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Showing posts from October, 2019
जाति विमर्श का सामान्यबोध बनाम जातीय दमन की वास्तविकता भारत में जाति और जाति आधारित हिंसा की समस्या हज़ारों साल की समस्या है। हजारों साल से ऊँची जाति के लोग दलितों का भयानक शोषण करते आ रहे हैं। ब्राह्मणवादी विचार इस तरह के शोषण को वैधता प्रदान करता आया है। 21 वीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश कर रहे समाज में भी जाति आधारित हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही है। पाँच दशक पहले जब भारतीय राजनीति में ब्राह्मणवादी विचार के खिलाफ अन्य जातियों का उभार हुआ तो ऐसा लगने लगा कि जाति आधारित हिंसा की घटनाओं में कमी आएगी, जातियों का उच्छेद होगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बल्कि यह समस्या दिनों-दिन और बढ़ती जा रही है। आए दिन जाति आधारित हिंसा की खबरें हमें विचलित कर रही है। इसलिए इस संदर्भ में विचार करना बहुत जरूरी है। भारत में जातीय संघर्ष को एक ख़ास तरह के आख्यान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस आख्यान में उच्च जाति बनाम दलित के संघर्ष की बात होती है। बाकी वास्तविकता को छोड़ दिया जाता है। उच्च जाति बनाम दलित के नैरेटिव को लगातार मजबूत किया जाता रहा है जिससे राजनैतिक लाभ के लिए जातीय गोलबंदी हो सके...