“संस्कृति के
महारथियों”, आप किनके साथ हैं?
और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त
लिखना
रह गया काम हमारा ही
बग़ावत लिखना
(हबीब जालिब)
हम एक विद्रूप होते समय
को उसकी तमाम विसंगतियों के साथ ढोते जा रहे हैं।
हम एक ऐसे समय और
समाज से होकर गुजर रहे हैं, जहाँ इन विसंगतियों पर बंद कमरे में या चाय पर चर्चा खूब
जमती है। दोस्तों के साथ ड्राइंग रूम में बैठकर खूब लम्बे-लम्बे
भाषण हांके जाते हैं, ऐसा लगता है मानों ये समस्याएँ अगली सुबह खत्म हो जाएंगी। लेकिन ज्यों ही हम इन सारे
मुद्दों को प्रकाश में लाते हैं, ऐसा क्यों होता है कि ये सारी बातें ‘ओछी हरकत’
लगने लगती हैं? ऐसा क्यों होता है कि ये सारी बातें एक तबके को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ लगने
लगती हैं? जब भी आप इन मुद्दों को गंभीरता से उठाते हैं, ऐसा क्यों होता है कि हम
यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि-“ग़ैर मुमकिन है कि हालात की गुत्थी सुलझे/अहले
दानिश ने बहुत सोच के उलझाया है?” जब भी आप इस विषय को वर्तमान के पन्नो में अंकित
करना चाहते हैं, इस विषय पर खुली बहस करना चाहते हैं; आपके कर्ण पटल पर कंपन होने
लगता है। एक चीख मिश्रित अनुमोदन बार बार सुनाई देता है-सिस्टम से लड़ कर किधर जाओगे?
कभी जीत नहीं पाओगे? सत्ता के कई टूल्स होते हैं, क्यों अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार
रहे हो? तब ऐसा लगता है की नामवर सिंह ने ठीक ही कहा है ‘बोलने से ज़ुबान नहीं कटती
लेकिन लिखने से हाथ कट जाता है’। इसलिए ऐसे समय में या तो
सिर्फ चीखें या फ़िर मंच पर लम्बे लम्बे आदर्शवादी भाषण दें, लिखें तो बहुत सोच समझकर
लिखें। अपने लिए हमेशा एक सॉफ्ट कार्नर रखते हुए लिखें। फिर भी मैं लिखना चाह रहा
हूँ क्योंकि बीच का रास्ता नहीं होता साथी! साथियों मैं लिखना चाह रहा हूँ उन सारे
मुद्दों पर जिनसे हम आए दिन जूझ रहे हैं।
भारत के विश्वविद्यालयों
में शोध की स्थिति पर क्षोभ और निराशा का स्वर सुनने को मिलता ही रहता है। अध्यापक कक्षा से लेकर सेमिनार तक नौजवानों को
कठघरे में खड़ा करते हुए शोध की स्थिति पर कुछ इस प्रकार की टिप्पणी करते हैं- ‘आजकल
शोध-ग्रंथ के नाम पर सिर्फ कूड़ा जमा हो रहा है, अधिकांश बच्चे शोध के नाम पर कट-कॉपी-पेस्ट
ही करते है’। यह बात बहुत हद तक ठीक
भी है कि भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में शोध की स्थिति बेहद ही चिंताजनक है,
लेकिन मुझे कतई नहीं लगता कि शोध में आई मुसलसल गिरावट का जिम्मेदार हमारा नौजवान
है। इस तरह की टिप्पणी से हम और कुछ नहीं, सिर्फ़ और सिर्फ़ नौजवानों की ताकत को कम
करके आंकते हैं; जबकि नौजवानी की ताकत को पहाड़ी नदी की शक्ति के समान माना गया है।
जरुरत है एक सही दिशा-निर्देशन की,जरुरत है उस पहाड़ी नदी की शक्तिशाली धारा की
ताकत को बिजली की ताकत में रूपांतरित करने की। हमारा आकादमिक जगत एक प्रकार का
