मूर्खता का सौन्दर्यशास्त्रीय विवेचन बनाम बलम परदेशी जायका!!
गप्प
गप्प
आज पूरे एक साल बाद रामाधार से भेंट हुई। रामाधार
बहुत गुस्से में था। कुछ दिन पहले ही मुझे पता
चला कि रामाधार को ब्लड प्रेशर की बीमारी हो गयी है। मैंने उससे कहा था कि अकादमिक जगत को दिल से मत लगाओ,
दिल के मरीज हो जाओगे। लेकिन बददिमाग
सुनता ही नहीं किसी की। अपनी ही धुन में जीता है,
अपने मन की करता है। उसे तनिक भी परवाह नहीं कि आगे क्या होगा? जब भी मैं उसे डांटता हूँ तो वो कहता है, ‘एक ही जिंदगी तो मिली है
घुट-घुट के नहीं जियूँगा, समझौतापरस्ती मुझसे नहीं होगी
दोस्त।’ आज उसका पारा गरम था। गुस्से में आया और परिचय 2017
का अंक मेरे सामने फेंकते हुए बोला, ‘देखो इसमें क्या-क्या लिखा है शुक्ला जी ने’! मैं जब तक कुछ समझता रामाधार ने बोलना शुरू किया, ‘इनकी
आदत बहुत
खराब है। जैसे ही कोई पदमुक्त होता है या पद से हटाया जाता है, वैसे ही ये हज़रत उसको सार्वजनिक रूप से गरियाना शुरू करते हैं। जैसे विनय
सिंह के पद से हटाए जाने पर इन्होनें रविशंकर भैया की श्रद्धांजलि की आड़ में
उन्हें सार्वजनिक रूप से गाली देना शुरू किया। ठीक उसी तरह अब बलिराज पाण्डेय के
पदमुक्त होते ही उन्हें भी गरियाना शुरू कर दिया। भले ही इन दोनों से इनके
कार्यकाल के दौरान इन्होनें व्यक्तिगत तौर पर खूब लाभ लिया हो, खूब मलाई खायी हो’।
मैंने बीच में टोकते हुए कहा, ‘भाई बलिराज पाण्डेय से तो इन्होनें खूब लाभ लिया
मैं जानता हूँ और देखा भी हूँ कि किस तरह से हर सेमीनार-संगोष्ठियों में इनकी दादागिरी
चलती थी। परास्नातक के 30 अंक तो इनकी ही मुट्ठी में होते थे, जब भी मैंने पाण्डेय
जी के पास इन नंबरों को लेकर शिकायत की या अधिन्यास पत्र संबंधित जानकारी लेने कि
कोशिश की; पाण्डेय जी का यही जवाब होता था मुझसे नहीं शुक्ला जी से मिलिए। लेकिन
विनय सिंह से इन्हें क्या लाभ हुआ’? रामाधार गुस्से में दांत
पीसते हुए बोला, ‘पता करना कितना बड़ा लाभ हुआ है विनय सिंह से’। मैं रामाधार के
गुस्से को भांपते हुए मद्धिम स्वर में बोला, ‘भाई तू ही बता दे, क्यों मैं किसी और से पूछूं’? रामाधार अपनी रौ में
था। वह आज कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था, इसलिए बहुत तेज आवाज में चीखते हुए बोला,
‘नहीं बे तुम खुद पता करो, बहुत काबिल भी बनते हो’। रामाधार
का चेहरा गुस्से से सुर्ख लाल था, मैं डर गया और सहमते हुए (मेमने की तरह मेमियाते
हुए) कहा, ‘भाई मुझ पर क्यों गुस्सा कर रहे हो। मैं पता कर लूँगा खुद से ठीक! आप
मुझे माफ करें’!
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| यही पत्रिका रामाधार ने मेरे सामने फेंका था |
कुछ देर तक हमदोनों के बीच सन्नाटा पसरा रहा। लेकिन मैं जानता
था रामाधार अभी गुस्से में है वो इतने में चुप होने वाला नहीं है। इसलिए मैं वहां
से उठ कर किचन में गया और पपाया शेक बनाने के लिए पपीता छिलने लगा। मैं पपीता छील
ही रहा था कि इतने में रामाधार मुझसे मुखातिब होते हुए पूछता है, ‘अबे तुम्हें
क्या लगता है इनका अगला टारगेट कौन होगा’? मैं पपीता छिलते-छिलते तनाव वाले माहौल को शांत करने के लिए मजाकिया लहजे
में कहा, ‘कोई हो ना हो तू अगर ऐसे ही बोलते रहा तो अगला टारगेट तू ही होगा। शायद
रामाधार मेरी बात को सुन नहीं रहा था वो तो अपनी ही धुन में था। उसके चेहरे का
तनाव साफ-साफ देखा जा सकता था। वो कहने लगा, ‘मुझे लगता है अगला टारगेट अशोक सिंह
या कुमार पंकज होंगें या फिर शक्ति संतुलित होते ही रामाज्ञा’। रामाज्ञा जी शशिधर
का नाम सुनते ही मैं भी चौकन्ना हो गया। कुछ लोगों का नाम सुनते ही मेरे कान लाल
हो जाते हैं। मैंने पूछा कि, ‘तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? अभी
तो इन दोनों में दांत काटी दोस्ती है। रामाधार ने बहुत संजीदगी से कहना शुरू किया,
