Skip to main content


हबीब जालिब (1929-1993) पाकिस्तानी क्रांतिकारी कवि, वामपंथी कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ हैं। इन्होनें उस अलोकतांत्रिक माहौल में मार्शल लॉ, अधिनायकवाद और राज्य दमन का विरोध किया। बकौल फैज अहमद फैज-“वह वास्तव में जनता का कवि था।” हबीब जालिब की इस गीत को लाल बैंड ने गाया है। इस गीत को बुलंद आवाज में बाग़ी तेवर के साथ आप गा सकते हैं।






मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ
जो चाहे मुझपे जुल्म करो

इस दौर के रस्म रिवाजों से,
इन तख्तों से इन ताजों से,
जो जुल्म की कोख से जनते हैं,
इंसानी खून से पलते हैं,
जो नफरत की बुनियादें हैं
और खूनी खेत की खादें हैं,
मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ
जो चाहे मुझपे जुल्म करो

वो जिनकी ओठ के जुंबिश से,
वो जिनकी आँख की लरजिश से,
कानून बदलते रहते हैं,
और मुजरिम पलते रहते हैं,
उन चोरों के सरदारों से
इंसाफ के पहरेदारों से
मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ
जो चाहे मुझपे जुल्म करो

जो औरत को नचवाते हैं
बाजार की जींस बनवाते हैं
फिर उसकी इस्मत की गम में
तहरीकें भी चलवाते हैं
उन जालिम और बदकारों से
बाजार के उन मयमारों से
मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ
जो चाहे मुझपे जुल्म करो

जो कौम की गम में रोते हैं
और कौम की दौलत ढोते हैं
वो महलों में जो रहते हैं
और बात गरीब की कहते हैं
उन धोखेबाज लुटेरों से
सरदारों और बडेरों से
मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ
जो चाहे मुझपे जुल्म करो

मजहब के जो व्यपारी हैं,
वो सबसे बड़ी बीमारी हैं
वो जिनके सिवा सब काफिर हैं,
जो दीन का हर्फ़-ए-आखिर हैं,
इन झूठे और मक्कारों से
मजहब के ठेकेदारों से
मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ
जो चाहे मुझपे जुल्म करो

जहाँ सोचों पे ताजीरें हैं
जहाँ बिगड़ी हुई तकदीरें हैं
जातों के गोरखधंधे हैं
जहाँ नफ़रत के ये फंदे हैं
सोचो की ऐसी पस्ती से
इस जुल्म की गन्दी बस्ती से
मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ
जो चाहे मुझपे जुल्म करो


मेरे हाथ में हक़ का झंडा है
मेरे सर पे जुल्म का फंदा है,
मैं मरने से कब डरता हूँ,
मैं मौत की खातिर जिन्दा हूँ
मेरे खून का सूरज चमकेगा
तो बच्चा बच्चा बोलेगा
मैं बाग़ी हूँ, मैं बाग़ी हूँ
जो चाहे मुझपे जुल्म करो









Comments

  1. हबीब जालिब की ये कविता जनता की अंतस की उपज है| सुन्दर ....

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

‘देह ही देश’ भग्न देह और विदीर्ण मन का कोलाज आज जब पूरा विश्व साम्राज्यवादी-उग्र राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों और धार्मिक-सांप्रदायिक हिंसा की कार्रवाइयों के साथ-साथ विश्वयुद्ध के ख़तरे की ओर लगातार बढ़ रहा है ; ऐसे समय में युद्ध एवं युद्धनीति की क्रूर सच्चाई बयाँ करती गरिमा श्रीवास्तव की क्रोएशिया प्रवास-डायरी ‘देह ही देश’ वैश्विक साम्राज्यवादी साजिशों एवं षड्यंत्रों से संचालित फासीवादी राष्ट्रवाद के ख़तरों की तरफ इशारा करती है। यह किताब ‘वृहद स्वच्छ सर्बिया’ के नाम पर बोस्निया, हर्जेगोविना, क्रोएशिया की निर्दोष और मासूम जनता के साथ किये जाने वाले बर्बरतम अत्याचारों का ज्वलंत दस्तावेज है। ‘ देह ही देश ’ में सर्ब सैनिक तथा सर्ब प्रतिवेशियों द्वारा स्त्रियों के सामूहिक बलात्कार, एथनिक क्लींजिंग, धार्मिक जेनोसाइट के ब्यौरे गहरी संवेदनात्मक संलग्नता के साथ प्रस्तुत किए गए हैं। किताब में आँकड़े, रिपोर्ट, इंटरव्यू, बातचीत के माध्यम से बताया गया है कि 1991-95 के बीच ‘ग्रेटर सर्बिया’ के नाम पर सर्बियाई जनता के मन में उग्र राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भर दिया गया और उसके बाद शुरू हुआ स्त्रियों के ...

