पटना-सिकंदराबाद
एक्सप्रेस वाया ‘बनारस’
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से मेरा
परिचय बर्ष 2009 में एक भैया के माध्यम से हुआ। मैं जहां से आता हूँ वहाँ इस तरह के
बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों का परिचय इसी तरह किन्हीं भैया के द्वारा ही होता है।
सुंदरम मेरे बड़े भाई के दोस्त थे। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक
की डिग्री प्राप्त की थी। सुंदरम जी ने मुझे बी एच यू से फ्रेंच भाषा के अध्ययन के
लिए प्रेरित किया था और उसके व्यवहारिक और व्यवसायिक फायदे गिनाए। उनकी बातों को
सुनकर मैं इस विदेशी भाषा की ओर आकर्षित हुआ और मेरा मन सतरंगी सपनों की कुलाचें
भरने लगा। मैं फ्रेंच और फ़्रांस के सपनों को जीता हुआ ,बर्ष
2010 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। 15 अगस्त 2010 को
पटना-सिकंदरबाद एक्सप्रेस से शाम 5 बजे बनारस के कैंट स्टेशन उतरा। एनी बेसेंट के
कमरा संख्या 05 में अपना बोरिया बिस्तर रखकर में इस महान विश्वविद्यालय का छात्र बना
और अपने सपनों को, अपने डिजायर को जीने लगा। मुझे नहीं पता
था कि मेरे सपने इतनी जल्दी टूटने वाले हैं। आज जब छह साल बाद उन दिनों को याद
करता हूँ तो श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ की याद आती है। याद आता है छंगामाल विद्यालय इंटरमीडिएट कालेज 'शिवपालगंज'। अगस्त के आखिर में (तारीख ठीक से याद
नहीं) आर्ट्स फ़ैकल्टी की ‘सी एच सी बिल्डिंग’ कमरा संख्या 30 में हमारी फ्रेंच की
पहली क्लास शुरू होने वाली थी। बच्चे नियत समय से बैठे शिक्षक के आने का इंतज़ार कर
रहे थे। खन्ना मास्टर (वैसे तो ये प्रो॰ साहब उपन्यास के पात्र मास्टर मोतीराम के
समकक्ष हैं लेकिन नाम कुछ जँचा नहीं) कक्षा में प्रवेश करते हैं और बच्चों की
संख्या देख कुर्सी पर बैठ अपना सर पकड़ लेते हैं। मेरी तरह लगभग सत्तर बच्चे फ्रेंच
और फ़्रांस का सपना लिए कक्षा में उपस्थित थे। कुछ देर बाद मास्टर साहब की मूर्छा
टूटती है और सबसे पहले मुखारविंद से निकलता है-“फ्रेंच इज वेरी हार्ड सबजेक्ट, फ़ेल हो जाओगे सब के सब , अरे फ़ोरेन लैनग्विज में
कहीं इतने स्टूडेंट होते हैं, 12-15 छात्र बहुत हैं, अभी भी समय है अपना सब्जेक्ट चेंज करवा लो।” इसी तरह का पूरे एक घंटा
एतिहासिक लैक्चर चला। ऐतिहासिक इस मायने में कि उनके इस लैक्चर के बाद 60 प्रतिशत छात्रों ने अपना सबजेक्ट चेंज करवा लिया।
बच्चों की संख्या से डरे मास्टर साहब ने
अगले दिन क्लास लेने के लिए शोध छात्र मोतीराम को भेजा। शोध छात्र ने मास्टर साहब
से ठीक उलट बात कही। उन्होंने कहा- “बहुत हल्का सबजेक्ट है, आराम से सीख जाओगे, कोई दिक्कत नहीं होगी, वगैरह वगैरह।” उसके बाद पूरे दो महीने तक खन्ना मास्टर नहीं दिखे,
शोध छात्र मोतीराम का भी कोई अता पता नहीं था। एक दिन क्लर्क मालवीय ने आकर बताया
कि-“मास्टर खन्ना और उनके शोध छात्र मोतीराम कुटाई-पिसाई में व्यस्त हैं। अभी पर्व-त्यौहार
का सीजन है,कमाई अच्छी हो रही है। आप लोग भी छुट्टी मनाएं।”
बहरहाल दो महीने बाद मास्टर साहब आए, छात्रों की संख्या कम
हो चुकी थी लेकिन मास्टर साहब का ध्यान आटा चक्की पर ही होता, उनका रवैया बदला नहीं। आखिर में हार कर मैं और रामधार विषय बदलवाने ऑफिस
गए। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। दो साल तक हमे अपने ही सपने को झेलना पड़ा,एग्जाम देने के बाद हमें फ्रेंच और फ़्रांस के बुरा सपने आते थे। देवयोग से
मास्टर साहब ने कभी हम लोगों को कभी फ़ेल नहीं किया क्योंकि उन्हें इस बात पूरा
इल्म था कि फ़ेल होने के बाद भी उन्हें ही पढ़ाना होगा।
खैर उस समय विश्वविद्यालय के नियमानुसार
दो साल बाद फ्रेंच से पाला छुड़ाया और अपनी प्रतिष्ठा के विषय हिन्दी को चुना। काशी
हिन्दू विश्वविद्यालय से मैंने स्नातक एवं परास्नातक की शिक्षा ग्रहण की और अभी
हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय एम फिल में अध्ययनरत हूँ। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
में पाँच सालों के दरम्यान 'खन्ना मास्टर' की तरह कई शिक्षक मिले। कई
ऐसे आचार्य भी मिले जो कक्षा में अपने
ज्ञान का शतांश भी बच्चों को देना नहीं चाहते थे। वो सिर्फ बड़े-बड़े सेमिनार में
बड़े-बड़े आचार्यों के सामने महान लेक्चर दिया करते थे। बच्चे मंत्रमुग्ध हो कर उनके
लैक्चर को सुनते और गुनते थे- “देखा रामाधार ! आज तो फलां गुरुजी ने क्या ज़बरदस्त
मंचमार भाषण दिया, वाकई में गुरुजी चलते फिरते ज्ञान के
भंडार हैं। -रामाधार बेहद ही शांत भाव से बोला-“तुमने सही
कहा मित्र, लेकिन ज़रा सोचो कि यही गुरुजी अगर कक्षा में इसी
तरह पढ़ाएँ तो हम बच्चों को कितना फायदा होगा? भाई हमारे यहाँ
की कड़वी सच्चाई है कि अध्यापक लाखों पाने के बावजूद अपने दायित्व से भागते नज़र आते
हैं। याद है न फ्रेंच के खन्ना मास्टर साहब।” बहरहाल! कुछ
शिक्षकों की मेहनत लगातार श्रम साध्य परिश्रम से हमने (मैं और रामाधार) ने काशी
हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक एवं परास्नातक की शिक्षा ग्रहण कि। ऐसा लगा कि इन
पाँच सालों में हमने सिर्फ इन्हीं से शिक्षा ग्रहण की। हमारी चेतना के निर्माण में
इनका काफी योगदान है। ये हमारे लिए प्रणम्य हैं।
स्नातक प्रथम बर्ष में हम लोग डॉ एनी
बेसेंट छात्रावास में रहते थे। हम लगभग 200 छात्र पूरे शांति सदभाव और भाईचारे के
साथ छात्रावास जीवन का आनंद ले रहे थे कि तभी पता चला कि 'लिब्राहम आयोग' ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। अब सितंबर के आखिरी सप्ताह में बाबरी मस्जिद
पर निर्णय आना बाक़ी है। यकायक पूरे बनारस का माहौल बदल गया,
गौदोलिया पर पी॰ ए॰ सी॰ परेड होने लगी। यूनिवर्सिटी के पूरे वातावरण में मानो किसी ने विष घोल दिया
था। अभी हम लोगों को यहाँ आए हुए ठीक से एक महीना भी नहीं हुआ था। हम शहर और
विश्वविद्यालय को जानने की कोशिश कर ही रहे थे कि तभी शहर ने अपना परिचय देते हुए
कहा कि- “मैं बनारस हूँ।” रोज़ अखबारों
में बनारस सुर्खियों में होता है। एक दिन मैं अपने कमरे में बैठा अखबार पढ़ रहा था
कि तभी रामाधार ने आकर कहा कि- “कल निर्णय आने वाला है और आज आरिफ़, दनिश, इम्तियाज़, आबिद और फैज
हॉस्टल छोड़ कर जा रहे हैं। बताओ ये सही है क्या? क्या यही है
यहाँ की पवित्र शिक्षा? क्या यही है सर्वविधा की राजधानी। ” उस समय मैं रामाधार के सवालों को सर झुकाये सुनता रहा। उस समय मेरे पास
कोई जवाब नहीं था। समय के साथ साथ 'विश्वविद्या की इस
राजधानी' की कटु सच्चाई परत दर परत खुलती गई और मुझे जवाब
मिलते गए। इलाहाबाद हाईकोर्ट से निर्णय
आने के बाद स्थिति सामान्य हुई। कुछ सांप्रदायिक तत्वों एवं बड़बोले छात्रों के
कारण हॉस्टल छोडने वाले पांचों मुस्लिम छात्र पुनः हॉस्टल वापस आए और फिर हम लोगों
के साथ उसी भाईचारे और सद्भाव के साथ रहने लगे जो कभी भी किसी विशेष परिस्थिति में
बदल सकता था और बदला भी।
स्नातक द्वितीय बर्ष में हम लोगों को
बिरला छात्रावास आवंटित हुआ। इस छात्रावास में सीटों की संख्या सीमित थी। 200 में
से कुल 110 छात्रों को ही हॉस्टल मिलना था। सामान्य वर्ग और पिछड़े वर्ग के कई
छात्र हॉस्टल से वंचित रहे। इस विश्वविद्यालय में अन्य पिछड़ा वर्ग को छात्रावास
आवंटन में आरक्षण की सुविधा नहीं मिलती है। दलित समुदाय के लगभग सभी छात्रों ने
हॉस्टल की सुविधा हासिल की। कुछ ने अपनी मेधा से तो कुछ ने आरक्षण का लाभ उठाकर।
यह बात सवर्ण समाज के गले में नहीं उतर रही थी। इसी कारण 'प्रीतेश पाण्डेय' के नेतृत्व में बकायदा सवर्ण समाज का गठन हुआ, फेसबुक
पेज बनाया गया। चमारो हॉस्टल छोड़ो,चमारो मादर...,चमारो बहन..., लिखकर जगह जगह चिपकाया गया। हद तो तब
हो गयी जब 14 अप्रैल 2012 की बाबा साहेब के जन्मदिवस पर बिरला छात्रावास ‘अ’ के तीसरे मंजिल पर बाबा साहब की तस्वीर पर गाली
