Skip to main content

Posts

‘देह ही देश’ भग्न देह और विदीर्ण मन का कोलाज आज जब पूरा विश्व साम्राज्यवादी-उग्र राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों और धार्मिक-सांप्रदायिक हिंसा की कार्रवाइयों के साथ-साथ विश्वयुद्ध के ख़तरे की ओर लगातार बढ़ रहा है ; ऐसे समय में युद्ध एवं युद्धनीति की क्रूर सच्चाई बयाँ करती गरिमा श्रीवास्तव की क्रोएशिया प्रवास-डायरी ‘देह ही देश’ वैश्विक साम्राज्यवादी साजिशों एवं षड्यंत्रों से संचालित फासीवादी राष्ट्रवाद के ख़तरों की तरफ इशारा करती है। यह किताब ‘वृहद स्वच्छ सर्बिया’ के नाम पर बोस्निया, हर्जेगोविना, क्रोएशिया की निर्दोष और मासूम जनता के साथ किये जाने वाले बर्बरतम अत्याचारों का ज्वलंत दस्तावेज है। ‘ देह ही देश ’ में सर्ब सैनिक तथा सर्ब प्रतिवेशियों द्वारा स्त्रियों के सामूहिक बलात्कार, एथनिक क्लींजिंग, धार्मिक जेनोसाइट के ब्यौरे गहरी संवेदनात्मक संलग्नता के साथ प्रस्तुत किए गए हैं। किताब में आँकड़े, रिपोर्ट, इंटरव्यू, बातचीत के माध्यम से बताया गया है कि 1991-95 के बीच ‘ग्रेटर सर्बिया’ के नाम पर सर्बियाई जनता के मन में उग्र राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भर दिया गया और उसके बाद शुरू हुआ स्त्रियों के ...
हिंदी में जब कोई काव्य संग्रह आता है तो अक्सर तमाम पाठक-लेखक एक वाक्य शगल की तरह दुहराते हैं कि किसी एक संग्रह में अगर 2-4 कविताएं ढंग की हों तो उस संग्रह को सफल मानना चाहिए .  पिछले दो-तीन दशकों में, वैश्विक दुनिया की आपा-धापी में पाठकों और लेखकों की यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे और बढ़ती गई है. इस दौर में लेखक जल्द से जल्द महाकवि हो जाने की होड़ में शीघ्र छपाई और सोशल मीडिया पर धुँआधार प्रचार के माध्यम से खुद को स्थापित करने में जुट गया है. पिछले दो-तीन दशक में हिंदी भाषा के सैकड़ों काव्य-संग्रह आए. इन काव्य-संग्रहों में आपको 5-7 संग्रह ही ऐसे मिलेंगे जिनकी प्रत्येक कविता औसत या औसत से ऊपर की हो. 1990 के बाद आलोकधन्वा के संग्रह ‘दुनिया रोज बनती है’ के अलावा अभी तक मेरे सामने कोई भी संग्रह ऐसा नहीं आया जिसकी प्रत्येक कविता गौर करने लायक हो. कल हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. गोपेश्वर सिंह के ‘जनसत्ता’ में छपे लेख ‘कविता परोक्ष की विधा है’ ने मेरा परिचय चन्दन सिंह नामक कवि से करवाया. इनके संग्रह का नाम है--‘बारिश के पिंजड़े में’. इस संग्रह की खासियत है इसकी हरेक कविता आपको प्रभ...