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हिंदी में जब कोई काव्य संग्रह आता है तो अक्सर तमाम पाठक-लेखक एक वाक्य शगल की तरह दुहराते हैं कि किसी एक संग्रह में अगर 2-4 कविताएं ढंग की हों तो उस संग्रह को सफल मानना चाहिए. पिछले दो-तीन दशकों में, वैश्विक दुनिया की आपा-धापी में पाठकों और लेखकों की यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे और बढ़ती गई है. इस दौर में लेखक जल्द से जल्द महाकवि हो जाने की होड़ में शीघ्र छपाई और सोशल मीडिया पर धुँआधार प्रचार के माध्यम से खुद को स्थापित करने में जुट गया है. पिछले दो-तीन दशक में हिंदी भाषा के सैकड़ों काव्य-संग्रह आए. इन काव्य-संग्रहों में आपको 5-7 संग्रह ही ऐसे मिलेंगे जिनकी प्रत्येक कविता औसत या औसत से ऊपर की हो.
1990 के बाद आलोकधन्वा के संग्रह ‘दुनिया रोज बनती है’ के अलावा अभी तक मेरे सामने कोई भी संग्रह ऐसा नहीं आया जिसकी प्रत्येक कविता गौर करने लायक हो. कल हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. गोपेश्वर सिंह के ‘जनसत्ता’ में छपे लेख ‘कविता परोक्ष की विधा है’ ने मेरा परिचय चन्दन सिंह नामक कवि से करवाया. इनके संग्रह का नाम है--‘बारिश के पिंजड़े में’. इस संग्रह की खासियत है इसकी हरेक कविता आपको प्रभावित करेगी. वरिष्ठ कवि आलोकधन्वा के संग्रह के बाद मेरे द्वारा पढ़ा गया यह दूसरा संग्रह है जिसकी प्रत्येक कविता अनूठी है.  
इनकी कविताओं में हिंदी कविता का विकास दिखता है. इनके यहाँ कुछ ऐसे बिम्ब मिलेंगे जो हिंदी में पहली बार प्रयुक्त हुए मालूम होते हैं. इनकी एक कविता है--‘उसकी हत्या में हथियार शामिल नहीं होंगे’. यह कविता रघुवीर सहाय के ‘रामदास’ और राजेश जोशी के ‘मारे जायेंगे’ शीर्षक कविता से आगे की कविता है, जिसमें वर्तमान में हिंसा के बदलते प्रारूपों को बड़े ही स्पष्ट ढंग से समझाया गया है. ‘बसना’ शीर्षक कविता ग्लोबल होते गाँव का महाख्यान ही नहीं रचती बल्कि उस संक्रांति को बिलकुल निरपेक्ष भाव से देखती है. इस भावभूमि पर तमाम समकालीन कवियों की कवितायें मिल जाएगी. अरुण कमल, कुमार अम्बुज सरीखे कवि भी ग्लोबल गाँव में अपने घर को तलाशते हुए कविता लिख रहे हैं, जिसमें कई बार विमर्शों का दवाब दिखता है लेकिन चन्दन सिंह के यहाँ विमर्शों के पीछे छिपे हुए सूक्ष्म और गहन यथार्थ को रचने की कोशिश है.       
इस संग्रह में 51 कविताएं संकलित हैं. यह संग्रह ‘प्रकाशन संस्थान’ से 2004 में छपा है. आश्चर्यजनक रूप से 14 साल बाद भी कवि चन्दन सिंह के संग्रह ‘बारिश के पिंजड़े में’ पर कोई चर्चा नहीं हुई है. सोशल मीडिया के इस भीषण दौर में इस संग्रह की कविताओं पर बातचीत न होना बहुत कुछ कहता है. मैं यहाँ संग्रह से 10 कविताएँ साझा कर रहा हूँ....


किताब प्रकाशन संसथान, दिल्ली से 2004 में प्रकाशित हुई है  




1-इन्द्रधनुष

एक स्त्री
फींचती है घर भर के कपड़े
किसिम-किसिम के रंग-बिरंगे कपड़े

रंगों के बारे में वैधानिक चेतावनी को अनसुना कर
धूप में पसार देती है उन्हें
सूखने

सूर्य
उसके कपड़े सुखाने के बहाने
चुरा लेता है उसके कपड़ों से थोड़ा-थोड़ा रंग हर रोज़
रोज़-रोज़ बदरंग होते जाते हैं उसके कपड़े