लिखकर जूतों-चप्पल की माला डालकर विधिवत 'सवर्ण महोत्सव' मनाया गया। वैसे बिरला ‘अ’
में कोई भी महोत्सव हो तो वार्डन 'सिंह साहब' ज़रूर उपस्थित रहते थे। इन महोत्सवों में बच्चों के साथ ठंडई पीना सिंह साहब
के बेहद प्रिय कार्यों में से एक था। लेकिन इस कार्यक्रम में किसी विशिष्ट अतिथि
को आमंत्रित नहीं किया गया। इसलिए कार्यक्रम की पूरी जानकारी होने के बावजूद
आमंत्रण पत्र न मिलने के कारण सिंह साहब समझदारी का परिचय देते हुए घर में ही रहे।
कुछ भावुक क़िस्म के सवर्ण एवं रामाधीर के गुस्से के कारण 'सिंह
साहब' को हॉस्टल आना पड़ा। प्रोक्टोरियल बोर्ड में औपचारिक
केस दर्ज हुआ। महीनों बाद 'वरुणा और अस्सी के सुरम्य धारा' में केस से संबंधित कागजातों को 'सुधर्म पथ पर चलाने
वाले' कई व्यक्तियों ने मिलकर बहा दिया।
आज जब उन स्मृतियों में लौटता हूँ तो एक
गहन मानसिकता पीड़ा होती है। लेकिन यह रामाधार है ना कभी भी चैन से बैठने नहीं देता।
आज फिर उसने एक साथ कई सवाल दागे। आज मैं और रामाधार हैदराबाद विश्वविद्यालय के मशरूम
रॉक पर बैठ प्रकृति का आनंद ले रहे था, तेज़ हवा मन को शीतल कर
रही थी। दूर दूर तक हरियाली पसरी हुई थी। सम्पूर्ण वातावरण में एक अपूर्व शांति
व्याप्त थी। चिड़ियों का चहचहाना किसी वाधयंत्र की मानिंद प्रतीत हो रहा था कि तभी
रामाधार मुझसे मुखातिब हो कर पूछने लगा- “यार, ये बताओ, दलित के बारे में सवर्ण की मानसिकता को तो समझा जा सकता है लेकिन अन्य
पिछड़ा वर्ग के बच्चे भी दलितों को वैसे ही गरियाते हैं। मैंने यहाँ भी और बी॰ एच॰
यू॰ में भी कई बार सुना है। सालों के पास ब्रह्मास्त्र है,
चमार-सियार। मैं सोचता हूँ अन्य पिछड़ा वर्ग के बच्चे के पास भी तो अपना अस्त्र है
ही फिर ऐसा क्यूँ?” मैं देख रहा था कि रामाधार बहुत देर से
मानसिक उथल पुथल के दौर से गुज़र रहा था लेकिन मुझे ये उम्मीद नहीं थी कि रामाधार
प्रकृति की गोद में बैठकर इस तरह का सवाल भी कर सकता है। मैं भी ठेठ बिहारी और
बनारसी को फेट कर बोला- “सरऊ तू ना जिये ना देवे।” फिर कुछ देर रुक कर बोलना शुरू
किया- “भारतीय जातिव्यवस्था के संदर्भ में आचर्य हजारी
प्रसाद द्विवेदी का कथन तो याद ही होगा तुम्हें? और जहां तक
आरक्षण का सवाल है- बहुसंख्यक भारतीय समाज आरक्षण का मतलब किसी संस्था में प्रवेश
पाने और सरकारी नौकरी पाने से ही समझता है। अब चूंकि अन्य पिछड़ा वर्ग के 27
प्रतिशत में प्रतिभागियों की संख्या ज़्यादा है तो ज़ाहिर है कि कंपटीशन टफ होगा।
हाल ही में सुनने में आया है कि उत्तर प्रदेश में राजपूत भी आरक्षण की मांग कर रहे
हैं। इससे बड़ी मूर्खता क्या हो सकती है।” मैं बोल ही रहा था
कि रामाधार बोल पड़ा- “तुम्हें क्या लगता है सवर्णों को आरक्षण नहीं है, बी॰ एच॰यू में रहते हुए मैंने सब देख लिया है। साला आज तक मैं यह नहीं
समझ पाया कि तमाम योग्यता के बावजूद वहाँ के पीएचडी प्रवेश में कोई भी OBC, SC या ST छात्र सामान्य वर्ग
में दाखिला नहीं पा सका है। आखिर यह क्या है ?”
--“यह सामान्य वर्ग का आरक्षण है वहाँ
इस 50 प्रतिशत में आप कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकते ऐसा प्रावधान यहाँ के नीति
नियंताओं ने बनाया है।”
--“क्या वे वही नीति नियंता हैं जो कबीर, सूर, तुलसी, रैदास, गांधी आदि के
अच्छे विचारों को पढ़ाया करते थे। ‘शाबर ऊपर मानुष सत्य’ की व्याख्या
किया करते थे?"
--“हाँ तुमने ठीक पकड़ा रामाधार! ये वही हैं। तुमने सुना नहीं पिछले दिन अपने ही विभाग(बी॰
एच॰यू के ) के बड़े प्रतिष्ठित नामी-गिरामी आचार्य ने क्या कहा था-‘ अब अइसन दिन आ गइल कि चमारों के रिसर्च करावे क पड़ी?’ अब तुम्ही बताओ रवीन्द्रनाथ का विश्व मानवतावाद यही है क्या? मैं मानता हूँ कि व्यवहार और सिद्धान्त में फर्क होता है, लेकिन इतना बड़ा नहीं कि सब कुछ बेईमानी लगने लगे। तुम्हें तो यह भी नहीं
पता होगा कि पिछले दिनों प्रो॰ प्रज्ञान पाण्डेय ने मोहम्मद आरिफ से क्या कहा?
--“क्या कहा प्रो॰ प्रज्ञान पाण्डेय ने?”
