी भैंस पर खाल।
मरी ही निकली बिचारी भूरी भैंस।'

रिजाई पर पड़ती
बारिश की एक-एक बूँद हमें
भूरी भैंस की पीठ पर पड़ते
ओले की तरह महसूस होती,
मन भीतर-भीतर रींकता रहता।। 


Comments

  1. हाँ हमने देखा-जाना है सुजडू गाँव के रहने वाले अमित को
    कवि बनने चला था, सचमुच कवि बन गया।
    सच्चा कवि

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  2. हाँ हमने देखा-जाना है सुजडू गाँव के रहने वाले अमित को
    कवि बनने चला था, सचमुच कवि बन गया।
    सच्चा कवि

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  3. अमित धर्मसिंह की कविताएं अपने समय को बहुत बारीकी से दर्ज करती हैं। उनके व्यक्तित्व की छाप उनकी कविताओं में भी दिखाई देती है। इसीलिए उनकी भाषा का तेवर सादगी से ओत प्रोत है। उपर्युक्त अकादमिक बहस में उन्हें कविता के शिल्प पर काम करने की सलाह दी गई है। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि शिल्प की कलाकारी के चक्कर में मूल कथ्य गौण हो जाता है। अमित अपने कथ्य को लेकर बहुत स्पष्ट हैं। शोषितों की पीड़ा से लबरेज़ उनकी कविता आक्रामक रुख न अपनाकर व्यवस्था पर बहुत ही सलीके से सवाल उठाती है।

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  4. अमित धर्मसिंह की कविताएं अपने समय को बहुत बारीकी से दर्ज करती हैं। उनके व्यक्तित्व की छाप उनकी कविताओं में भी दिखाई देती है। इसीलिए उनकी भाषा का तेवर सादगी से ओत प्रोत है। उपर्युक्त अकादमिक बहस में उन्हें कविता के शिल्प पर काम करने की सलाह दी गई है। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि शिल्प की कलाकारी के चक्कर में मूल कथ्य गौण हो जाता है। अमित अपने कथ्य को लेकर बहुत स्पष्ट हैं। शोषितों की पीड़ा से लबरेज़ उनकी कविता आक्रामक रुख न अपनाकर व्यवस्था पर बहुत ही सलीके से सवाल उठाती है।

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  5. कुछ महीनें पहले फ़ेसबुक पर अमित जी की कविता'हमारे गांव में हमारा क्या है'पढ़ने को मिली थी तो रूह कांप उठी थी। आज ब्लॉग पर'बरसात'कविता पढ़कर आँखें भर आयी।

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  6. अमित की कविताएँ अपनी कहन और गठन के साथ बेहद प्रभावित करती हैं... अमित ने वैचारिकी को लेकर बेशक कुछ कह दिया हो लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि उनकी कविता पर विचारहीनता या बौद्धिकता का फ़्लैश न देने का आरोप लगा दिया जाये... कम से कम उनकी कविताओं को पढने के बाद यह बात स्पष्ट हो जाती है की उनकी कविता पाठक के मन में स्फुल्लिंग अवश्य छोड़ जाती हैं और कविता पाठक के मन में लगातार यात्रा करती हैं...
    संभवतः जिस सेंसरशिप की बात की गयी है, वह कविता की सीमा भी है... कविता को कविता बने रहने के लिए इस सीमा के इर्द-गिर्द रहना ही होता है... इस सीमा को अधिकतम कितना विस्तार दिया जा सकता है, इसका निर्णय स्वयं कवि कर सकता है... अपने अनुभवों की प्रामाणिकता को सुरक्षित रखते हुए कविता को जिस जिस कौशल से वैचारिक संवेदना में परिणत करना है, उसे अमित बहुत तेजी से सीख भी रहे हैं और प्रयोग भी कर रहे हैं....

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