बिजलीघर ही है, जिसमें दशकों से वैज्ञानिक अनुसंधानकर्त्ताओं की टीम द्वारा
देश-निर्माण और मानव-निर्माण के कार्य को नई ऊँचाई प्रदान की जाती रही है।
हम
जानते हैं कि आकादमिक जगत में डिग्री प्राप्त हेतु किया गया किसी भी प्रकार का शोध
या अनुसंधान कोई भी शोधार्थी अकेला नहीं करता, शोधार्थी को किसी भी विषय पर
अनुसंधान करने के लिए उस विषय के विशेषज्ञ की जरुरत होती है। बिना विशेषज्ञ के वह
भटक सकता है, इसलिए उसके मार्गदर्शन के लिए एक शोध निर्देशक होते हैं; जो शोधार्थी
का हाथ पकड़ कर साथ-साथ चलते हैं और समय-समय
पर शोधार्थी को राह की कठिनाइयों से अवगत कराते रहते हैं। अनुसंधान के दौरान छात्र
घुटने फोड़ने वाली ठोकरों से बच निकलने और उससे पेंच लगाने की कला शोध निर्देशक
अर्थात संबंधित विषय के विशेषज्ञ की सोहबत में ही सीखता है। लेकिन आजकल प्रायः यह
देखा जा रहा है कि छात्र डिग्री पाने और अध्यापक यश पाने की होड़ में विशेषज्ञता को
अनदेखा कर रहे हैं। आज के आकादमिक जगत में ‘ज्ञान की गंगा’ उलटी बहती जा रही है, जिसमें
बच्चे जाने-अनजाने पूरे मनोयोग से हाथ धोते जा रहे हैं। अक्सर देखने को मिलता है
कि एक अध्यापक एक साथ एक समय में कई अलग अलग विषयों पर अलग अलग बच्चों से शोध करवा
रहे होते हैं, मानों इन तमाम विषयों पर उन्होंने विशेषज्ञता हासिल कर ली हो। एक ही
अध्यापक मध्यकाल पर और आधुनिकता पर एक साथ शोध करवा रहे होते हैं, हद तो तब होती
है जब वो नाटक और काव्यशास्त्र पर भी उसी विशेषज्ञता से अपनी राय रखते हैं। मेरे
कहने का आशय यह है कि शोध और अनुसंधान जिस गहन अध्ययन की मांग करता है, वह गहन
अध्ययन और गंभीरता इस तरह के चलताऊ शोध में संभव नहीं है। कायदे से देखें तो शोध
या अनुसंधान देश-निर्माण और मानव-निर्माण के लिए किया जाने वाला सामूहिक प्रयास है,
जिसमें शोधार्थियों का एक जत्था (संख्या5 से 6 हो) एक विशेषज्ञ अध्यापक के साथ
मिलकर (अकेले नहीं) किसी एक विषय पर गंभीरता से अध्ययन करता है और ठोस निष्कर्ष पर
पहुंचता है। इस तरह के गंभीर अध्ययन से देश और समाज को हमेशा फायदा मिलता रहा है,
लेकिन इस तरह का अध्ययन आजकल देखने को कम मिलता है; बिरले ही अध्यापक ऐसे होते हैं
जो शोधार्थियों की टोली बनाते हैं और‘सामूहिक ज्ञानकांड’ में विश्वास रखते हैं। चूँकि
इस सामूहिक ज्ञानकांड का मुख्य हवनकर्त्ता अध्यापक ही होता है तो फिर यह कहना कहाँ
तक उचित होगा कि शोध में आयी मुसलसल गिरावट के पीछे शोध छात्र जिम्मेदार है। तब
मौके-बेमौके ‘वरिष्ठ वैज्ञानिक अनुसंधानकर्त्ता’(अध्यापक) द्वारा की जाने वाली
उपरोक्त टिप्पणी मध्यवर्ग के मक्कार किस्म का पश्चाताप भर लगता है। ऐसा लगता है
मानों अपनी नाकामयाबी का ठीकरा कहीं और फोड़ा जा रहा है। भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली
में शोध या अनुसंधान की प्रक्रिया और प्रविधि में कई स्तरों पर बदलाव की जरुरत है।
जहाँ