“आरिफ़ पीएचडी में प्रवेश के लिए 'हिन्दी-उर्दू नवजागरण' विषय पर सिनापसिस तैयार कर साक्षात्कार के लिए गया। वहाँ प्रो॰ पाण्डेय
और तीन अध्यापक मौजूद थे। प्रो॰ प्रज्ञान ने आरिफ़ से पूछा आप उर्दू जानते हैं? आरिफ ने हुलसते हुए जवाब दिया, जी सर जानता हूँ।
इससे मुझे अपने शोध में भी सहूलियत भी होगी। लेकिन तब प्रो॰ साहब ने चिढ़ते हुए कहा
तो आप यहाँ क्या कर रहे हैं? उर्दू विभाग से रिसर्च करते।
किसी सम्मानित अध्यापक का बच्चों से इस तरह का ग़ैर जिम्मेदाराना सवाल करना कहाँ तक
उचित है? विभाजन का ये बीज विश्वविद्यालयों में क्यों दिखता
है? विश्वविद्यालय के छात्र और अध्यापक अपने जातीय बोध से
उभर पाये हैं कि नहीं?” मैं बोलते बोलते चीखने लगा था।
पत्थरों से टकराकर मेरी आवाज़ टूटकर बिखर जा रही थी। अब हमलोग चुपचाप बैठे सन्नाटे
का छंद बुन रहे थे। एक सन्नाटा हमारे बीच पसर रहा। इसी सन्नाटे के बीच स्मृति मैं लौटता
हूँ। लौटता हूँ हैदराबाद विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ हयूमिनिटि के कमरा नंबर 15 में।
प्रो॰ घुमरु पाण्डेय की क्लास होने वाली है। प्रो॰ पाण्डेय ने अपना नाम घुमरु खुद
रखा है,क्योंकि इन्होंने आधी दुनिया घूम ली है फिर भी इनका
मन घुमरु- घुमरु करता है। इसी कारण कक्षा में पढ़ाने के बजाए अक्सर कश्मीर,गोवा से लेकर अमेरिका और आयरलैंड में बच्चों को घुमाते रहते हैं। घूमने
घुमाने से जब समय बच जाता है तब जातीय श्रेष्ठता की कहानी सुनाते हैं। किस तरह
गोरखपुर के भूमिहारों ने छोटी सी गलती पर एक लड़के का पैर काट दिया। भूमिहार दबंग
होते हैं। इसी तरह के जातीय बोध एवं दबंगई को देखते हुए यहाँ के राजा ने उन्हे
कानूनमंत्री बनाया मने चीफ प्राक्टर। हिन्दी के तमाम बड़े बड़े आलोचकों एवं लेखकों
को दो कौड़ी और डेढ़ कौड़ी का बताने वाले प्रो॰ घुमरु भाषा सम्पन्न होने के बावजूद
बच्चों पर अपना सामंती धौंस डालने के लिए वीभत्स एवं निकृष्टम भाषा का प्रयोग करते
हैं। एक दिन एक सेमिनार में दलित अधध्यन पर बात करते हुए वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि- “दलितों का अगर घोर
शोषण हुआ तो दलित समुदाय ने हिन्दू धर्म को लात मारकर छोड़ क्यूँ नहीं दिया?” आगे बढ़ते हुए उन्हों ने कहा कि “मैं अगर अपनी भाषा में कहूँ तो मैं इस
धर्म को थूक कर आगे बढ़ जाता।”
मन सिहर उठता है, एकदम से भिन्ना जाता है
मन,उल्टी आने लगती है, डरने लगता हूँ।
इस तरह का निष्कर्ष सुनकर,लेकिन एक सामान्य छात्र आखिर कर भी
क्या सकता है। मंच पर सामने बैठा व्यक्ति जो बोलेगा वह ब्रह्मा वाक्य ही होगा?
कभी कभी सोचता हूँ विश्वविद्यालयों में
शिक्षा पाने के बाद भी जाति-पाति, धर्म आदि बचा रहता है या फिर इसे बचाया जाता है? एक अनिर्णय की स्थिति पर रुक जाता हूँ और फिर बी॰ एच॰ यू॰ की स्मृति में लौटता
हूँ। याद आता है कि किस तरह एक लड़के ने मुझे सूंघ कर मेरी जाति बता दी थी। पढ़ाई के
दौरान जातीय बोध तो सुना था लेकिन ‘जातीय गंध’ से पहली बार परिचित हो रहा था। जिनकी ध्राण शक्ति इतनी मजबूत नहीं होती
वो सीधे जाति पूछ लिया करते हैं। एक वाकया याद आता है। हम लोगों का मित्र था-मनीष
(है भी)। उसने अपने प्रतिष्ठा का बिषय फ्रेंच को चुना। 'खन्ना
मास्टर' के गैर जिम्मेदाराना रवैये से तो काफी परेशान भी
रहता था। इसलिए हम लोग उसे मनीष फ्रस्टेट भी कहा करते थे। एक बार मनीष जी को किसी
काम से सेंट्रल आफिस जाना हुआ। उन्हें 'ए॰आर(असिस्टेंट
रजिस्ट्रार)' से मिलना था। ए॰आर साहब का नाम था-'प्रो॰ गोपाल राय'। मनीष जी ए॰आर साहब के कमरे में
पूर्ण शिष्टाचार के साथ दाखिल हुए। प्रो॰ राय ने पूछा--"क्या नाम है?"¾'मनीष'।¾“मनीष क्या?"¾'मनीष कुमार'¾"अरे यार, ये
कुमार-कुमारी क्या होता है जी?"