‘उससे क्या होता है? शुक्ला जी रामाज्ञा राय को छोड़ेगें नहीं। क्योंकि शुक्ला जी भी बखूबी जानते हैं कि अशोक सिंह के यहाँ उनकी कब्र रामाज्ञा
बाबू ने ही खोदी है। ज्ञातव्य हो कि अशोक सिंह के अध्यक्ष बनने से २- 3 महीने पहले
और अध्यक्ष बनने के २-3 महीने बाद तक रामाज्ञा जी ने खूब आगे-पीछे किया अशोक सिंह के
। उन्हीं के साथ घूमते-फिरते थे। रामाज्ञा जी ने तो 2 लोगों के लिए कब्र खोदी थी- आशीष
त्रिपाठी और श्री प्रकाश शुक्ल की। लेकिन कहते हैं न कि सारा मामला शक्ति संतुलन
पर टिका होता है। शुक्ला जी की अतिशय महत्वाकांक्षा ने सब कुछ उलट पलट दिया। इसलिए
तुम कागज पर लिख लो शुक्ला जी रामाज्ञा राय शशिधर को कभी छोड़ेंगें नहीं’।
अब गुस्साने की बारी मेरी थी। मैंने रामाधार को डांटते हुए कहा,
‘तुम्हें इन सब से क्या मतलब? चुपचाप अपना
रिसर्च जमा करो और कहीं नौकरी पाओ, ज्यादा फिलासफी मत झाड़ो यहाँ।
सूअर!!! अगर यही आदत रही तो इस अकादमिक जगत में तुम्हें नौकरी मिलने से रही, जानते नहीं हो यहाँ बेबाक टिप्पणी
करने वाले, बेबाक बोलने वाले मेधावी छात्रों को सलेक्ट करने से ज्यादा उन्हें
रिजेक्ट करवाने के लिए फोन किया जाता है।–‘दुबे जी फलां का नहीं होना चाहिए,
सिंह साहेब ये लड़का बहुत काबिल बनता है इसको रगड़ दीजियेगा इंटरव्यू में'--अबे गधे संभल जा, अब भी वक्त है। समय रहते संभल जा। ये लोग आपस में लड़े-भिड़े, एक दूसरे का सिर फोड़ दें तुम्हें क्या? अंत में ये लोग
एक दूसरे के साथ ही रहेंगें। याद है ना विनय सिंह की नियुक्ति होते ही किस तरह से शुक्ला
जी ने दोस्ती का हाथ बढाया था? उस समय ये हज़रत भूल गए थे कि
ये वही निर्लज्ज अक्षम अध्यापक हैं जिनका स्वभाव लपकने
वाला कनफुकवे टाइप का है’।(अलविदा रविशंकर, पेज 5) रामाधार बीच में तपाक से बोल उठा, ‘उससे क्या
होता है। विनय सिंह ने जो डांट पिलायी, वो भी याद करो’। इस बार मैंने रामाधार के समक्ष दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘भाई
मेरे तू समझता क्यों नहीं? चुपचाप अपना काम कर ना इस तरह की व्यवहारिक
आलोचना का क्या मतलब है? क्यों पिले पड़े हो छोड़ों ना इसे’?---‘क्यों छोड़ दू बे? हिंदी में तो यही व्यवहारिक
आलोचना चल रही है, टेक्स्ट को कौन पढता है’? मैंने फिर दोनों
हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘भाई रामाधार पहले मुझे ये टेक्स्ट ठीक से पढ़ लेने दो तब मैं
कुछ बोल पाऊंगा। बिना मतलब की हवाई फायरिंग से कोई फायदा नहीं है। भाई तेरा दिमाग
गरम है। मैं मानता हूँ बलिराज जी से तुम दिल से जुड़े हो
लेकिन तुम्हें याद होना चाहिए तुमने BHU भी बलिराज जी की टिप्पणी के बाद ही छोड़ा
है’। अब रामाधार का पारा और गरम हो गया, ‘देख ज्यादा नौटंकी मत कर। जो गलत है सो
गलत है और मैं गलतियों को चीख-चीख कर सबके सामने बोल सकता हूँ। साले सिर्फ ब्रेख्त
को कमरे में चिपका लेने भर से नहीं होगा’। अब रामाधार ने दांत पीस कर आवाज को और भी
कुटिल बनाते हुते बोलना शुरू किया-"दोस्तों मैं चाहता हूँ तुम सच को जानों और
उसे बोलो!"-इस कथन को सिर्फ दीवार पर चिपका लेने
भर से नहीं होगा हरामखोर! किसे अँधेरे में रख रहे हो? अपना
मुखौटा उतारो, बड़े आये प्रगतिशील बनने। साला कम्युनिस्ट बनता
है’। रामाधार जोर-जोर से चीखने लगा शायद उसका ब्लड प्रेशर बढ़ गया था। मैंने पपाया शेक बनाना छोड़ कर पहले रामाधार को आराम से बैठाया। हवा
किया, थोड़ी देर में वो शांत हुआ तब मैंने उसे पपीते के साथ कुछ जरुरी दवाएं खिलाईं और साथ वाले कमरे में AC
ऑन करके इस आश्वासन के साथ सोने को कहा कि मैं भी पहले इसे पढ़ लूँ
तब मिलकर बात करेंगें। रामाधार बिस्तर पर लेटते हुए बड़बड़ाया, ‘साला कम्युनिस्ट!! AC
में सोता है और बात मजदूरों की करता है’। मैंने रामाधार की इस
टिप्पणी को चुपचाप सुना और दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘हाँ भाई मैं हूँ पूंजीपति!!