तक ‘कट-कॉपी-पेस्ट’वाला मसला है, इसके लिए एक मजबूत निगरानी तंत्र बनाने की जरुरत
है। वैसे जहाँ तक मेरी जानकारी है केंद्रीय विश्वविद्यालय स्तर पर इस तरह का
निगरानी तंत्र काम कर रहा है,लेकिन इसकी अपनी ‘व्यवहारिक कमियाँ’ हैं;जिस कारण
दोयम दर्जे का शोध-ग्रंथ भी बहुत आसानी से पास कर दिया जाता है। दोयम दर्जे के शोध-ग्रंथ
का पास होना ही अपने आप में बड़ा सवाल है। जब मैं ‘व्यवहारिक कमियाँ’ शब्द लिख रहा
हूँ तो मुझे एक प्रसंग याद आता है। वाकया है एक अध्यापक द्वारा शोधार्थी को
मोटिवेट करने का। शोध-ग्रंथ लिखने की निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने जा रही थी,
इस कारण शोधार्थी काफी परेशान था। ‘सर मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है क्या करूँ?’ अध्यापक
महोदय बेहद शांत स्वभाव के थे, उन्होंने सहजता से कहा- ‘अब वो समय गया जब लोग
मुक्ति पाने के उदेश्य से विद्या ग्रहण करते थे (सा विद्या या विमुक्तये),आज के समय
में विद्या नियुक्ति पाने के लिए ग्रहण करो; ‘सा विद्याया नियुक्तये’ अर्थात् विद्या
वही जो नियुक्ति दिला सके। इसलिए हे वत्स! देखो तुम्हारे पास पूरे एक साल का समय
है, घबराने की कोई बात नहीं है। जल्दी से कुछ भी लिख के जमा करो, फलां सेंट्रल
यूनिवर्सिटी में पोस्ट आने वाला है और वहां के फलां बाबू मेरे करीबी हैं।’ इस तरह
की ‘व्यवहारिक कमियाँ’ पूरे के पूरे शोधतंत्र को कमजोर करती हैं। इन‘व्यवहारिक कमियों’
के पीछे दो कारण स्पष्ट रूप से दिखाई देते
हैं; सवर्प्रथम तो ये कि प्रायः छात्र और अध्यापक को यह प्रतीत ही नहीं होता कि
उनकी अपनी उन्नति का कार्य सामाजिक उन्नति का कार्य है। उन्हें कभी महसूस ही नहीं
होता कि उनका कार्य सामाजिक कर्तव्य भी है जिसके ना करने से जनता की हानि होगी और
जिसको सुचारू रूप से करने से जनता का कल्याण और सामाजिक विकास होगा। इसके लिए
भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था के नीति-नियंताओं को एक ऐसा मजबूत कदम उठाना चाहिए जिससे
छात्रों को हमेशा यह प्रतीत होता रहे कि सामाजिक ढांचे के अंतर्गत उसकी उपेक्षा
नहीं की जा रही और ना ही की जा सकती है।
लेकिन
यहाँ तो आलम ये है कि प्रायःबच्चे शोध के दौरान अपनी ऊर्जा और चेतना का समुचित
प्रयोग ही नहीं कर पाते हैं। उनकी ऊर्जा का अधिकांश हिस्सा किन्हीं ‘अन्य कामों’
में बंटा होता है, इस कारण बच्चे अपने शोध विषय पर ठीक से मेहनत नहीं कर पाते। इस
बात पर चुटकी लेते हुए अपनी विशिष्ट शैली और विशिष्ट अंदाज़ के लिए प्रसिद्ध हिंदी
के एक वरिष्ठ आलोचक ने ‘रीतिकाल:मिथक और यथार्थ’ विषय पर बोलते हुए मजाकिया अंदाज़
में एक टिप्पणी की थी। टिप्पणी कुछ इस प्रकार है-“आजकल लड़के-लडकियां रिसर्च के नाम
पर यात्रा कहाँ से कहाँ तक करते हैं,‘एकहॉस्टल से दूसरे हॉस्टल तक’। मने, लड़के लड़कियों
के हॉस्टल तक और लडकियां लड़कों के हॉस्टल तक, बस।” नहीं जनाब! आपने ‘फील्ड वर्क’ के