परेशान स्त्री खोये हुए रंग ढूढ़ती है
खोये हुए रंग ढूढ़ती हुई वह इन्द्रधनुष के बारे में नहीं सोचती
                                                                 है कभी 


2-पाँच स्त्रियाँ दुनियाँ की असंख्य स्त्रियाँ हैं

खेतों में उग रही है कपास
प्रजननरत हैं रेशम के कीड़े
भेड़
नाई के यहाँ जा रही हैं
घूम रहा है चरखा
चल रहा है करघा
खूब काते जा रहे हैं सूत
खूब बुने जा रहे हैं कपड़े
ऐन इसी समय
पाँच स्त्रियों को नंगा किया जा रहा है
गाँव के बीचों-बीच
भरी भीड़ में

एक-एक कर नोचे जा रहे हैं सारे कपड़े
देह से अंतिम कपड़े के नुचते ही
उनकी बाँहें और टाँगें
आपस में सूत की तरह गुँथकर बना जाना चाहती हैं
खूब गझिन कपड़े का कोई टुकड़ा
गालियाँ बकती हुई बन्द करती हैं वे अपनी आँखें
तो पलकें चाहती हैं मूँद लेना पूरा शरीर
आत्मा चाहती है बन जाना देह की चदरिया
पाँच नंग-धड़ंग स्त्रियों को बहुत चुभता है
दिन का अश्लील प्रकाश
भीड़ में कोई नहीं सोचता कि अब
फूँककर बुझा देना सूर्य !

नंग-धड़ंग पाँच स्त्रियों को चलाया जाता है
यहाँ से वहाँ तक
वहाँ से वापिस नहीं लौटना चाहती हैं वे
मुड़ जाना
किसी पथरीले और जंगली समय की ओर
जब तन ढँकने का रिवाज नहीं था
अधिक से अधिक
देह की चमड़ी भर उतारी जा सकती थी

शर्म से लहूलुहान पाँच स्त्रियाँ नंग-धड़ंग
देह पर लाज-भर लत्ता नहीं
धीरे-धीरे सारी लाज
सहमी हुई जा दुबकती है नाख़ूनों की ओट में
बची हुई मैल के बीच

जब पहली बार पृथ्वी पर
कपास को दूह कर काता गया होगा
पहला-पहला सूत
उसी समय
पहले सूत से ही बुन दी गई होगी
पाँच स्त्रियों की नग्नता
पाँच स्त्रियाँ दुनियाँ की असंख्य स्त्रियाँ हैं
कभी विज्ञापनों में
कभी माँ के गर्भ में ही
कभी पीट-पीट कर जबरन
नंगी की जाती हुई
और कभी-कभी तो कोई कुछ करता भी नहीं
अपने ही हाथों उतारने लगती हैं वे अपने कपड़े चुपचाप
पाँच स्त्रियाँ नंग-धड़ंग !
कि पंच महाभूत नंग-धड़ंग !
कि पंच तन्मात्राएँ नंग-धड़ंग !
कि नंग-धड़ंग स्वयं आदिशक्ति माँ प्रकृति !

अब क्या करना होगा इन्हें फिर से ढँकने के लिए ?
अखबार में छपी है खबर
पर कहता है दर्जी कि नाप से कम है खबर
सदन में जो बहस हुई
नाप से कम है
कम है नाप से कविता
श्रीकृष्ण वस्त्रालय पर लगा हुआ है ताला
और वह रास्ता
जो जाता है यहाँ से गाँधीनगर की ओर
जहाँ एशिया का सबसे बड़ा कपड़ा बाज़ार है
कहीं बीच में ही खो गया है

तो क्या
अब हमारी इस पृथ्वी को अपनी धुरी पर
किसी लट्टू की तरह नहीं
बल्कि, एक तकली की तरह घूमना होगा?  


3-साइकिल


आदमियों से भरे इस जहाज़ पर
कर रही है सफ़र,
बच्चों की एक नन्हीं-सी साइकिल भी
लाल चमकीली
बच्चों की लालसा में रंगी हुई-सी

इलाज करवाकर गाँव लौट रहे बूढ़े दादा ने
ली है वह साइकिल अपने ज़िद्दी पोते के लिए
आते समय जिससे किया था उन्होंने वायदा

अपने लिए दवा लेने से पहले ही
ख़रीद चुके थे वे यह साइकिल
उस क्षण भी नहीं भूले थे वे अपना वायदा
जब शाम बत्ती गुल हो गयी थी
और डॉक्टर ने
उनके फेफड़ों के चित्र को
सूर्यास्त पर रखकर देखा था

