Skip to main content

Posts

Showing posts from August, 2018
हिंदी में जब कोई काव्य संग्रह आता है तो अक्सर तमाम पाठक-लेखक एक वाक्य शगल की तरह दुहराते हैं कि किसी एक संग्रह में अगर 2-4 कविताएं ढंग की हों तो उस संग्रह को सफल मानना चाहिए .  पिछले दो-तीन दशकों में, वैश्विक दुनिया की आपा-धापी में पाठकों और लेखकों की यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे और बढ़ती गई है. इस दौर में लेखक जल्द से जल्द महाकवि हो जाने की होड़ में शीघ्र छपाई और सोशल मीडिया पर धुँआधार प्रचार के माध्यम से खुद को स्थापित करने में जुट गया है. पिछले दो-तीन दशक में हिंदी भाषा के सैकड़ों काव्य-संग्रह आए. इन काव्य-संग्रहों में आपको 5-7 संग्रह ही ऐसे मिलेंगे जिनकी प्रत्येक कविता औसत या औसत से ऊपर की हो. 1990 के बाद आलोकधन्वा के संग्रह ‘दुनिया रोज बनती है’ के अलावा अभी तक मेरे सामने कोई भी संग्रह ऐसा नहीं आया जिसकी प्रत्येक कविता गौर करने लायक हो. कल हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. गोपेश्वर सिंह के ‘जनसत्ता’ में छपे लेख ‘कविता परोक्ष की विधा है’ ने मेरा परिचय चन्दन सिंह नामक कवि से करवाया. इनके संग्रह का नाम है--‘बारिश के पिंजड़े में’. इस संग्रह की खासियत है इसकी हरेक कविता आपको प्रभ...