दायरे को एकदम से संकुचित कर दिया है। रिसर्च के दौरान ‘फ़ील्ड वर्क’ का अपना विशेष
महत्व है। ‘फील्ड वर्क’ मने शोध निर्देशक के तमाम घरेलू
एवं बाहरी कार्यों को संपादित करना। घर के
राशन-पानी से लेकर बच्चे की फीस जमा करना, बिजली बिल जमा करने से लेकर परिवार के
सदस्यों और घर के अतिथियों के आतिथ्य का जिम्मा बहुधा शोध छात्र पर ही होता है। कई
बार तो उन्हें (छात्र और छात्राओं को) पाक-कला की परीक्षा से भी गुजरना होता है। “परंपरा-संस्कार
की अलगनी पर टंगा शिक्षक का लबादा दरअसल इतना भव्य, दिव्य और श्रद्धास्पद है कि
उसकी ओट में कुछ भी कर गुजरना संभव है। आप गांव के प्राइमरी स्कूल में हैं तो
छात्रों से पाँव दबवा सकते हैं। साइकिल पोछवा सकते हैं। उनसे कटहल,दही, गन्ना से
लेकर दातून तक मंगा सकते हैं। वे ज्यादा शोर करें तो पेट उमेठने से लेकर नरम
उँगलियों में लकड़ियाँ फंसा कर अनुशासन उर्फ यातना के जितने अनुसंधानित तरीके हैं, इस्तेमाल
कर सकते हैं। क्योंकि आप उनका भविष्य
बना रहे हैं। अगर विश्वविद्यालय में हैं तो आप अपने शोध छात्रों से यही करा सकते
हैं। पीटने की इच्छा पूरी नहीं कर सकते, हाँ उनके शरीरों के अन्य सौजन्यपूर्ण
उपयोग संभव हैं।”(आचार्य की कराह:-अनिल यादव, दैनिक जागरण, 19 फरवरी 2006)
जी
हाँ! शोध के दौरान शोधार्थी के शरीर का सौजन्यपूर्ण उपयोग संभव है। एक अध्यापक
महोदय ने तो हद ही कर दिया, उन्होंने अपने अर्धांगनी के आग्रह पर शोध छात्र द्वारा
मिर्च और मसाले के साथ कड़कती हुई धूप में फड़कता हुआ बृहत् शोध प्रबंध तैयार करवा दिया।
तब हे वरिष्ठ आलोचक महोदय! आपका इस तरह से मजाकिया लहजे में चुटकी लेना मुझे
नागवार गुजरा। आप ही बाताएं मिर्च का अचार बनाते हुए बच्चे और बच्चियां, ‘फील्ड
वर्क’ की धकापेल जीवन शैली को जी रहे छात्र और छात्राएं जब कड़कती धूप में माथे का पसीना
पोंछते हुए सुस्ता रहे होंगें तब क्या सोच पाते होंगें अपने संबंधित विषय पर? क्या
इस भागमभाग वाली जीवन शैली में शोध से संबंधित नए विचार आते होंगें? जिस समय शोध
में नए विचारों को पकने के लिए मद्धिम आंच की जरुरत होती है, ठीक उसी समय हमारी
उच्च शिक्षा व्यवस्था का शोध छात्र तेज बारिश में अपनी नियति पर रो रहा होता है। बारिश
के थमने से पहले ही आंसू पोंछते हुए वह शोध छात्र अपनी नियति को स्वीकार करता है।
या तो वह छात्र पलायनवादी रुख अख्तियार करते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं में अपना
कैरियर ढूंढने लगता है या फिर स्थिति की नज़ाकत और व्यवस्था के शक्ति संतुलन को
समझते हुए अपनी बुद्धिमानी का परिचय देता है और अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए समझौता
करता है। मुक्तिबोध ने ठीक ही कहा है कि-‘उम्र बढ़ने के साथ आदमी समझौते को
बुद्धिमानी और प्रतिभा का नाम देता है।’
मैं
जहाँ से देख रहा हूँ और जहाँ तक देख पा रहा हूँ, ऐसा लग रहा है कि इन दिनों भारतीय
