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Showing posts from January, 2017
हबीब जालिब (1929-1993) पाकिस्तानी क्रांतिकारी कवि, वामपंथी कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ हैं । इन्होनें उस अलोकतांत्रिक माहौल में मार्शल लॉ, अधिनायकवाद और राज्य दमन का विरोध किया। बकौल फैज अहमद फैज-“वह वास्तव में जनता का कवि था।” हबीब जालिब की इस गीत को लाल बैंड ने गाया है। इस गीत को बुलंद आवाज में बाग़ी तेवर के साथ आप गा सकते हैं। मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ जो चाहे मुझपे जुल्म करो इस दौर के रस्म रिवाजों से, इन तख्तों से इन ताजों से, जो जुल्म की कोख से जनते हैं, इंसानी खून से पलते हैं, जो नफरत की बुनियादें हैं और खूनी खेत की खादें हैं, मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ जो चाहे मुझपे जुल्म करो वो जिनकी ओठ के जुंबिश से, वो जिनकी आँख की लरजिश से, कानून बदलते रहते हैं, और मुजरिम पलते रहते हैं, उन चोरों के सरदारों से इंसाफ के पहरेदारों से मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ जो चाहे मुझपे जुल्म करो जो औरत को नचवाते हैं बाजार की जींस बनवाते हैं फिर उसकी इस्मत की गम में तहरीकें भी चलवाते हैं उन जालिम और बदकारों से बाजार के उन मयमारों से मै...
  पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस वाया ‘ बनारस ’ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से मेरा परिचय बर्ष 2009 में एक भैया के माध्यम से हुआ । मैं जहां से आता हूँ वहाँ इस तरह के बड़े - बड़े विश्वविद्यालयों का परिचय इसी तरह किन्हीं भैया के द्वारा ही होता है। सुंदरम मेरे बड़े भाई के दोस्त थे। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। सुंदरम जी ने मुझे बी एच यू से फ्रेंच भाषा के अध्ययन के लिए प्रेरित किया था और उसके व्यवहारिक और व्यवसायिक फायदे गिनाए। उनकी बातों को सुनकर मैं इस विदेशी भाषा की ओर आकर्षित हुआ और मेरा मन सतरंगी सपनों की कुलाचें भरने लगा। मैं फ्रेंच और फ़्रांस के सपनों को जीता हुआ , बर्ष 2010 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। 15 अगस्त 2010 को पटना-सिकंदरबाद एक्सप्रेस से शाम 5 बजे बनारस के कैंट स्टेशन उतरा। एनी बेसेंट के कमरा संख्या 05 में अपना बोरिया बिस्तर रखकर में इस महान विश्वविद्यालय का छात्र बना और अपने सपनों को , अपने डिजायर को जीने लगा। मुझे नहीं पता था कि मेरे सपने इतनी जल्दी टूटने वाले हैं। आज जब छह साल बाद उन दिनों को याद करता हूँ ...