बस तू अभी सो जा तब तक मैं इसे पढ़ लूँ’। इस स्थिति में मैं रामाधार से ज्यादा बात
नहीं करना चाहता था और कोई मौका होता तो मैं रामाधार को समझा देता कि’ ‘मार्क्स ने
कहीं भी ये नहीं कहा है कि ये मत पहनो, वो मत खरीदों। जहाँ
तक मैं कम्युनिज्म के सिद्धांत को समझता हूँ उसके अनुसार अगर मैं हवाई यात्रा करता
हूँ तो मैं ऐसी व्यवस्था की कामना भी करता हूँ जिसमें मजदूर भी हवाई यात्रा कर
सकें, इतना नहीं तो कम से कम रेल के प्रथम श्रेणी की टिकट
खरीदने की हैसियत ज़रूर हो उसकी’। बहरहाल इस समय मेरा चुप रहना हमदोनों के
स्वास्थ्य के लिए अच्छा था। मुझे लगता है रामाधार जैसा मेधावी और संवेदनशील छात्र ये बात जानता भी होगा लेकिन गुस्से में आदमी सारे सिद्धांत भूल जाता
है, इसलिए मैं चुपचाप बगल वाले कमरे में आकर परिचय पत्रिका
को उलटना-पलटना शुरू किया।
वैसे हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं
से मेरा दूर का रिश्ता है, दरअसल आजकल साहित्य के बाजार
में पत्र-पत्रिकाओं का कुटीर उद्योग खूब फल-फूल रहा है। इस दौर का साहित्यकार बाढ़ में आई जलकुम्भियों की तरह हमारे
डायनिंग हॉल में घुस आया है। लेकिन हम कर भी क्या
सकते हैं। रामाधार के भय से मैंने पत्रिका को उलटना-पलटना शुरू किया। संपादकीय को
सरसरी निगाह से देखने के बाद मैं मैत्री में महाभोज पार्ट-2 को पूरी तन्मयता के
साथ पढ़ने लगा। पढ़ते हुए मुझे इस बात पर विश्वास हो गया कि लेखक के लेखन में व्यक्तिगत
घृणा, कुंठा, ईर्ष्या, द्वेष
हावी होता है, जब किसी लेखक का उद्देश्य किसी व्यक्ति
विशेष को सिर्फ और सिर्फ गाली देना होता है तब उसकी भाषा कब गाली की भाषा हो जाती
है, खुद लेखक को भी नहीं पता चलता। लेखक कब अपनी भाषा में
स्त्री विरोधी हो जाता है उसे पता ही नहीं चलता। भले ही वह लेखक काव्यशास्त्र और
व्याकरण शास्त्र का अध्यापक ही क्यों न हो? कक्षा में काव्यशास्त्र और व्याकरण
शास्त्र की बारीकियों को समझाने वाले ‘वरिष्ठ कवि शुक्ला जी’ की भाषा बिलकुल ही
दोयम दर्जे की थी। प्रूफ़ की गड़बड़ी इतनी जगह थी कि ऐसा लग रहा था मानों जल्दबाजी
में प्रूफ रीडिंग करना ही भूल गए। वैसे भी गाली की भाषा में प्रूफ़ की कोई ज़रूरत
नहीं होती। संस्मरण पढ़कर मैं स्तब्ध था। कोई व्यक्ति इतना लिजलिजा कैसे हो सकता है?
मुझे इसी परिचय पत्रिका के 2014 का कुख्यात संपादकीय याद आने लगा
जिसमें ‘अलविदा रविशंकर’ की आड़ में क्या क्या नहीं कहा गया था प्रो.विनय सिंह और रामाज्ञा
राय को। मृत व्यक्ति के कंधे पर बंदूक रखकर गोली चलाना कोई इनसे सीखें। स्वर्गीय रविशंकर
भाई की आत्मा जहाँ कहीं भी होगी, कलपती होगी। राजनीति और तमाम तरह के छल छद्मों से
दूर रहने वाले उस छात्र ने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा होगा कि पितातुल्य अभिभावक
श्री प्रकाश शुक्ल उसकी लाश पर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करेंगें।
धीरे-धीरे मेरा पारा गरम हो रहा था, मुझे हँसी भी आ रही थी और रोना भी। रामाधार के जगने
से पहले मैं ‘परिचय-2014’ का संपादकीय भी फिर से पढ़ गया। सूर्यास्त करीब था, कब 4
घंटा बीत गया मुझे पता ही नहीं चला। कुछ देर बाद रामाधार उबासी लेते हुए मेरे कमरे
में आया और सुस्ताते हुए मुझसे पूछा, ‘क्या बे पढ़ लिए 'नीचता
पुराण'? रामाधार ने जगते ही बम मारा। मैं एकदम से सटकदम।
धीरे से बोला, ‘हाँ भाई पढ़ लिया’।---‘तब क्या कहते हो? ये वही अध्यापक महोदय हैं न
जो कक्षा में हिंदी साहित्य की दशा पर स्यापा करते हैं,
शोध की स्थिति पर आठ-आठ आंसू रोते हैं। देखा
कितना जबरदस्त और मौलिक शोध किया है इन्होनें? ई ससुर लोग कक्षा
में चिल्लाते रहेंगे कि 100 साल होने को हैं, रामचंद्र शुक्ल के बाद हिंदी का कोई
मौलिक इतिहास नहीं लिखा गया, अरे भाई आप भी सुकुल हैं, सुकुल
जी की कुर्सी पर कविता भी लिखे हैं; इतिहास भी लिखिए ना। मगर इनको इन सबसे फुर्सत
मिले तब ना’!! मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी कि रामाधार जगते ही फायर हो जाएगा। मैंने रामाधार
से मुखातिब होते हुए कहा, ‘देखो भाई इस तरह बात करने का कोई औचित्य नहीं है। ऐसा
करते हैं पहले मैं ग्रीन टी बनाता हूँ तब तक तुम फ्रेश होकर ये वाला संपादकीय ‘आलोचकीय
विवेक’ से पढो। फिर हमलोग बैठ कर बात करेंगे’। इतना कहते हुए मैंने उसे परिचय के