उच्च शिक्षा व्यवस्था का आकादमिक जगत निरंकुश होता जा रहा है। जिस समय मैं यह लेख
लिख रहा हूँ ठीक उसी समय IIMC (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन) नई दिल्ली
के छात्र रोहिन वर्मा को सोशल मीडिया पर अपनी बात रखने के लिए निलंबित कर दिया
जाता है। आजकल ‘स्क्रीन शॉट’ दिखाकर सत्ता के करीब जाने का और सत्ता की दलाली का
एक नया ट्रेंड चला है। रोहिन के केस में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। दरअसल रोहिन IIMC में
रोहिन कुमार के नाम से पंजीकृत हैं, जबकि उन्हें निलंबन नोटिस रोहिन वर्मा (सोशल
मीडिया पर दर्ज) के नाम से मिला है। इसी तरह का प्रकरण काशी हिंदू विश्वविद्यालय
में कई बार देखने और सुनने को मिला है। बच्चे को नोटिस उसके फेसबुक पर दर्ज नाम से
मिलती है। इससे साफ जाहिर होता है कि संस्थान ने या तो फेसबुक और तमाम सोशल साइट्स
पर निगरानी तंत्र बैठा रखा है (भले ही शोध में कट-कॉपी-पेस्ट की निगरानी इनसे संभव
ना हो) या कोई स्क्रीन-शॉट गैंग है जो आपकी बात को प्रशासन तक पंहुचा रहा है। इस बीच
इस तरह के गैंग काफी सक्रिय हुए हैं,जब आप कभी यूनिवर्सिटी या यूनिवर्सिटी प्रशासन
की आलोचना करेंगें तब इनके सदस्य आपको नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए गाली दे सकते हैं;
बात अगर आगे बढ़ी तो मारने-पीटने की धमकी भी मिल सकती है। ठीक इसी तरह कुछ वर्ष
पहले महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुछ बच्चों को
अपने साथियों की निजी बातों को रिकॉर्ड करने और उसे कुलपति महोदय तक पहुंचाने का ‘छूत’
लगा था। तब ऐसे माहौल में किस तरह के शोध की अपेक्षा की जा सकती है। अगर
अभिव्यक्ति और असहमति की आज़ादी ही नहीं रहेगी तो कोई भी संस्थान परीक्षा लेने और
डिग्री बांटने की दुकान भर बन कर रह जाएगा।
सिखाने
को तो यही संस्थान हमें सिखाता है कि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना और आलोचनात्मक रुख़
अख्तियार करना आधुनिक भावबोध है लेकिन आप ज्यों ही संस्थान की आलोचना करते हैं, आपको
हाशिये पर धकेल दिया जाता है। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,
वर्धा में संस्थान की किसी भी तरह की आलोचना करने पर बच्चों को कारण बताओ नोटिस
मिलता है और ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की नीति का अनुसरण करते हुए बच्चों पर कारवाई भी होती
है। कुछ साल पहले वहां के एक मेधावी छात्र को एम.फिल के दौरान बस इसलिए निलंबित कर
दिया गया कि उसने प्रशासन के भ्रष्ट पदाधिकारियों को नंगा देख लिया था। साम-दाम-दंड-भेद
वाली नीति से हैदराबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया याद आयी, किस तरह से
वहां के आध्यापकों और पदाधिकारियों ने मिलकर रोहित वेमुला के आंदोलन में शरीक सारे
बच्चों को पहले चिन्हित किया और उसके बाद विश्वविद्यालय से निकाल बाहर फेंका।
आंदोलन में शरीक बच्चों ने अगर लिखित परीक्षा में अच्छे अंक हासिल किये तो