उनका पोता
कर रहा होगा उनकी प्रतीक्षा
उसे रात में मुश्किल से आती होगी नींद
और अक्सर उसके सपने
नींद से बाहर उघर आते होंगे
चादर से बाहर हो आये
उसके उन पाँवों की तरह ही
जिनसे चलाता होगा वह
अदृश्य पैडिलें

गंगा को छाती से लगाये उड़ते इन जलपक्षियों के साथ
यह जहाज़ जो चला जा रहा है
इसे अकेले भाप ही नहीं ढकेल रही
एक बच्चे की इच्छा भी
खींच रही है इसे
उस पार 


4-बसना

यह शहर का नया बसता हुआ इलाका है
यहाँ सब्जियों से अधिक अभी सीमेण्ट छड़ की दुकानें हैं
म्यूनिसपैलिटी ने अभी इसे अपना पानी नहीं पिलाया है

बने-अधबने मकानों के बीच
अभी भी बची हुई हैं इतनी जगहें
कि चल सकें हल

इस इलाकें में
अभी भी दिख जाते हैं जुते हुए खेत
इन खेतों में मिट्टी के फूटे हुए ढेलों को देख
मुझे विश्वास नहीं होता
कि अकेले हल का काम है
मुझे लगता है जैसे वहाँ कोई है
जो मिट्टी को फोड़कर बाहर आना चाह रहा है

सामने पानी लगे खेतों में
स्त्रियाँ
लाल-पीली-हरी सचमुच की रंगीन साड़ियों में
विराट् पक्षियों की तरह पृथ्वी पर झुककर
रोप रही हैं बीहन
हर बार जब ये रोपती हैं बीहन
तो गीली मिट्टी में जैसे कहीं खुल जाती है कोई चोंच
पर ये सिर्फ खेत ही नहीं
प्लाट भी हैं
काग़ज़ पर नहीं तो आँखों में
कहीं-न-कहीं नक्शा तैयार है
और वह कुआँ जिसके प्लाट में आया है
इस बात से ख़ुश
कि उसे अलग से सोकपिट नहीं बनवाना होगा

स्त्रियाँ जहाँ रोप रही हैं बीहन
कल अगर यहाँ आना हुआ गृह-प्रवेश के भोज में
तो वह मकान
जिसकी दीवारों पर प्लास्टर नहीं होगा  
जिसकी खिड़कियों-दरवाजों की कच्ची लकड़ियों में
एक खुशबू होगी जिसे पेड़ छिपाकर रखते हैं
जिसकी ताजा छत की छाया में एक गीलापन होगा
वह मकान मुझे
एक खड़ी फसल की तरह ही दिखाई देगा पहली बार

यह शहर का नया बसता हुआ इलाक़ा है
जैसे-जैसे यह बसता जाएगा
वैसे-वैसे नींवों के नीचे दबते चले जाएँगे
इसके साँप
इसके बिच्छू
बरसात की रातों में रात-रात भर चलने वाली
झींगुरों की तीखी बहस
यहाँ सड़कें होंगी
कार और स्कूटर होंगे
बाज़ार होगा
स्कूल होगा

आवारा कुत्ते होंगे
पते होंगे
जिन पर चिट्ठियाँ आने लगेंगी
लिफ़ाफ़ों में बन्द दूसरे इलाक़ों की थोड़ी हवा यहाँ पहुँचेगी
पर सबसे अच्छी बात यह होगी
कि यहाँ बच्चे जन्म लेंगे
ऐसे बच्चे
जिनकी देह के सारे तत्त्व
क्षिति जल पावक गगन समीर सभी
इसी इलाक़ें के होंगे

इसी इलाक़ें में रखेंगे वे
डगमगाता हुआ अपना पहला कदम
और जब वहाँ
उस जगह पड़ेगा उनका पहला कदम
तो मैं फिर याद नहीं रख पाउँगा
कि पहले वहाँ
एक छोटा-सा पोखर हुआ करता था
और जिस रात चाँद
इस इलाक़ें तक आते-आते थक जाता था
वहीं डूब लेता था

इस इलाक़े का बसना उस दिन लगभग पूरा मान लिया जाएगा
जिस दिन यहाँ पहली हत्या होगी
और जिस दिन यहाँ की झोंपडपट्टियाँ उजाड़ दी जाएँगी
वह इसके बसने का आख़िरी दिन होगा