2014 का अंक थमाया और कहा इसे पहले पढो उसके बाद हम साथ बैठ कर बात करेंगे।
रामाधार 'अलविदा रविशंकर' को फिर से पढने बैठा।
मुश्किल से 3 पेज पढ़ा ही होगा कि चाय पीते हुए उसने कहा, ‘भाई शीर्षक देखकर ऐसा
लगता है कि लेखक और अध्यापक श्री प्रकाश शुक्ल जी बड़े भाई रविशंकर से जुडी हुई स्मृतियों
और यादों को ताजा करेंगे। उन सारे संवेदनात्मक पहलुओं को हमसे साझा करेंगे जो कि
रविशंकर के विराट व्यक्तित्व को और ज्यादा खोले। लेकिन भाई यहाँ अगर हम ठहर कर
देखें तो पाते हैं कि इस लेख में स्वर्गीय रविशंकर भैया और उनसे जुड़ी हुई
संवेदनाएँ तो सिर्फ मोहरा हैं। शुक्ला जी तो अपने सहकर्मी को गरियाने के लिए
रविशंकर भाई की मौत से मिली हुई संवेदना को भुनाना चाहते हैं। तुम्हीं देखो ना
शुक्ला जी ने जहाँ लेख की शुरूआत करते हुए शुरूआती 30 पंक्ति में रविशंकर भैया की
जीवटता और बिगड़ते हुए स्वास्थ्य को दिखाया है वहीं अगली 40 पंक्ति
विनय सिंह को गरियाने में खर्च कर दी है’। मैं पूरी गंभीरता से आलोचक रामाधार की
बातें सुन रहा था। मैंने मजा लेते हुए कहा, ‘अबे तुम तो टेक्स्ट आधारित आलोचना
करने लगे? बिलकुल सही पकड़े हो। दरअसल ये रविशंकर की आड़ में
विनय सिंह और रामाज्ञा राय से अपनी भड़ास निकाल रहे थे। अगर ये वाकई में रविशंकर पर
लिख रहे होते तो 11 पेज के लेख में कम से कम रविशंकर पर 9 पेज
जरुर खर्च करते, लेकिन इन्होनें रविशंकर पर मुश्किल से 4 से 5 पेज खर्च किया। इस बार
रामाधार ने मजा लेते हुए कहा, ‘अगर रविशंकर पर ज्यादा पेज खर्च कर दिए होते तो
विनय सिंह और रामाज्ञा जी को गरियाने के लिए अलग से संपादकीय लिखना होता, वैसे भी ये पत्रिका पहले से ही संसाधन की कठिनाई से गुजर रही है’। मैंने
कहा, ‘ये संसाधन की कठिनाई क्या होती है बे? भाषा सुधार ले
भाई। संसाधन की कमी होती है लल्लू लाल! आज पहली बार संसाधन की कठिनाई शब्द सुना
हूँ’। रामाधार ने थोड़ा झेंपते हुए कहा कि, ‘ये पद मेरा नहीं है। ये पद शुक्ला जी
का ही है। मैं तो बस बोल गया’।---‘अच्छा तब तो मैं ही गलत हूँ। शुक्ला जी वरिष्ठ
कवि हैं, उनसे गलती होने की संभावनाएँ नगण्य है’। रामाधार तपाक से बोल पड़ा, ‘तुम किस
ग़फलत में जी रहे हो भाई प्रो.बलिराज पाण्डेय और प्रो.मनोज सिंह ने व्याकरणिक
अशुद्धियों की एक लंबी सूची सोशल मीडिया पर जारी की है’।
मैं बिलकुल चौंकते हुए बोला, ‘इस दोयम दर्जे के लेखन पर सिर्फ
हमलोग ही अपना समय बर्बाद नहीं कर रहे? अध्यापक लोग भी अपना बहुमूल्य समय दे रहे हैं। वैसे मैं शुरू से ही इस बात
का आग्रही रहा हूँ कि इस तरह के काइयां व्यक्तित्व को सबके सामने लाया जाए’।
बहरहाल!! ‘हम भाषा पर बात कर रहे थे ना? देखो रामाधार भाई व्याकरणिक अशुद्धि पर मैं ज्यादा जोर नहीं दूंगा। इस तरह की
अशुद्धियां हमलोगों से भी प्रायः होती रहती है। यहाँ मामला भाषा का नहीं विचार का
है, शुक्ला जी के नोशन का है, उनकी मंशा का है। सच कहूँ
दोस्त उनकी मंशा साफ नहीं है’।
रामाधार मेरी बात को गंभीरता से सुन रहा था। उसने बीच में टोकते हुए कहा, ‘मैं तुम्हारी बातों को ठीक-ठीक
समझ रहा हूँ। अब यही देखो न जिस विनय सिंह ने इन्हें बिना रिफ्रेशर कोर्स किये रीडर
बना दिया, वो निर्लज्ज कनफुकवा हो गया। उस समय तो ये उसी निर्लज्ज कनफुकवे को कह
रहे थे कि आप थोड़ा कुलपति पंजाब सिंह का कान फूंक आयें और मुझे डिप्रेशन में जाने
से बचा लें। उसने बचाया भी’। मैं एकदम से चौंक गया, ‘ओहो
विनय सिंह वाला मामला ये था?---‘जी हाँ यही था। अब समझे तुम। यह ठीक है उसमें उनका अपना भी स्वार्थ था, लेकिन
जब आप उस व्यक्ति को क्रूर कह रहे हैं तो आपको ये बात ध्यान में रखना होगा कि कभी
उसी क्रूर व्यक्ति के हाथ से आपने मलाई भी खायी है। अरे उस समय आप मलाई नहीं खाए होते।
रीडर बनने के लिए इतनी हड़बड़ाहट क्यों? इसलिए न कि आपके कई
सहकर्मी रीडर बन गए और आप डिप्रेशन में जाने लगे? इतनी ईर्ष्या, इतनी जलन तो हम छात्रों
में भी नहीं होती। एक साल और इन्तजार कर लिए होते साहेब! अब जब आप उस व्यक्ति को
गरियायेंगे तब मुझ जैसे हरेक छात्र को पदोन्नति वाला वाकया याद आएगा’। मैंने मजा
लेते हुए कहा, ‘अरे 2017 वाले अंक के पेज नंबर 168 पर इसीलिए
शुक्ला जी ने लिखा है कि-"शत्रुता मित्रता का अटूट बंधन है यहाँ।" मैंने हँसते हुए कहा, विनय सिंह वाले मामले में इसी को थोड़ा उलट दो मित्रता के बाद शत्रुता कर दो। उस समय दोस्ती रही होगी