इतना सुनना था कि मनीष जी भड़क उठे, उनका पारा गरम हो गया।
वो बोला--मनीष कुमार ‘भूमिहार’। भूमिहार हूँ । यही सुनना चाहते हैं ना आप ?? यह
कहते हुए गुस्से से तिलमिलाते वह कमरे से बाहर आ गया।
पूर्वाञ्चल अपने इसी विशिष्ट संस्कृति
के लिए कुख्यात रहा है। बी एच यू में भी पूर्वाञ्चल कि यही संस्कृति हावी है। यहाँ
पर आते आते ‘सिंगल सिंह’ डबल सिंह हो जाते हैं और जो पहले से ही
डबल रहते हैं वो 'ट्रिपुल सिंह' हो
जाते हैं। यहाँ पर आकर मुझे सरनेम की महिमा का पता चला। मने मिश्रा, पाण्डेय, सिंह, दुबे, द्विवेदी, चतुर्वेदी, राय आदि
सरनेम आपको अच्छे अंक दिलाने में सहायक हो सकते हैं। हिन्दी विभाग के अध्यक्ष ; जो कि बजरंग बली के पक्के भक्त थे और बिना लाल टीका लगाए घर से निकलना
अशुभ मानते थे, ने इस बात का खुलासा मेरे सामने स्नातक
द्वितीय वर्ष में ही कर दिया था। अँग्रेजी की प्रो॰ सिंधु चौधरी,जो कि दलित समुदाय से आती थी वो भी देखा-सुनी सरनेम देखकर अंक देने लगी।
मने मिश्रा, पाण्डेय, सिंह, दुबे, द्विवेदी, चतुर्वेदी, राय आदि को देखकर को जानबूझ कर कम अंक दिया करती। कभी कभी तीस अंक के
सेशनल में अंक काट भी लेती थी। पूर्वाञ्चल में अवस्थित होने के कारण बी एच यू
पूर्वाञ्चल की उस सामंती संस्कृति से काफी प्रभावित है जिसमें-- गोली है,गाली है ,डंडा है,बल्लम है,लाठी है,लठैत हैं,जाति है,वर्चस्व की लड़ाई है। इसी वर्चस्व की लड़ाई के बीच 'लिंगदोह
कमेटी' के अनुसार वर्ष 2011-12 में छात्र परिषद का चुनाव हुआ।
छात्र परिषद के इस छोटे से चुनाव में डराने-धमकाने के लिए गोली-पिस्तौल निकले,डंडा और हॉकी स्टिक तो हमेशा हाथ में ही
रहता। यूनीवर्सिटी का पूरा माहौल गरम था--बच्चे डर कर
घर भाग रहे थे। रामाधार भी घर भाग गया। घर पहुँच कर उसने मुझसे फोन पर यूनीवर्सिटी
का हाल जाना। पूरी स्थिति से अवगत होने के बाद उसने कहा-“अच्छा
है जो यहाँ छात्रसंघ नहीं है। यहाँ की संस्कृति में छात्रसंघ का आना आतंक को बढ़ावा
देना है।” रामाधार की बात में दम था। वैसे तफसील से देखें तो हम इस निष्कर्ष पर
पहुँचते हैं कि यूनीवर्सिटी में भय का
माहौल तो था ही। यूनीवर्सिटी के सारे बच्चे कला संकाय और सामाजिक विज्ञान संकाय के
बच्चों से डरते थे। हम कला संकाय के बच्चों का नारा था और है भी--"आर्ट्स
फ़ैकल्टी डायनामाइट" --आर्ट्स फ़ैकल्टी के कुछ बच्चे वाकई
में डायनामाइट थे जो कभी भी किसी पर फूट सकते थे। बिरला के सामने से कोई तेज़ बाइक
नहीं चला सकता था क्योंकि ये बिरला के नियम के खिलाफ था। लड़कियां अगर बिरला के
सामने से बिना भद्दे कमेन्ट सुने गुजर जातीं तो ये लड़कियों के लिए आश्चर्य की बात
होती। लड़कियों के मामले में मारपीट आम बात थी।
ऐसा कतई नहीं था कि बिरला छात्रावास की
हवा में ही फास्फोरस घुला हुआ था। हर सत्र में बिरला छात्रावास के बच्चे अच्छे
रिजल्ट दिया करते थे। लेकिन 5 से 10 बच्चे हर सत्र में ऐसे होते जो बिरला के
इतिहास एवं बिरला की गरिमा को बचाए रखने के लिए प्रतिबद्ध होते। सीनियरों द्वारा
इनकी अच्छी ख़ासी ट्रेनिंग होती और प्रशासन का इन पर वरदहस्त होता।
साल 2013 के शुरुआत की एक घटना मैं
ताउम्र नहीं भूल पाऊँगा। बिरला के कुछ ट्रेंड लड़ाके मधुवन में (संगीत-मंच कला
संकाय के बगल का मैदान ) बैठे हुए थे। इन्हीं में से एक दुबला-पतला-ठिंगना दिखने वाले एक
लड़के ने दूर बैठे एक लड़के को बुलाया और दनादन उसके चेहरे पर बीस-पच्चीस थप्पड़ जड़
दिए और बोला-'चल भाग भोसड़ी के।' लड़के
का चेहरा सूज गया और वह रोता हुआ वहाँ से भागा। इस घटना को मंत्रमुग्ध भाव से देख
रहे बड़े लड़के ने कॉलर उठाते हुए,बाहें फैलाते हुए पूछा-“का
बेटा? काहे मरले रे?” छोटे (ठिगने) ने
उतनी ही सहजता से जवाब दिया-“सारे के चेहरा ठीक न लगत रहल।”
इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में इस से बुरा क्या हो सकता है कि किसी व्यक्ति को
कोई इसलिए पीट दे कि उसका चेहरा उसे पसंद नहीं आया। प्रोक्टोरियल बोर्ड इस तरह के
कारनामे को मूक दर्शक बन देखती रहती,उन्हें ऊपर से आदेश होता।
गुर्गे पालना और शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में बनाए रखना यूनिवर्सिटी प्रशासन और
कई प्रोफेसरों का शौक था और है भी।
इसी संतुलन और असंतुलन के बीच ब्राह्मण
लाबी और राजपूत लाबी के संघर्ष ने ‘मधुर मनोहर अतीत सुंदर इस सर्वविधा की