रेडियो का वक़्त - ब्रेख्त

फासीवाद के चरमकाल में जर्मनी के ब्रेख्त ने कई नाटक लिखे । इनमें से कुछ नाटकों का अनुवाद अमृतराय ने 'खौफ़ की परछाइयाँ' नाम से किया ।  वैसे तो इस संग्रह के सभी नाटक महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन इस समय मैं आपके सामने एक नाटक को रखता हूँ।  नाटक का शीर्षक-  'रेडियों का वक्त' । भले ही यह नाटक फासीवादी दौर का है लेकिन आप जब इससे होकर गुजरेंगे तो आपको लगेगा यह नाटक तो हमारे समय का है । यह नाटक तो  दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की कहानी कह रहा है ।   आप इस नाटक से होकर गुजरते जाइए आपको महसूस होगा कि नाटक का मुख्य पात्र तो आपका जाना पहचाना है । आपको महसूस होगा कि आप तो उसे रोज टी.वी. पर देखते हैं । आपको महसूस होगा कि इस नाटक  अनाउंसर  तो दिनभर प्राइम टाइम तथा अन्य तमाम बहसों में दिखता रहता है ।     रेडियो का वक़्त   (एक कारखाने में शॉप सुपरिटेंडेंट का दफ्तर। एक रेडियो अनाउंसर हाथ में माइक्रोफोन लेकर एक अधेड़ मजदूर, एक बुड्ढी मजदूरनी और एक कम उम्र मजदूरनी से बातचीत करता है। इन लोगों से पीछे की ओर एक कारखाने का अफसर और एक नाजी सैनिक की पोशाक...
मूर्खता का सौन्दर्यशास्त्रीय विवेचन बनाम बलम परदेशी जायका!! गप्प  आज पूरे एक साल बाद रामाधार से भेंट हुई ।   रामाधार बहुत गुस्से में था । कुछ दिन पहले ही मुझे पता चला कि रामाधार को ब्लड प्रेशर की   बीमारी हो गयी है। मैंने उससे कहा था कि अकादमिक जगत को दिल से मत लगाओ , दिल के मरीज हो जाओगे।   लेकिन बददिमाग सुनता ही नहीं किसी की।   अपनी ही धुन में जीता है , अपने मन की करता है। उसे तनिक भी परवाह नहीं कि आगे क्या होगा ?  जब भी मैं उसे डांटता हूँ तो वो कहता है, ‘एक ही जिंदगी तो मिली है घुट-घुट के नहीं जियूँगा , समझौतापरस्ती मुझसे नहीं होगी दोस्त।’ आज उसका पारा गरम था। गुस्से में आया और परिचय 2017 का अंक मेरे सामने फेंकते हुए बोला, ‘देखो इसमें क्या-क्या लिखा है शुक्ला जी ने’ ! मैं जब तक कुछ समझता रामाधार ने बोलना शुरू किया, ‘ इनकी आदत   बहुत खराब है। जैसे ही कोई पदमुक्त होता है या पद से हटाया जाता है , वैसे ही ये हज़रत उसको सार्वजनिक रूप से गरियाना शुरू करते हैं। जैसे विनय सिंह के पद से हटाए जाने पर इन्होनें रविशंकर भैया की श्रद्धांजलि की आड़ में उन...