अब दुश्मनी हो गयी है’। लेकिन रामाधार अभी भी गंभीर मुद्रा में ही था, ‘देखो ऐसे
हँसों मत!! मुझे अजीब लगता है ये सब!! कुछ देर ठहर कर फिर बोलना शुरू किया, जहाँ
तक उपरोक्त पद की बात है, ये पद रामज्ञा और शुक्ला जी के
संबधों को व्यक्त करने के लिए ज्यादा मुफीद है। तुम्हीं
सोचो एक साल पहले तक सोशल मीडिया से लेकर पब्लिक प्लेस तक में दोनों एक दूसरे को
गाली देते रहते थे। इस बीच युवा कवि संगम-2016 में रामाज्ञा जी ने वरिष्ठ कवि
शुक्ला जी को बस इसलिए मंच से दूर रखा कि वो शुक्ला जी को ‘फर्जी कवि’ मानते आये
हैं। उस समय तो शुक्ला जी का गुस्सा देखते बन रहा था। और आज वही रामाज्ञा जी 'परम प्रेमी' हो गए’।
मैंने बीच में रोकते हुए कहा उतना दूर कहाँ जा रहे हो और वैसे
भी हमें हवा में कोई बात नहीं करनी है। बात सिर्फ टेक्स्ट आधारित होगी। 'अलविदा रविशंकर' को उलटो
पलटो! ‘तुम्हीं सोचो कि जो व्यक्ति पुत्र समान शिष्य के
मृत्यु के अगले दिन उस शिष्य को खबरी, निहायत औसत दर्जे का
छात्र कहते हुए उस शिष्य पर निर्मम टिप्पणी करें वह व्यक्ति 'परम प्रेमी' कैसे हो सकता है? जाहिर यह परिस्थिति कि मांग है, दुश्मनों पर
हथगोला फेंकने वाला कोई क्रांतिकारी तो चाहिए ना? इस संस्मरण में शुक्ला जी ने रामाज्ञा
जी के लिए जितना विशेषण प्रयोग किया है, उन सब का अगर तुम
मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन करो तो पाओगें कि जब भी कोई व्यक्ति इस तरह के विशेषण का
प्रयोग अपने आसपास के लोगों के लिए करता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि लिखते समय उस
व्यक्ति के मन में और भी बहुत कुछ चल रहा है; इसलिए वह व्यक्ति
बहुत सचेत होकर विशेषण का प्रयोग करता है। मैंने तुम्हें पहले भी कहा है कि शुक्ला
जी रामाज्ञा राय शशिधर को इस जन्म में तो नहीं छोड़ेगें। अगर छोड़ दिए तो मैं इनके
शिष्य प्रेम पर सवालिया निशान लगाता हूँ। मृत्यु के बाद भी जो व्यक्ति पुत्र समान
शिष्य को गाली दें; वो व्यक्ति कुछ ही दिनों बाद परम स्नेही
कैसे हो सकता है? कैसे पीठ पर डायनामाइट लेकर घूमने वाला व्यक्ति (यह रूपक परास्नातक
के दौरान कवि हृदय गुरुवर शुक्ला जी के मुखारविंद से रामाज्ञा जी के लिए निकला था)
इतनी जल्दी ‘बालसुलभ कौतूहल’ करके आकर्षित करने लगता है’। कुछ तो गड़बड़ है दया---(मद्धिम
हँसी)
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| पाण्डेय जी पर केंद्रित संस्मरण |
रामाधार ने मुझे रोकते हुए कहा कि,‘देखो यह संस्मरण पाण्डेय जी
पर केंद्रित है। इसलिए अब सिर्फ तुम पाण्डेय जी पर केंद्रित होकर बात करो, बहुत हो
गया रामाज्ञा जी और शुक्ला जी के संबंधों पर विमर्श’। रामधार कहने लगा, ‘अबे इनका
दोहरा चरित्र तो देखो 2 साल पहले जिस ग्रुप का नाम इनके
अनुसार 'दानापानी' हुआ करता था, अब 'फोसला' हो गया। दानापानी
ग्रुप पर अलग से लिखने वाले शुक्ला जी दानापानी ग्रुप पर तो नहीं लिख पायें लेकिन
इस संस्मरण में उन्होंने अपने शिष्य स्वर्गीय रविशंकर को फोसला ग्रुप का नायक बना
ही दिया’। इस बार मुझे बहुत तेज गुस्सा आया। मैं एकदम से झल्लाते हुए बोला, ‘देख
रामाधार मुंह संभाल के बात कर मैं आदरणीय रविशंकर भाई के बारे में कोई अनाप-शनाप
टिप्पणी नहीं सुन सकता। मैं श्री प्रकाश शुक्ला नहीं हूँ कि तुम निर्मम टिप्पणी
करते रहो और मैं तुम्हें परम मित्र घोषित करूँ’।---‘भाई गुस्सा मत हो। मैं तुम्हें
समझाता हूँ। तुम्हारी भावनाओं और अग्रज के प्रति प्रेम की मैं कद्र करता हूँ। लेकिन
मेरी बात भी तो सुनो’।--मैं बहुत गुस्से में था, मेरा पारा गरम हो गया था। रविशंकर
भाई पर इस तरह की टिप्पणी मेरी लिए नाकाबिले बर्दाश्त थी। फिर भी मैंने अपने आपको
संभालते हुए कहा, ‘बको!!!! क्या बकना चाहते हो?? रामाधार ने समय की नज़ाकत को समझते
हुए थोड़ा धीमे स्वर में बोला, ‘रीजनिंग पढ़े हो ना’?---‘हाँ पढ़ा हूँ’---तो सुनो! ‘अलविदा
रविशंकर’ के पेज नंबर 8 में देखो शुक्ला जी ने स्पष्ट शब्दों
में लिखा है कि "इस समूह (दानापानी ग्रुप) के भी रविशंकर नायक थे।"
आज जब दानापानी की जगह शुक्ला जी ने फोसला पर मुहर लगा दिए तब 2 साल
बाद फोसला (मने frustrated one sided lovers association) का
नायक कौन होगा? अब समझे’?