राजधानी’ को समरभूमि में बदल दिया। 20 नवम्बर 2014 को 15-20
छात्रों ने मिलकर पूरी यूनिवर्सिटी का माहौल बिगाड़ कर रख दिया। छात्रसंघ के नाम पर
कार्यकारी कुलपति के आफिस में घुसकर उन्हें साजिशन पीटने की कोशिश की गई। मामला
बिगड़ गया। मौके पर पी॰ ए॰ सी॰ ने आकर मोर्चा संभाला। पी॰ ए॰ सी॰ से दो घंटे के
गौरिल्ला युद्ध के बाद छात्र शांत हुए,लेकिन यूनिवर्सिटी के
अंदरूनी पॉलिटिक्स के कारण छात्रों से बात करने कोई भी व्यक्ति नहीं आया। चीफ
प्राक्टर चैन से नीरों की भाति बांसुरी बाजा रहे थे। रात को जब माहौल शांत हुआ तो
हमारे एक वार्डन 'प्रो॰ रामज्ञान' आदत
के अनुसार अपने ही हाथ से अपना पीठ ठोंकते हुए बच्चों को समझाने के बजाए भड़काने
में जुटे हुए थे। देवयोग से ये वही महाशय थे जो अक्सर सांप्रदायिक सद्भाव एवं
फासीवादी ताकतों के खिलाफ बड़े बड़े लेख लिखा करते थे और इन्होंने ही अगले दिन के
युद्ध को "कबीला युद्ध" की संज्ञा दी। अगली सुबह 9 बजे से कुछ असामाजिक तत्वों
के कारण बिरला एवं ब्रोचा के बच्चे आमने सामने थे। बिरला की ओर से सम्पूर्ण कला
संकाय एवं समाज विज्ञान संकाय मिला कर मुश्किल से 150 छात्र रहे होंगे (जाहिर है
छात्रों का समर्थन इन्हें नहीं मिला था)। वहीं दूसरी ओर 600-700 छात्रों की डरी
हुई भीड़ थी। उनके चहरे पर बिरला का आतंक साफ देखा जा सकता था। 8 घंटे तक बच्चे
लड़ते रहे। यूनिवर्सिटी प्रशासन मीटिंग पर मीटिंग करती रही। कार्यकारी वी सी के
कार्यकाल पर काला धब्बा लगाने के लिए दोनों लाबी (राजपूत और ब्राह्मण) प्रतिबद्ध
थे। बाद में पी॰ ए॰ सी॰ के दखल के बाद 200 निर्दोष छात्रों को माहौल को काबू में
करने के लिए जेल में भेज दिया गया। मैं और रामाधार भी जेल गए। रामाधार ने जेल में
मुझसे पूछा--“यार हम लोगों ने तो कुछ किया नहीं। जिसने सारा माहौल बिगाड़ा वो तो
खुले आम घूम रहे हैं। हमारे प्रशासक भी सब जानते हैं। फिर हमे जेल क्यूँ?”
मैंने कहा- “बाबू नए राजा का चुनाव होने
वाला है। यह उत्तराधिकार युद्ध है।”
हम लोगों के जेल से छूटते ही नए राजा का
राज्याभिषेक हुआ। राजपूत लाबी एवं ब्राह्मण लाबी के संघर्ष में 9 साल बाद ब्राह्मण
लाबी विजयी हुई। जिसने कबीला युद्ध में सबसे ज़्यादा पत्थर फेंके उसने उतना ही भारी
माला राजा के गले में पहनाया। कुछ लड़ाके बच्चों ने राजा की अगुआनी की। राजा ने आते ही कबीला
युद्ध की जांच के लिए कमेटी बनाई। कमेटी ने 17 छात्रों को यूनिवर्सिटी से निलंबन
का निर्णय दिया। इनमें से सारे छात्र उपाध्याय, मिश्रा, तिवारी, पाण्डेय, राय, सिंह थे। दरबार
सजाया गया। सब दरबारी उचित जगह पर बैठे। राजा ने कहना शुरू किया- “अगर मैं इन 17 छात्रों को निलंबित कर देता हूँ तो क्या होगा? इनके माँ-बाप हमसे पूछेंगे नहीं कि क्यूँ निकाला हमारे बच्चों को? मैंने तो संस्कारी बच्चा भेजा था,आपने ऐसी कौन सी
शिक्षा दी कि ये इस रास्ते पर चल पड़े??”राजा के सवाल में दम
था। दरबारी मंत्र-मुग्ध थे। राजा ने
निर्णय दिया। “सब बच्चे अपने हैं, इन्हें प्यार से पुचकार कर
समझाओ, समझ जायेंगे"--- बी॰ एच॰ यू॰ में राजा का 2015
में आदर्शवादी निर्णय और 2016 में भारत के तमाम विश्वविद्यालयों का यथार्थ मुझे
हिला देता है। कोई बच्चा कैसे राजा की नज़र में देशद्रोही हो जाता है??? सामान्य मारपीट की घटना (जो हुई कि नहीं हुई उस पर अभी कई सवाल हैं) में
पाँच छात्रों को एक साथ निलंबित कर दिया जाता है। जब छात्र अपने न्याय की मांग के
लिए महीनों बैठे रहते हैं ;कोई भी प्रशासनिक सदस्य इन बच्चों
को देखने तक नहीं आता। ये बच्चे न्याय कि गुहार करते हैं लेकिन
प्रशासन के कान में जूं तक नहीं रेंगता। राजा के सामने एक बच्चा फांसी लगा लेता है
पर राजा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। तब रामाधार के कई सवाल किसी भी सामान्य मस्तिष्क
के व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर देते हैं--“भाई इस तरह की
मारपीट तो अपने बी॰ एच॰ यू॰ में आए दिन हुआ करती थी। अक्सर सर सुंदरलाल अस्पताल में
बच्चे भर्ती हो जाते थे। जीवन और मौत से जूझते कईयों को मैंने खुद देखा है। छोटी-मोटी
लड़ाई तो रोज़ होती है वहाँ। वैसे भी यहाँ तो अभी तक यह बात ही साबित नहीं हो सकी कि
मारपीट हुई भी थी या नहीं? फिर बिना किसी प्रमाण के राजनैतिक
दबावों के बीच 'घुमरु पांडेय' ने पाँच
छात्रों को निलंबित क्यूँ कर दिया। क्या वे दलित थे इसलिए?
