जाति
विमर्श का सामान्यबोध बनाम जातीय दमन की वास्तविकता
भारत में जाति और जाति आधारित हिंसा की समस्या
हज़ारों साल की समस्या है। हजारों साल से ऊँची जाति के लोग दलितों का भयानक शोषण
करते आ रहे हैं। ब्राह्मणवादी विचार इस तरह के शोषण को वैधता प्रदान करता आया है। 21
वीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश कर रहे समाज में भी जाति आधारित हिंसा की घटनाएं
लगातार बढ़ती जा रही है। पाँच दशक पहले जब भारतीय राजनीति में ब्राह्मणवादी विचार
के खिलाफ अन्य जातियों का उभार हुआ तो ऐसा लगने लगा कि जाति आधारित हिंसा की
घटनाओं में कमी आएगी, जातियों का उच्छेद होगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बल्कि यह समस्या
दिनों-दिन और बढ़ती जा रही है। आए दिन जाति आधारित हिंसा की खबरें हमें विचलित कर
रही है। इसलिए इस संदर्भ में विचार करना बहुत जरूरी है।
भारत में जातीय संघर्ष को एक ख़ास तरह के आख्यान
के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस आख्यान में उच्च जाति बनाम दलित के संघर्ष
की बात होती है। बाकी वास्तविकता को छोड़ दिया जाता है। उच्च जाति बनाम दलित के
नैरेटिव को लगातार मजबूत किया जाता रहा है जिससे राजनैतिक लाभ के लिए जातीय
गोलबंदी हो सके। लेकिन समाज की वास्तविकता को इस चुनावी तात्कालिक आख्यान से नहीं
समझा जा सकता। जब राजनैतिक लाभ के लिए ऐसा कोई नैरेटिव बनता है और उसे लगातार मजबूत
किया जाता है; उसी में रियलिटी को दिखाया जाता है, ऐसे में उसके अपने नुकसान भी
हैं। नुकसान यह होता है कि उस नैरेटिव के बाहर की सच्चाई विमर्श से छूट जाती है।
इस तरह की राजनीति करने वाले लोग सच्चाई से अपना मुँह चुराने लगते हैं। एक समय ऐसा
भी आता है कि ये लोग उस सच्चाई को नकारने भी लगते हैं। इनकी आँखें उसे स्वीकार ही
नहीं करती इसलिए वे इस तरह की सच्चाई को किसी और ही नैरेटिव में देखते हैं और हमें
दिखाते भी हैं। इसका एक उदाहरण आपके सामने पेश करता हूँ।
पिछले दिनों मध्यप्रदेश में खुले में शौच कर रहे
‘वाल्मीकि समुदाय’ के दो मासूम बच्चों की लाठी से पीट-पीट कर हत्या होती है। आमतौर
पर दलितों की इस तरह क्रूर ढंग से की गई हत्या को सोशल मीडिया पर काफी कवरेज मिलता
है। समाज में हो रही जाति आधारित हिंसा पर बात होती है। तमाम गुस्सैल और भावुक
पोस्ट लिखे जाते हैं। लेकिन इस मामले में सोशल मीडिया पर शांति पसरी रही। छोटी-छोटी
बातों पर मीडिया ट्रायल करने वाला सोशल मीडिया, इस मुद्दे पर लगभग शांत ही दिखा। ‘वाल्मीकि
जाति’ के दो मासूम बच्चों की हत्या का यह न्यूज़ सोशल मीडिया पर मोदी सरकार के स्वच्छ
भारत अभियान और उसकी क्रूर परिणति के रूप में ही चला।
हरेक मुद्दे पर जाति का एंगल खोजने वाले लोग भी इस
गंभीर मुद्दे पर आरोपी की जाति खोजने के बजाय मोदी सरकार के स्वच्छता अभियान को
कोसते दिखे। दिलीप मंडल जैसे सोशल मीडिया के महारथी ने भी आरोपी को सामान्य जनता
माना। वैसे सामान्यतः ये ऐसी भूल नहीं करते। आरोपियों की जाति पर तब भी बात नहीं
हुई जब मनोज वाल्मीकि (पीड़ित) पत्रिका न्यूज़ के हवाले से यह आरोप लगाता है कि गाँव
के दबंग यादव उनका हमेशा से जाति सूचक शब्दों से अपमान करते रहे हैं। बीबीसी के हवाले