मैं रामाधार के तर्क सुन एकदम से झल्ला गया---‘अबे साहित्य में रीजनिंग
नहीं होती है। बेसिर-पैर की बात मत करो’---‘क्या बेसिर-पैर की बात कर रहा हूँ बे? संस्मरण में एक प्रोफेसर बेसिर-पैर कि बात करें
तो ठीक, मैं करूँ तो लगे टेक्स्ट आधारित ज्ञान देने। देखो ना
संस्मरण का पेज नंबर 170। इस तरह गर्हित बातें तो हम छात्र
हॉस्टल में भी नहीं करते थे। देखो न क्या लिखा है इस वरिष्ठ कवि ने-"पाण्डेय
जी हिंदी विभाग के लोकप्रिय शिक्षक रहे हैं। छात्रों से अधिक छात्राओं के प्रिय।
इतने कि इनके पूरे कार्यकाल में मेरा मतलब जब से शिक्षक रूप में इस विभाग में आये,
कभी सूखा नहीं पड़ा।"--किसका सूखा नहीं
पड़ा बे? लड़कियों का? लड़कियों को आप
समझते क्या हैं? कितना भी प्रगतिशील बन लीजिये साहेब दिमाग
में हमेशा स्त्री विरोधी बातें ही आयेंगी। क्या लड़कियां
सजाने की वस्तु हैं? लड़कियां हरियाली हैं क्या जिससे सूखा
नहीं पड़ेगा’--रामाधार का पारा धीरे-धीरे गरम हो रहा था। मैं भी हतप्रभ था; इतने निचले स्तर की बात शुक्ला जी कर सकते हैं मैंने
सोचा भी नहीं था। संस्मरण तो मैंने भी पढ़ा लेकिन इन सारी
बातों को डिकोड नहीं कर पाया। रामाधार आज अपनी लय में था। कहने लगा, ‘तुम कह रहे
थे न कि रीजनिंग मत बुझाओ। इसको क्या कहोगे--"कमरा हमेशा हरा व भरा रहता। कई
छात्र भी इनके कमरे में बैठ कर इनसे लाभान्वित होते रहते।"(परिचय 2017, पेज 170) आदरणीय कवि हृदय शुक्ला जी के कहने का आशय यह है कि
कई छात्र भी frustrated one sided lovers association के
सदस्य थे। तुम्हें पता ही होगा कि बलिराज पाण्डेय के चैम्बर में सबसे ज्यादा किस
ग्रुप का छात्र दीखता था’? मैंने हकलाते हुए कहा, ‘हाँ पता
है। स्वर्गीय रविशंकर भैया और उनके साथियों का! उनके गुजरने के बाद हमलोग भी आते-जाते
रहते थे’।---‘तो क्या रविशंकर भैया और उनके साथी frustrated one sided
lovers थे’??---‘देखो जबान संभाल के बात करो।
हमारे अग्रज आदरणीय हैं’।---
‘अरे मेरे जबान की ऐसी की तैसी, मैं तो जबान संभाले हुए ही था, अपने
प्रिय गुरु जी से जाकर कहो थोड़ा कलम संभाल लेते। उन्हें नहीं पता था कि वो क्या
लिख रहे हैं’। इसी बीच मैं भी अपनी बात रखना चाहता था। मैंने रामाधार को रोकते हुए
कहा,‘BHU में इतने कुंठित लोग हैं कि अफवाहें फैला-फैला कर अपनी कुंठा का शमन करते
हैं। मैंने भी BHU प्रवास के दौरान इस तरह
की अफवाहें पाण्डेय जी के संदर्भ में एक-दो बार सुनी। इन अफवाहों को लेकर मैंने
व्यक्तिगत तौर पर कुछ लड़कियों से बातचीत भी की। उन लड़कियों का यही कहना था कि
हमलोग पाण्डेय सर के साथ सुरक्षित महसूस करते हैं। तुम्हीं सोचो ना अगर लड़कियों को
चैम्बर में ही जाना होता तो बलिराज पाण्डेय के बगल वाले चैम्बर में भी जा सकती थीं’।
कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने फिर से बोलना शुरू किया, ‘परास्नातक तक आते-आते
बच्चे भी अपना हित-अहित जानने लगते हैं, नहीं तो बच्चे बालसुलभ कौतुक करने वाले के
पास भी जाते’। रामाधार फिर ऊँची आवाज में चीखने लगा, ‘अरे इ शुक्ला जी क्या
बोलेंगें? मैं नहीं जानता हूँ इस बालसुलभ व्यक्तित्व को। हर आती जाती लड़की के
ड्रेस पर कमेंट करता था वह। इंटरव्यू के दौरान लड़कियों के सौन्दर्य को निहारता था।
मेरे क्लास की कई लडकियां मुझसे कई बार बोलीं कि ये महाशय सवाल कम पूछते हैं,
ड्रेस पर ज्यादा चर्चा करते हैं। अरे साहेब वरिष्ठ हैं, 11 साल से पढ़ा रहे हैं।
कुछ तो लिहाज कर लो’। मैंने बोला, ‘करेंगें कैसे? जब एक सहकर्मी आपकी इस नौटंकी को
‘बालसुलभ कौतुक’ कह कर आपको कन्हैया बनाएं तो आप क्यों लिहाज करने लगें’? अब
रामाधार दांत पीसते हुए बोला, ‘दरअसल ये लेखक महोदय गर्दन तक नीचता में डूबे हुए
हैं। किसी को गाली देना हो तो कुछ भी तर्क गढ़ लेंगें। लडकियाँ इनके लिए सजाने की वस्तु
है, किसी व्यक्ति विशेष का मजाक उड़ाने के लिए भी लड़कियों को टूल्स के रूप में
प्रयोग करते हैं ये। ये क्या ख़ाक शोध करवायेंगें? मैं पूरे दावे के साथ कह सकता
हूँ इनका मर्दानापन इतना हावी है कि ये अपने अंदर शोध कर रही लड़की को उचित सम्मान
नहीं देते होंगे। चूँकि ये मान चुके हैं कि लड़की सजावट की वस्तु है इसलिए ये महाशय
अपने हर कार्यक्रम में लड़कों को ही प्रोजेक्ट करते हैं, लड़कियों को वही काम देते
हैं जो इनके मानस में व्याप्त है’।
रामाधार पूरे गुस्से में था। इसी बीच मेरे फ्लैट की कॉल बेल बजी।
मैं कमरे से उठकर दरवाजा खोलने गया। खाना बनाने वाली आंटी दरवाजा खुलने का इन्तजार
कर रही थीं। मैंने दरवाजा खोला। आंटी अंदर आई और किचन में जाकर गंदे बर्तन साफ
करने लगीं। मैं चुपचाप रामाधार के पास आकर बैठ गया। हमदोनों के बीच एक चुप्पी पसरी
हुई थी कि तभी इस चुप्पी को तोड़ते हुए आंटी ने कहा, ‘भैया क्या बनाना है? मैं सोच
ही रहा था कि रामाधार बीच में बोल पड़ा, ‘इसके दिमाग का कीमा बना दीजिये!! मैंने आंटी
से कहा, ‘आंटी जो है सो बना दीजिये। आंटी 3 लोगों का खाना बनाना है’। उसके बाद
रामाधार को समझाते हुए बोला, ‘अबे आंटी आयी हैं इसलिए धीरे-धीरे बोलना। इतना जल्दी
टेम्पर लूज मत करो यार’।---‘क्या टेम्पर लूज नहीं करूँ बे’---‘भाई आहिस्ता आहिस्ता!!