इंटरव्यू में उन्हें ‘संस्कृति के उन तमाम महारथियों’ ने जानबूझ कर इतना कम अंक
दिया कि वो दौड़ में शामिल ही नहीं हो सकें। तब मुझे याद आते हैं ख़ामोश आलिमो फाज़िल
और आकादमिक जगत के वो शहरी मार्क्सवादी, जिन्होनें पक्षधरता की कीमत नहीं चुकाई।
और
तब मुझे प्रतीत हुआ भयानक
गहन
मृतात्माएं इसी नगर की
हर
रात जुलूस में चलतीं,
परन्तु
दिन में
बैठती
हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र
विभिन्न
दफ्तरों, कार्यालयों, केन्द्रों में, घरों में।
हाय,
हाय! मैंने उन्हें देख लिया नंगा
इसकी
मुझे और सज़ा मिलेगी।
(अँधेरे
में-मुक्तिबोध)
प्रायःहम
देखते हैं कि साक्षात्कार(इंटरव्यू) में हो रहे भेदभाव पर बच्चे दबी ज़ुबान से अपना
गुस्सा भी जाहिर करते हैं, लेकिन कभी मुखर नहीं होते। क्या करें उनकी भी मज़बूरी है,
उन्हें सबसे व्यवहार बना कर या यूँ कहें खुद को बचा कर रखना होता है। क्योंकि
अक्सर दोस्त और माँ-बाप समझाते हैं कि व्यवहारिक बनो’ दुनिया का यही दस्तूर है;
आदर्शवाद के चक्कर में प्रशासन से उलझना मत वरना विश्वविद्यालय में दाखिला तो नहीं
ही मिलेगा। अगर किसी तरह दाखिला मिल भी गया तो बहुत संभव है, वे कोई फर्जी मामला
लाद कर तुम्हें विश्वविद्यालय से निकाल भी सकते हैं। वाकई अगर आप किसी बात को साफगोई
और बेबाकी से कहने के हिमायती हैं तो जरा संभल कर, आपकी जीभ कट सकती है; यह तंत्र
आपको गूंगा बना सकता है। पिछले दिनों जे.एन.यू में ऐसा ही हुआ। कुछ बच्चे जब
साक्षात्कार में हो रही अनियमितता को लेकर इंटरव्यू के अंक को कम करने पर अड़े, तो जे.एन.यू
प्रशासन ने ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की नीति का सहारा लेकर 9 बच्चों को एक साथ निलंबित
कर दिया। साथ ही प्रशासन ने प्रवेश-प्रक्रिया में इंटरव्यू की हिस्सेदारी 30
प्रतिशत से बढ़ा कर 100 प्रतिशत कर दिया, वो भी तब जब इसी विश्वविद्यालय द्वारा
गठित ‘नाफे कमेटी’ की रिपोर्ट यह बता चुकी थी कि इंटरव्यू में अध्यापक जातिगत
भेदभाव करते हैं। तब मुझे रोहित वेमुला का वो ख़त याद आता है, जो उसने आत्महत्या के
ठीक एक महीना पहले 18 दिसंबर 2015 को हैदराबाद विश्वविद्यालय के
कुलपति को विश्वविद्यालय में हो रहे जातिगत भेदभाव पर क्षोभ व्यक्त करते हुए लिखा
था-“आपके सामने तो डोनाल्ड ट्रम्प भी लिलिपुट साबित होंगे। आपकी प्रतिबद्धता को
देखते हुए मैं आपको दो सुझाव देना चाहूँगा, एकदम घिसा पिटा सा। प्लीज़ जब दलित
छात्रों का एडमिशन हो रहा हो तब ही सभी छात्रों को 10 मिलीग्राम सोडियम अजाइड दे
दिया जाए। इस चेतावनी के साथ कि जब भी उनको अम्बेडकर को पढने का मन करें तो ये खा
लें। सभी दलित छात्रों के कमरे में एक अच्छी रस्सी की व्यवस्था कराएं।...इसलिए
आपसे निवेदन करता हूँ कि हमारे जैसे छात्रों के लिए यूथनेशिया (इच्छा-मृत्यु) की
सुविधा उपलब्ध कराएँ।” रोहित ने ठीक एक महीने बाद आत्महत्या कर ली। उसके सुसाइड