से मनोज कहते हैं कि उनके घर शौचालय बनने के लिए पंचायत से पैसा भी आ गया था लेकिन
‘इन लोगों ने उसे बनने नहीं दिया’। मनोज के इन आरोपों के बावजूद बसपा सुप्रीमो
मायवती भी शौचालय की समुचित व्यवस्था न होने का ही राग अलापती रहीं। मेरी समझ में यह
नहीं आता कि जातिसूचक अपमान के गंभीर आरोपों के बाद भी न बसपा सुप्रीमो जाति आधारित
हिंसा की बात करती हैं और न ही सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले तथाकथित पहरुए।
भारत में जाति आधारित हिंसा की एक रेखीय समझ
बनाई गई है जिसमें एक खलनायक जाति को चुन लिया गया है। इस समझ को बनाने में हिंदी
के फिल्मकारों, साहित्यकारों और अकादमिक वामपंथी आलोचना की बड़ी भूमिका रही है।
वामपंथ पर यह आरोप लगता रहा कि उसने जाति के प्रश्न को एड्रेस नहीं किया वो सिर्फ
वर्ग आधरित हिंसा पर ही बात करता रहा। इसी वजह से उसने कालांतर में वर्ग का राग
छोड़; जाति आधारित हिंसा की समस्या को ‘ब्राह्मण-राजपूत-भूमिहार’ बनाम ‘अन्य
जातियों’ के उसी लोकप्रिय नैरेटिव में ही देखना शुरू किया, जहाँ उसकी असहमति थी
वहां उसने चुप्पी साध ली।
इसे समझने के लिए मैं एक-दो उदहारण आपके सामने
रखता हूँ। बिहार के ‘बेलछी कांड’ की पृष्ठभूमि पर बाबा नागार्जुन ने 1977 में ‘हरिजन-गाथा’
नामक लंबी कविता लिखी। इस बहुचर्चित कविता में ऊँची जाति के भूस्वामियों द्वारा
तेरह दलितों को ज़िंदा जलाने का जिक्र है। प्रायः यह देखा जाता है कि इस कविता के
बहाने भारतीय समाज की जातीय संरचना पर बात करते हुए ऊँची जाति के भूस्वामी मसलन ब्राह्मण,
भूमिहार, राजपूत आदि की तो खूब चर्चा होती है जो कि होनी भी चाहिए। कोई भी स्वस्थ
समाज रणवीर सेना (भूमिहार जाति की सेना) द्वारा की गई जातिगत हिंसा को नहीं भूल
सकता। वह नहीं भूल सकता लक्ष्मणपुर बाथे और बथानी टोला। वह नहीं भूल सकता ब्रह्मेश्वर
मुखिया का वह बयान जो मानवता को शर्मशार करता है। लेकिन तब सवाल उठता है कि बेलछी में
‘पैशाचिक दुष्कांड’ करने वाले उन भूस्वामियों को क्यों भुलाया गया जिनकी जातीय
पहचान कुर्मी है, जो भारतीय जाति संरचना में खुद को शूद्र बतलाते हैं।
हिंदी का शोधार्थी होने के नाते मैं यह बात पूरी
जिम्मेदारी के साथ कहता हूँ कि प्रायः अकादमिक आलोचना ने इस कविता की पृष्ठभूमि को
समझाने के लिए ऊँची जाति के भूस्वामियों (ब्राह्मण,राजपूत, भूमिहार आदि) को ही
केंद्र में रखा। दलितों पर हो रहे अत्याचार के संदर्भ में वे सिर्फ रणवीर सेना का
जिक्र करते हैं कुर्मी और यादव सेना उनके डिस्कोर्स से छूट जाता है। ऐसा नहीं है
कि हिंदी के इन अध्यापकों को हजारी प्रसाद द्विवेदी का वह कथन याद नहीं जिसमें वे कहते
हैं कि भारत में हरेक जाति अपने से नीचे की जाति ढूँढ़ लेती है।
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| बिहार में जाति के नाम पर बनाई गई सेना की एक तस्वीर (साभार: गूगल) |
इस तरह के लोकप्रिय नैरेटिव को बनाने में
फिल्मकारों की भी बड़ी भूमिका रही। यह देखने में आया है कि फिल्म लोकप्रिय नैरेटिव
को ही आगे बढ़ाने का काम कर रही है। अभी हाल फिलहाल ही एक फिल्म आई है- ‘आर्टिकल-15’।
बौद्धिक जगत में इसकी खूब वाहवाही हुई। निर्देशक अनुभव सिन्हा को सबने सराहा।
बुद्धिजीवियों ने उनकी हिम्मत और साहस की खूब दाद दी। फिल्म में जाति के आधार पर