यही तुममें कमी है। तुम टेम्पर लूज करते हो और सामने वाले को मौका मिल जाता है’।---‘कितना
टेम्पर संभाल के रखूं यार। देखो न इनको इस बात का दुःख है कि पाण्डेय जी ने सायबर लाइब्रेरी
का नाम रविशंकर भाई के नाम से नहीं होने दिया। वही रविशंकर जिसे इन्होनें
जाने-अनजाने में frustrated one sided lovers कहा
हैं’।---मैंने मस्तिष्क सिकोड़ते हुए कहा, ‘फिर वही बात’---‘नहीं यार सुनो तो!---‘सुनाओ---‘देखो
शुक्ला जी खुद ही पिछले संपादकीय में लिखकर कबूल कर चुके हैं कि रविशंकर पाण्डेय
जी के भी बहुत प्रिय थे। इसी कारण पाण्डेय जी ने रविशंकर भाई के मरणोपरांत शोध
उपाधि दिलवाने में सकारात्मक पहल की (अलविदा रविशंकर, पेज 9)। और रही बात सायबर लाइब्रेरी
के नामकरण की, तो तुम जानते ही हो कि इस विभाग में जब सूर, तुलसी, कबीर और रैदास
के नाम पर लड़ाई हो जाती है तो रविशंकर भाई कौन सी बड़ी हस्ती हैं? यही रामाज्ञा जी जिनके
‘पिनपिनाने वाले मन’ को लेकर शुक्ला जी आजकल आकर्षित हुआ करते हैं, वही व्यक्ति हर
काम में पिनपिना के अड़ंगा लगा देता है। याद है न जब शिक्षक दिवस के दिन हमलोगों ने
तुलसी की प्रतिमा विभाग में लगायी थी तो तो इसी रामाज्ञा जी राय ने विभाग से लेकर
अस्सी और VT तक इसको कितना बड़ा मुद्दा बनाया था। हमलोगों ने कभी सोचा भी नहीं था कि
प्रतिमा भी मुद्दा का विषय हो सकती है। जब ये लोग पूर्वजों की प्रतिमा पर राजनीति-राजनीति
खेल सकते हैं तो समझ सकते हो लाइब्रेरी के नामांकन में कितनी बड़ी राजनीति होती’।
मैंने बीच में रोकते हुए कहा, ‘बहुत हो गया तुम्हारा व्याख्यान
अब टेक्स्ट पर बात करो। टेक्स्ट छूटता जा रहा है’। रामाधार ने कहा, ‘तुलनात्मक
अध्ययन भी आलोचना के अंतर्गत ही आता है, मैंने दोनों लेखों को सामने रखकर अपनी बात
रखी है’। मैंने कहा, ‘फिर भी!! चलो संस्मरण पर बात करते हैं। पेज नंबर 182 का पहला
पैराग्राफ थोड़ा ठहर के पढो। इसमें शुक्ला सर का दुःख साफ दिख रहा है कि पाण्डेय जी
ने पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का ‘सह संयोजक’ उन्हें न बनाकर आशीष त्रिपाठी को बना दिया।
भाई जिस व्यक्ति के रीडर बन जाने पर ये डिप्रेशन में चले गए थे वही व्यक्ति इनके
होते हुए ‘सह संयोजक’ कैसे बन गया’? रामाधार ने बीच में टोकते हुए कहा, ‘भाई इनके
तर्क तो देखो!! ये कह रहे हैं कि वरिष्ठ प्रो. के रहते हुए आशीष त्रिपाठी को सह
संयोजक कैसे बना दिया पाण्डेय जी ने? अरे भाई 15 वरिष्ठ प्रो. को बायपास कर के यही
पाण्डेय जी ने आपको हिंदी विभाग का सबसे बड़ा वाल पद (साहित्य संयोजक) साहित्य
समिति का अध्यक्ष बना दिया, उस समय वरिष्ठता क्रम तेल लेने गया था क्या? या फिर
बकौल रामाज्ञा राय आप उन 15 से बहुत ज्यादा योग्यता रखते थे’? मैंने रामाधार को
धीरे से डांटते हुए कहा, ‘भाई देखो तुम तेल-वेल जैसे शब्दों का प्रयोग कर के सामने
वाले को मौका देते हो’। मैं इधर रामाधार को समझा रहा था कि आंटी ने कहा, ‘मैं जा
रही हूँ भैया!! समय से मोटर बंद कर दीजियेगा’। मैंने प्रतिउत्तर में कहा, जी आंटी!!