नोट का ये वाक्य आप देख सकते हैं जिसमें वह कह रहा है-“मेरा जन्म ही एक भयंकर
दुर्घटना थी”। यह वाक्य किसी भी सामान्य मस्तिष्क को सोचने पर मजबूर कर सकता है।
विश्वविद्यालय
प्रशासन अपनी स्वायत्तता का हवाला देकर इस तरह की मनमानी इरादतन करता रहता है।
इंटरव्यू में किसी तरह का भेदभाव मेधा के साथ छल है। नियुक्ति या प्रवेश के दौरान
किया गया किसी भी प्रकार का भेदभाव बच्चों को ‘सुसायडल कंडीशन’(आत्महनन) की ओर ले
जाता है। इस भेदभाव को रोकने के लिए एक ईमानदार कदम उठाये जाने की जरुरत है। इस
बाबत बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय ने सराहनीय कदम उठाया है। सत्ता में बैठा
प्रशासक जब तक कोई ईमानदार पहल नहीं करता तब तक आकादमिक जगत में चहुँओर अँधेरा ही
रहेगा। कायदे से तो प्रवेश से लेकर नियुक्ति तक की सम्पूर्ण प्रक्रिया पारदर्शी
होनी चाहिए। संभव हो तो इंटरव्यू की वीडियो रिकॉर्डिंग होनी चाहिए। मेरी जानकारी
में हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुछ विभागों में 2015-16 के सत्र में इंटरव्यू के
दौरान गोपनीय रूप से वीडियो रिकॉर्डिंग भी करवायी गयी (लेकिन 2016-17 के सत्र में ही
रिकॉर्डिंग की सुविधा हो हटा लिया गया, इसके पीछे की मंशा क्या होगी?)। बहुत संभव
है मेरी जानकारी अधूरी भी हो सकती है लेकिन इस तरह की कोई भी पहल काबिले-तारीफ़ है।
भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था के ऊपरी पायदान पर बैठे प्रशासकों को इसे संज्ञान में
लेना चाहिए।
वैसे
हम जानते हैं कि आकादमिक परीक्षाओं और नियुक्तियों में यूजीसी (विश्वविद्यालय
अनुदान आयोग) के निर्देश के अनुसार इंटरव्यू का अंक ही बच्चों
के भविष्य का निर्धारण करता है। आकादमिक जगत में प्रवेश से लेकर नियुक्ति तक
इंटरव्यू की निर्णायक भूमिका होती है। इस प्रक्रिया में जाति, धर्म, वर्ण, लिंग के
बाद फलां बाबू के चहेते और चिलां बाबू के रिश्तेदारों को वरीयता दी जाती है। इसलिए
फलां बाबू के चहेते बनने और चिलां बाबू से रिश्तेदारी खोजने की एक लम्बी प्रक्रिया
भी अंततः हमारे शोध का एक हिस्सा ही होती है। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि चहेते
बनने और कुर्सी के करीब आने के लिए बच्चे किसी भी हद से गुजर सकते हैं। चूँकि
गुजरते वक्त के साथ गाल बजाना और राग दरबारी गाना अब पुराना नुस्खा हो गया है, इसलिए
बच्चे नए-नए नुस्खों की तलाश में रहते हैं। इन दिनों ऐसी हवा चली है कि बच्चे अपना
कद ऊँचा करने के बजाय अपने प्रतिद्वंद्वी का कद छोटा करने की जुगत में लग जाते
हैं। बकौल गोरख पाण्डेय-“उसकी नजर कुर्सी पर लगी थी/कुर्सी लग गयी थी/उसकी नजर को”
। कुर्सी के करीब जाने के लिए बच्चा कई तरह की तिकड़मी विद्याओं (स्क्रीन शॉट,
चापलूसी आदि) का सहारा लेता है क्योंकि इस दौर के हर समझदार अध्यापक ने अपने प्रिय
बच्चों को सिखा रखा है कि ‘विद्या वही जो नियुक्ति दिला सके अर्थात् सा विद्या या