होने वाले शोषण को दिखाया गया है जिसमें उच्च जाति के लोग अपने जातीय अहंकार की
तुष्टि एवं जातीय वर्चस्व के लिए दो दलित बच्चियों का बलात्कार करते हैं और उनकी
हत्या कर पेड़ से टांग देते हैं। इस तरह की घटनाएँ अनायास ही हमें फूलन देवी के साथ
बेहमई गाँव में हुए राजपूतों द्वारा किए गए अत्याचार की याद दिलाता है। इस मुद्दे
पर भी एक फिल्म बनी है-‘बैंडिट क्वीन’। इस फिल्म में सच्चाई को उसी रूप में दिखाया
गया जैसे वह घटित हुई थी।
2014 के बदायूं रेप कांड पर आधारित ‘आर्टिकल-15’
सच्चाई से मुँह चुराती है। यह फिल्म भी भारतीय समाज के उसी लोकप्रिय नैरेटिव को
आगे बढ़ाती है जिसमें जाति आधारित शोषण करने वाला खलनायक वर्ग पहले से तय होता है। इस
फिल्म में दलित बच्चियों से रेप करने वालों की जातीय पहचान राजपूत, ब्राह्मण, भूमिहार
और जाट के रूप में होती है। जबकि सच्चाई यह है कि बदायूं में दलित बच्चियों के साथ
बलात्कार करने वाले और उन बलात्कारियों को बचाने वाले सारे के सारे आरोपी उस जाति
से आते हैं जो खुद को प्रायः शूद्र कहते हैं। इनकी जातीय पहचान यादव के रूप में
होती है। गौरतलब है कि उस समय उत्तर प्रदेश में इसी जाति की सरकार थी; कहा तो यहाँ
तक जाता है कि तत्कालीन सपा सरकार ने इस केस की लीपापोती में कोई कसर नहीं छोड़ी।
सारे के सारे आरोपी के यादव होने के बावजूद निर्देशक अनुभव सिन्हा ने ‘आर्टिकल-15’
में आरोपी के रूप में किसी भी एक यादव को रखने की जहमत नहीं उठाई बल्कि फिल्म में
एक जगह उन्होंने यादव जाति का महिमामंडन ही किया।
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| लल्लनटॉप के फिल्म रिव्यू से ली गई तस्वीर जिसमें सुअर ताल भी है |
फिल्म में दिखाया गया है कि सबूत की तलाश में सुअर
ताल में उतरने के लिए आईपीएस अधिकारी ‘अयान रंजन’ की मदद के लिए एक सिपाही आता है
जिसकी जातीय पहचान यादव के रूप में होती है जो कहता है कि ‘सर हम आपके साथ हैं’।
बहुचर्चित रेप कांड पर बनी इस फिल्म में एक तरफ जहाँ आरोपी जाति के किसी प्रतिनिधि
को नहीं रखा गया वही दूसरी तरफ आरोपी जाति के प्रतिनिधि पात्र से यह भी कहलवाया
गया कि वह सामाजिक न्याय की इस लड़ाई में न्याय के पक्ष में है। जाति आधारित हिंसा
को दिखाने का यह नजरिया है न मजेदार !!! किसी भी तरह की हिंसा को देखने और दिखाने
का यह पैटर्न पूरे विश्व में एक सा ही है। कहीं किसी खलनायक जाति को चिन्हित किया
गया है, कहीं किसी खलनायक नस्ल को तो कहीं किसी धर्म या धार्मिक समुदाय को ही
खलनायक के रूप में देखा जाता है। इसी पैटर्न से सोचते-समझते दुनिया भर के तमाम
देशों ने इस्लाम को आतंकी धर्म घोषित कर दिया।
निर्देशक अनुभव सिन्हा ने ‘आर्टिकल-15’ में
बार-बार कुछ पात्रों से यह कहलवाया है कि ‘संतुलन बने रहने दीजिए’, ‘संतुलन बिगड़
जाएगा’। ये किस संतुलन की बात हो रही है। फैक्ट के साथ भरपूर छेड़छाड़ करने वाला
फिल्मकार कौन सा संतुलन बनाए रखना चाहता है। ऐसा क्यों होता है कि 21 वीं सदी के तीसरे
दशक में प्रवेश कर रहे बुद्धिजीवी भी वही दशकों पुरानी लीक पीट रहे हैं। जाति
आधारित हिंसा भारतीय समाज की सच्चाई है लेकिन वर्तमान समय की सच्चाई यह भी है कि नवसामंत
जातियों ने भी दलितों का भरपूर का शोषण किया है। यह ठीक है कि जाति के नाम पर