क्या यहाँ के राजा से लड़के की माँ कोई सवाल नहीं पूछेगी??
क्या हमारा राजा हत्यारा नहीं है?? इस हत्या को क्या कहा जाए? रामाधार लगातार सवाल पर सवाल किए जा रहा था- “क्या हमारी न्याय व्यवस्था
सवर्णों के लिए अलग है दलितों के लिए अलग? तुम्हें नहीं लगता
इस केस को राजनीतिक रंग दिया गया है,जिससे सुनो आजकल-याक़ूब
को गरियाते हुए देशभक्ति का पाठ पढ़ाने आ जाते हैं। इन मोटे दिमाग वालों को ये क्यूँ
नहीं समझ में आता कि अगर आतंक और आतंकवादी का ही सपोर्ट करना होता तो कसाब का भी
कर दिये होते। उसे भी तो फांसी पड़ी थी। अजफल और याक़ूब के केस में हमारी
न्यायपालिका खुद द्वंद में थी तो फिर एक राजनैतिक सम्पन्न व्यक्ति इन मुद्दों पर
अपना विचार क्यूँ नहीं रख सकता। विचारों की हत्या क्यूँ?? अब
समझ में आता है कि सुकरात को जहर का प्याला क्यूँ दिया गया?
उसने तो बहुत बड़ा गुनाह किया था। उसने अपने देश के नवयुवकों को सोचने और सवाल करने
के लिए प्रेरित किया और जब आप सवाल करना शुरू करेंगे तो आपसे बड़ा देशद्रोही कोई
नहीं होगा। हम विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र कोई सवाल नहीं कर सकते। हम
गांधी जी के ऐसे बंदर हैं जो बुरा देखता है, सुनता है और
बोलता भी है लेकिन सवाल नहीं कर सकता।"
मैंने बीच में टोंकते हुए बोला- “आकदमिक
जगत में अगर कैरियर बनाना है तो कोई सवाल नहीं, चुपचाप सिर झुकाकर सुनते रहो। जो पसंद आए
उसे ग्रहण करो और जो न पसंद आए उसे दूसरे कान से निकाल दो। मगर कोई सवाल नहीं।"
¾ “क्या कैरियर
ऐसे ही बनता है???
¾ “हाँ ठीक इसी
तरह। आकादमिक जगत में विशिष्ट योगिता के बिना तुम अयोग्य हो। तुम्हें तो याद ही
होगा सब।
विश्वविद्यालयी जीवन में अक्सर देखा गया
है कि परास्नातक में प्रवेश करते ही छात्र विशिष्ट योगिता हासिल करने में जुट जाते
हैं। जहां जितनी अधिक संख्या होती है वहाँ कंपटीशन अधिक टफ होता है। बी॰ एच॰ यू॰
में यह कंपटीशन ज़्यादा टफ था। सब एक दूसरे के सर पर पैर रखकर या पैर खींच कर आगे बढ़ना
चाहते थे। यहाँ विशिष्ट योग्यता हासिल करने के लिए आपको किसी खेम से जुड़ना होगा। 'प्रो॰ त्रिलोकी नाथ' एक साथ कई खेमा बनाए हुए थे। शिक्षकों के लिए अलग, छात्रों
के लिए अलग। कुछ छात्र ऐसे ज़रूर थे जो शिक्षकों के खेमे में आ जा सकते थे। एक
खुफिया तंत्र नज़र गड़ाए रहता था कि कौन किसका छात्र है। प्रो॰ त्रिलोकीनाथ त्रिकालदर्शी
थे वो बच्चे से अक्सर हंस कर मिलते और उनकी हंसी छीन लेते। उन्होंने पूरे विभाग का
माहौल ऐसा बिगाड़ रखा मानो विभाग में षड्यंत्र चल रहा हो। हमलोग 'चंद्रकांता संतति' पढ़ते ही नहीं उसका सामना भी करते।
कोई कभी भी किसी वेष में मुखौटा बदल कर किसी के सामने आ सकता था और उसका राज जान
सकता था।
यह सिर्फ किसी एक विभाग की कहानी नहीं
है। भारत के आकादमिक जगत के सभी विभागों की कहानी एक सी है। जहां जैसा कंपटीशन है
वहाँ वैसी लड़ाई है। 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय' ने भले ही मानव संसाधन
को उपयोगी बनाने के लिए विशिष्ट योग्यता रखी है-नेट एवं जे आर एफ़ आदि की; लेकिन सफलता का मूल-मंत्र आपको किसी मठ में ही मिलेगा। इसका पता मुझे तब चला जब मेरे प्रिय
मित्र रामधार के साथ एक अप्रत्याशित घटना घटी। रामाधार परास्नातक द्वितीय बर्ष में
प्रवेश के साथ ही जे आर एफ़ की डिग्री हासिल कर ली थी। एक दिन साहित्य अकादमी के सांस्कृतिक
कार्यक्रम में रामाधार हिन्दी विभाग के अध्यक्ष 'प्रो॰ बी
पाण्डेय' से मिला। अध्यक्ष महोदय रामाधार से काफी प्रसन्न
रहते थे। अक्सर सभा, संगोष्ठी में रामाधार की तारीफ किया
करते थे-“रामाधार काफी ऊर्जावान है,रामाधार कोई काम काफी