फिर क्या था रामाधार अपनी रौ में आ गया, जोर-जोर से बोलने लगा, ‘भाई
भाषा और शब्दों का प्रयोग मुझे मत सिखाओ। हाँ मुझे रूपक गढ़ने नहीं आता है। मैं
काव्यशास्त्र का अध्यापक नहीं हूँ और ना ही मैं महाभारत की कथा सुना सकता हूँ। लेकिन
जो कहता हूँ खरी-खरी कहता हूँ’। मैंने रामाधार को बीच में टोकते हुए कहा, ‘अरे तुम
शुक्ला सर द्वारा प्रयुक्त कथा और कथा रूपकों से क्यूँ डरते हो? ये सब बस भौकाल बनाने
का माध्यम है। कभी ग़ालिब आयेंगें, कभी मीर आयेंगें तो कभी राजशेखर और मम्मट साथ
में आ जायेंगें। अगर वाकई में इन कथा या इन लोगों के उदात्त विचारों से इनका लेना
देना होता तो इतनी ऊँची बात करने वाला व्यक्ति एकाएक इतने निचले स्तर की बात कभी नहीं
करता। दरअसल महाभारत के बारे में कहा गया है कि इसमें सभी तरह की मनोवृत्तियाँ मिल
जायेंगी। गुरु जी ने सिर्फ नकारात्मक मनोवृत्ति का चुनाव किया है। मनोविज्ञान के
हिसाब से देखो तो जिसके अंदर जो मनोवृत्तियाँ हावी होती हैं, वो उसी तरह सोचता, समझता
और लिखता है। बुझे कुछ’??---‘हाँ भाई बुझ गए!! और ये भी बुझ गए की शुक्ला जी ने सावित्री
त्रिपाठी पुरस्कार के बहाने बलिराज पाण्डेय का मजाक नहीं उड़ाया बल्कि गलती से अपना
ही सच कह गए—“अखबारों में छपने भर की न्यूज़ बन जाती है और अखबार एक मोहल्ले में
लेखक की छवि तो बना ही देते हैं।”(परिचय 2017, पेज 184) अब बुझे!! कि शुक्ला जी
जहाँ भी घूमने-टहलने जाते हैं, वहां आनन-फानन में एक छोटा सा कार्यक्रम क्यों रखवा
लेते हैं। इन कार्यक्रमों का साहित्य से कोई सरोकार नहीं होता। मनोविज्ञान का हिसाब
लगा कर देखें तो ऐसा लगता है कि बस अखबार में फोटू आ जाए और थोड़ा TRP बढ़ जाए।
मोहल्ले का लेखक चेले ने फेसबुक पर लिख के बना ही दिया है, अखबार में छप-छुपा के
शहर का लेखक बन ही जायेंगें। बस काम बन गया; साहित्य जाए चूल्हे में मुझे क्या? मैं
तो कूल्हे चमका के फोटू खींचवा लूँगा और अपने चेलों से कहूँगा इसे फेसबुक पर शेयर
करो और हाँ मुझे टैग करना मत भूलना’।
रामाधार के इस विश्लेष्ण पर मुझे हँसी आ रही थी। मैं अपने हँसी
को दबाते हुए बोला, ‘तुम तो लाल बुझक्कड़ हो गए भाई। ये बात तो तुम ठीक कह रहे हो,
उनके चेलों ने फेसबुक पर गंध मचा दिया है’। गुरु का ऐसे बखान करेंगें कि मानों
चारण काल लौट आया हो —‘हमरे गुरु जी ई, हमरे गुरु जी उ, हमरे गुरु जी आह, हमरे
गुरु जी वाह, हमरे गुरु जी सा रा रा रा...रा !! भाई हद हो गयी है। अरे भाई साहेब अगर
गुरु जी ने सही में साहित्य की दशा और दिशा को बदलने के लिए कुछ नया दिया हो तो
बताओ? कौन सा नया विमर्श खड़ा किये हैं गुरु जी? झूठ-मूठ के चेलवन सब गाते रहते हैं’।
रामाधार पूरी संजीदगी से बोला, ‘चेलों का क्या दोष दोगे भाई? गुरु जी खुद ही जब टाइप
करके चेले को भेजते हैं कि इसे अपने वाल से शेयर करो, तो बच्चे क्या करें?? शोध
करना है भाई!! ऐसे थोड़े हो जाएगा शोध? मैं तो प्रायः इन ससुर लोगों को देखता ही
नहीं हूँ। तुम भी इग्नोर करो’। इतना कह कर रामाधार जोर से ये कह कर हंसने लगा----हमरे
गुरु जी सा रा रा रा....रा।
हमलोग लगभग पांच मिनट तक
हँसते रहे कि तभी फ्लैट का दरवाजा भर्र से खुला। मैंने कहा, वकील साहेब आ गए। इ
ससुर को समझ में ही नहीं आता की इ दरवजवा हमारा अपना नहीं है। समझा-समझा के थक गए हैं
लेकिन इ माने तब न? नितिन आते ही हमलोगों पर बरस पड़ा ‘तुमलोग यहाँ पंचायत फाने पड़े
हो और नीचे आधे घंटे से पानी बह रहा है। सालों मोटर समय से बंद कर दिया करो, वैसे
भी दिल्ली में पानी की किल्लत है’। हमदोनों ने एक स्वर में कहा, ‘भाई गलती हो गयी’।
मैं किचन में मोटर बंद करके खाना परोसने लगा कि रामाधार उछलते हुए आया, ‘अबे संस्मरण
का अंतिम पैराग्राफ तो देखो क्या पते की बात लिखी है शुक्ला जी ने -“फिलहाल तो
अगली कथा अभी सीझ रही है।”(परिचय 2017, पेज 200 ) ससुर कथा नहीं हुआ सब्जी हो गया।
मसाला और तेल डाल कर टेस्टी भी तो बनाना होता है न। तेल और मसाला हिसाब से डालिए
गुरुदेव नहीं तो बलम परदेशी का जायका खराब हो जाएगा’। इतने में नितिन बाथरूम से
निकलते ही बोला, ‘ऐसा है तुम हिंदी वालों अब चुप हो जाओ। जहाँ देखो वहां नरक मचाये
पड़े हो। ऐसा है मुझे सुकून से जीने दो भाई और खाना लाओ बे’। हमलोग चुपचाप खाना
खाने बैठ गए, थाली में खाना परोसा गया। पहला निवाला लेते ही रामाधार ने कहा, ‘अबे सब्जी
कम सीझा है। रामाधार के इतना कहते ही हमदोनों ठहाका लगा कर हँस पड़े। वकील साहेब भी
बिना कुछ समझे ही हँस पड़े। बीच में रामाधार फिर से कह उठा----हमरे गुरु जी सा रा
रा रा....रा-----
नोट:-श्री प्रकाश शुक्ल सर से विनम्र अनुरोध है कि आप इसे परिचय के अगले अंक में छापे और मैंने जिन जिन बिंदुओं पर चर्चा की है उसका प्रतिउत्तर, स्पष्टीकरण भी दें! बहुत संभव है मेरा ये लेख दो कौड़ी का लगे। लेकिन मुझे उम्मीद है आप इतना जरुर करेंगें!
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लिखने के क़ाबिल तो हरगिज़ थी न यह मज़मून इत्तिफ़ाक़न इस तरफ़ अपना भी आना हो गया
ReplyDeleteबिलकुल सर!!
Deleteबहुत खूब...
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteबढिया....
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteमाने कह के ले लिये हो ,वाह रे सही में तू विद्रोही हो।
ReplyDeleteमेरी दुआ तुम्हरे साथे रहेगी भाई !!!महादेव
हाहा
Deleteपूरा बोया हुआ चरस काट रहे ,तनिक बच के..महादेव
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