सवर्णों द्वारा दलितों के शोषण का इतिहास हजारों साल का इतिहास है लेकिन इस बात से
भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि आजादी के बाद ‘तथाकथित शूद्र’ जातियों ने भी
दलितों के खिलाफ हथियार उठाए हैं। मैंने कुछ ही उदाहरण पेश किए हैं, ऐसे हजारों
उदाहरण हमारे आस पास मौजूद हैं। लेकिन फिर भी भारतीय बुद्धिजीवी प्रायः इन
उदाहरणों पर साज़िशन चुप्पी साध लेते हैं। वे तो इस विषय में कानाफूसी करने से भी
कतराते हैं।
फिल्मकारों, साहित्यकारों और बौद्धिकों को इस
बात का डर है कि अगर हम लीक से हटकर अलग नैरेटिव पेश करते हैं तो सामाजिक न्याय का
‘तथाकथित साझा मोर्चा’ चरमराने लगेगा। उन्हें अपने को पॉलिटिकली करेक्ट दिखाना है।
उन्हें अपनी सोशल इमेज का डर है। उन्हें डर है कि पब्लिक स्फीयर में लगातार मुखर
दिखने वाली नवसामंत जातियाँ सोशल मीडिया पर उनकी लींचिंग न कर दें। इसी कारण वे
अपने समय और समाज के जटिल और क्रूर यथार्थ को दिखाने से कतराते हैं। अमूमन तो वे
इस तरह के विषय पर बात ही नहीं करते; अगर बात करने की जहमत उठाते भी हैं तो उसी
लोकप्रिय नैरेटिव में अपने समय एवं समाज के यथार्थ को ठूंस देते हैं।
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| सोशल मीडिया में होने वाले लिंचिंग की प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: गूगल) |
हमें अपने समय और समाज के यथार्थ को समझने के
लिए नए टूल्स की खोज करनी होगी क्योंकि संतुलन बनाने वाला यह सलेक्टिव अप्रोच,
चाहे वह लेफ्ट का हो या राईट का, भारत में होने वाली जातिगत हिंसा की एकहरी समझ को
ही प्रस्तुत कर रहा है। जाति और धर्म के आधार पर नायक और खलनायक तय करने वाली इस
प्रवृत्ति का जब तक अंत नहीं होगा तब तक हम अपनी सहूलियत के हिसाब से लाशें चुनते
रहेंगे। अपनी सहूलियत के हिसाब से नारेबाजी करते रहेंगे। किसी एक जाति को खलनायक
बनाकर राजनैतिक लाभ उठाने की कोशिश करते रहेंगे।
भारत में जातीय अंहकार और जातीय संघर्ष की
समस्या का महत्त्वपूर्ण संबंध भूमि से है। समाज की जो भूमिधारी जातियाँ हैं उनमें
ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कुर्मी, मौर्या, यादव आदि आते हैं। इनमें खासतौर पर कृषि
से जुड़ी हुई जातियों में कुर्मी, मौर्या, यादव हैं। पिछले दशकों में इनके पास जमीनें
भी आई हैं और ऐसा होने से भूमिहीन दलितों का संघर्ष उच्च जाति के साथ-साथ इन
जातियों से भी है। इसका आशय यह है कि भारत में जाति आधारित हिंसा की समस्या के
सिर्फ सामाजिक और सांस्कृतिक कारण ही नहीं हैं। भूस्वामित्व में हो रहे बदलाव से
यह समस्या धीरे-धीरे और जटिल हो रही है। हम इससे आँख चुरा कर जाति आधारित हिंसा का
कोई स्थायी हल नहीं ढूँढ़ सकते।




बहुत बढ़िया ऐसे है आप लेखनी से समाज को सुधारें।
ReplyDeleteअदभुत लेखन मित्र सुधांशु।
ReplyDeleteऐसे ही लिखते रहो।
सही दिशा में की गई पड़ताल है। सेलेक्टिव क्रोध और चुप्पी से कभी भी समाज का भला नही हो सकता। इस देश में तमाम समस्याएं हैं उनका बगैर भावुक हुए चीड़ फाड़ करने पर ही अच्छा इलाज सम्भव है फिलहाल सुधांशु जी के इस साहसिक कदम के लिए बधाई भी धन्यवाद भी
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