गंभीरता से करते हैं--वगैरह वगैरह।" रामाधार भी अध्यक्ष
महोदय को काफी सम्मान की दृष्टि से देखते थे और अक्सर अध्यक्ष महोदय से सलाह मशवरा
किया करते थे। इसी कारण काफी हुलसते हुए रामाधार अध्यक्ष महोदय से आगे की पढ़ाई के
मार्गदर्शन के लिए पहुंचे। रामाधार ने कहा- “गुरु जी मैं फोर फ़र्स्ट क्लास हो ही
जाउगा। 10th से B.A. तक 70
प्लस है। M.A.में 75 प्रतिशत आने की उम्मीद है। इस बार जे आर
एफ़ भी हो गया है। आप मार्गदर्शन करें, पी॰ एच॰ डी॰ एडमिशन की
क्या प्रक्रिया है??” अध्यक्ष महोदय ने बेहद आत्मीय ढंग से
कहा--“देखा रामाधार! हमार त रिटायरमेंट नजदीक ह। यहाँ क त
जानते हौवा। कौनों गुरुजी पकड़ा ओके बिना काम न होई।”
रामाधार अपना लटका हुआ मुंह लेकर मेरे
पास आया। मैं उस समय कविता पढ़ रहा था। उसने सारी घटना मुझे संक्षेप में बताई और
फिर कहने लगा-“एक जिम्मेदार अध्यक्ष ऐसा कैसे कह सकते हैं? आखिर ये
कौन लोग हैं? आखिर ये किस संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं?? तमाम अच्छाईयों के बावजूद एक टका सा जवाब। क्या अच्छे लोग खत्म हो गए हैं
दुनिया में??” मैं राजेश जोशी की कविता पढ़ रहा था। मैंने
कहा- “नहीं खत्म नहीं हुए हैं। उड़कर किसी दूसरे ग्रह पर चले गए हैं। तुमने पढ़ा नहीं राजेश जोशी की
कविता- 'मैं उड़ जाऊंगा'
मैं सारे स्वप्नों को गूँथ-गूँथकर
एक खूब लंबी नसैनी बनाऊँगा
और सारे भले लोगों को ऊपर चढ़ा कर
हटा लूँगी नसैनी
ऊपर किसी ग्रह पर बैठकर
ठेंगा दिखाऊँगा मैं सारे दुष्टों को
कर डालो कर डालो जैसा करना हो नष्ट
इस दुनिया को।
यही सच्चाई है आकादमिक जगत के सच्चे
लोगों की।
¾ लेकिन यार ये
तो वही लोग हैं ना जो मुक्तिबोध की उस पंक्ति को बोलते अघाते नहीं- “तोड़ने होंगे
मठ और गढ़ सब” ये किस प्रकार का मठ बना रहे हैं?
--देख रामाधार तमाम विश्वविद्यालयों में
इसी तरह के मठ बनाए जा रहे हैं। इन मठों में हत्या एवं आत्महत्या होती है। रोज़
हमारे व्यक्तित्व की,ज़मीर की और आत्मा की हत्या होती है। अलोकधन्वा ने कहा ही है-
“हत्याएँ और आत्महत्याएँ एक जैसी रख दी
गई है
इस आधे अंधेरे समय में
फर्क कर लेना साथी "
हम फर्क नहीं कर पाते। मठ हममें वह चेतना विकसित ही नहीं होने देना चाहती की हम
फर्क कर पायें। हर रोज़ कोई न कोई अकादमिक
हत्या का शिकार है।
कुछ देर हमदोनों के बीच सन्नाटा पसरा
रहा। रामधार ने सन्नाटा भंग करते हुए मुझसे पूछा--"अब तुम क्या करोगे? तुम तो जे आर एफ़ भी नहीं निकाल पाये, विशिष्ट योग्यता
हासिल करोगे??"
¾ नहीं रामाधार
बहुत होगा तो उसी पटना सिकंदरबाद एक्सप्रेस से घर चला जाऊँगा जिससे यहाँ आया था।”
¾ घर क्यूँ??वो गाड़ी आगे भी जाती है
और कई जगहों पर उसका पड़ाव भी है। चलो आगे चलें।”
रामाधार की इस बात में दम था। परास्नातक
पास करके हम आगे बढ़े। कैंट स्टेशन से ठीक शाम 5 बजे उसी पटना-सिकंदरबाद एक्सप्रेस से
हम आगे बढ़े। बनारस को और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को पीछे छोड़ते हुए। रामाधार
भावुक था। ट्रेन में हम दोनों घंटों बनारस की मीठी स्मृतियों को जीते रहे। रामाधार
ने कहा- “बी॰ एच॰ यू॰ हमारे सम्मान का सबसे बड़ा शब्द है। आज हमने जो निर्णय लिया; निर्णय लेने की यह
शक्ति हमें इस विश्वविद्यालय ने ही दी।” मैंने भी सहमति में
सर हिलाया। सीटी बजाती हुई,धुआँ उड़ाती हुई ट्रेन आखिर में हमें अपने गंतव्य पर पहुंचाया। अकादमिक जगत तमाम
छल-छदमों के बीच हम हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय पहुंचे और आज भी अकादमिक जगत
के अंतहीन आकाश में पतंग उड़ा रहे हैं।
| अकादमिक जगत के कोहरे में यात्रा अभी भी जारी है............... |

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