ऐसे ही बसेगा यह इलाक़ा
यहाँ बसने के चक्कर में एक दिन पाउँगा
उजाड़ होकर ढह चुका है गाँव का घर
देखते-देखते वह तब्दील हो चुका है
एक डीह में
जीते-जी हो गया हूँ मैं
अपना ही पूर्वज 



5-उसकी हत्या में हथियार शामिल नहीं होंगे

यह तय है कि वह मारा जाएगा
पर, उसकी हत्या में
हथियार शामिल नहीं होंगे
सब्जी काटने से भले ही गन्दा हो जाय कोई चाकू
उसके खून से तो हरगिज़ नहीं

किसी दिन वह एक गाड़ी के नीचे
नहीं आएगा बचकर बगल से गुज़रता
उसकी ख़ूबसूरती से मारा जाएगा

किसी दिन अपने इकलौते सूट में जबरन घुसा हुआ
एक शानदार दावत में घुसपैठिया-सा वह
खाकर जबरन रोकेगा डकार
बीवी की नाक तक खुशबू ले आने
बगैर साबुन से हाथ मले लौटेगा
कि रास्ते में ही अँगुलियों की जूठी खुशबु डस लेगी उसे

साहब की घूसखोरी से नहीं डाँट से नहीं
उनके बड़े बेटे के आत्मविश्वास
और छोटे बेटे की अंग्रेजी से मारा जाएगा वह
वह मारा जाएगा प्रेम से
जो अमीर छोकरों ने किया
साहसी गुण्डों ने किया
उसने जो नहीं किया उस प्रेम से मारा जाएगा वह

ऐसी ही मासूम चीज़ों से मारा जाएगा वह लेकिन
मरकर न अमर होगा वह मुर्दा
उसकी हत्या
इतिहास में तो क्या
थाने में भी दर्ज नहीं मिलेगी आपको 


6-दंगा

स्लेट-पट्टी पर
अगर ग़लत हिज्जे में भी लिख जाता था माँ
तब भी बच्चा उसे मिटाते हुए सहमता था तो
उसकी आँखों के सामने
मिटा दी गई
उसकी माँ

दंगाइयों ने घोंप दिया
उसके पेट में छुरा
फिर खून की टपकती बूँदों को सुना
जैसे मतपेटियों में गिर रहे हों
मतपत्र
उसके पक्ष में

शर्म से कोई नहीं
जो भी लाल हुआ
खून से 


7-कालाहाँडी-४

सोचती है माँ
क्यों पैदा हो गया बच्चा?
कितना अच्छा था वह
पेट में ही
न माँगता था
खाना
न रोता था भूख से
सोचती है माँ
जिसके स्तनों में नहीं अँखुआता है
दूध
खेतों में नहीं
माँ की छातियों में
मिला मुझे अकाल 


8-कालाहाँडी-५

उसकी भूख
एक तेज आँच की तरह
सुलगती है
जिसपर दुनियाँ की कोई भी चीज़
पक सकती है
अगर तुम सूँघ सको
तो तुम्हें लगेगा
चट्टान पक रही है
जंगल पक रहा है
चाँद पक रहा है
हो सकता है अचानक वह
कलछुल में कुछ तारों को ही डाल
अँगुलियों से मीस-मीसकर पता करने लगे
कि तारें
अभी सींझें हैं या नहीं 


9-कालाहाँडी-६

मुट्ठीभर भात
और थोड़ा-सा झोर के
पेट में जाते ही
वापस लौटने लगती है
इंसानियत
हर कौर के साथ
थाली में जो जगह खाली होती है
झलकता है वहाँ
बेच दी गई बिटिया का
चेहरा
बकरियाँ
पुरखों की निशानियाँ
पानी की घूँट से
कण्ठ नहीं
भींगती हैं आँखें 


10-कालाहाँडी-७

यह अकाल
सूने आकाश से नहीं टपका है
उन्होंने रचा है इसे
इस पर
उनकी अँगुलियों के निशान हैं

उन्होंने रचा है कालाहाँडी का करुण बंजर
घास का एक तिनका तक नहीं जिस पर
लेकिन ओट जंगलों से भी अधिक
कितनी आसानी से छिपा लेता है यह
उनके दाँत
उनके नाख़ून
उनके गोदाम

उन्होंने रचा है
कालाहाँडी का अकाल
जिस पर कभी-कभी कोई छींटता है अन्न
जैसे अच्छत  

लेखक परिचय 


  

Comments

  1. छुपे रुस्तम,।सारगर्भितसमालोचना पढ़कर आपके पृथक वयतत्व का एहसास करा गया।

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