नियुक्तये’। भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था में अक्सर प्रतिभावान बच्चे या तो छले
जाते हैं या फिर हवा के रुख को पढ़ते हुए सबसे पहले अपने जमीर की हत्या करते हैं और
फिर रीढ़ झुका देते हैं (एक पत्रिका/इसी पत्रिका के संपादक ने हम बच्चों को रीढ़-विहीन
कहा है)। हमारी उच्च शिक्षा रीढ़-विहीन पीढ़ी को जन्म दे रही है। मैं इस रीढ़-विहीन
पीढ़ी के लिए परिपक्व हो रहे भ्रूण को कतई दोष नहीं दूंगा, दोष तो उस वीर्य और रगों
में दौड़ते खून का है जिसमें मक्कारी के सारे गुणसूत्र पहले से मौजूद हैं।
पिछले
दिनों मैंने कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों के शोध प्रवेश प्रक्रिया को करीब से
देखा। मैंने देखा है कि वर्ण,जाति, लिंग, क्षेत्र आदि किस तरह से आपकी प्रतिभा को बायपास
करते हैं। कई बार ऐसा देखा जाता है कि आपकी पहचान आपकी प्रतिभा से ना होकर आपकी
जाति से होने लगती है, यहाँ तक कि आपका मूल्यांकन भी आपकी वर्ण, जाति, लिंग,
क्षेत्र आदि के आधार पर होता है। इन सब के बाद सबसे जरुरी है आपका व्यक्तिगत संबंध।
भले ही आप एक अच्छे स्कॉलर ही क्यों न हो, आपकी हर सफलता और असफलता प्रायः आपके
व्यक्तिगत संबंधों और सिफारिशों पर निर्भर करती है। बिना अच्छे संबंध के प्रवेश या
नियुक्ति पाना टेढ़ी खीर है। सिफारिश की महिमा पर एक मजेदार वाकया याद आता है। काशी
हिन्दू विश्वविद्यालय में एक छात्रा का इंटरव्यू चल रहा था, वो छात्रा इंटरव्यू
पैनल में बैठे अध्यापकों के सवालों का मुफीद जवाब नहीं दे पा रही थी। इतने में
पैनल के एक अध्यापक ने पैनल में बैठे हुए अपने साथियों से पूछ लिया कि इसकी कहाँ
से ‘सिफारिश’ है? सारे अध्यापक एक दूसरे को देख ही रहे थे कि तभी एक वरिष्ठ अध्यापक
ने खिखियाते हुए कहा- “भाई साहब ‘सौंदर्य’ भी अपने आप में सिफारिश ही है”। जिस दौर
में एक साथ कई अध्यापक खिखियाते हुए देखे जाते हैं, उसी दौर में मैं श्लोक शर्मा की
सामानांतर धारा की एक फ़िल्म ‘हरामखोर’ देख रहा होता हूँ। मैं देख रहा हूँ कि श्याम
सर जैसा अध्यापक किस तरह संध्या जैसी लड़की के इमोशन और बचपने के खेलकर अपनी सेक्स
की खुजलाहट को मिटाता है। ठीक उसी तरह नियुक्ति का लालच देकर या फिर कैरियर बर्बाद
करने की धमकी देकर स्त्री विमर्श पर विचारोत्तेजक लेख लिखने वाले तमाम अध्यापक
अपनी देह की ना खत्म होने वाली भूख को मिटाने की कोशिश करते हैं। इस तरह के हज़ारों
केस देश के विभन्न पुलिस थानों और विश्वविद्यालय के वीमेन सेल की फाइलों में दबी हुई
हैं। तब मैं कहूँगा जी जनाब! आपने बिलकुल सही कहा, आपके खिखियाने से इस आकादमिक
जगत में जिस तरह सौंदर्य की सिफारिश हो जाया करती है ठीक उसी तरह जाति को सूचित
करने वाला उपनाम भी कई बार प्रवेश से लेकर नियुक्ति तक चाहे अनचाहे सिफरिश का काम
करता है।
चाहे-अनचाहे
शब्द से आप अचकचा सकते हैं, लेकिन सच्चाई का एक पहलू ये भी है। मेरे एक अग्रज हैं,
जो इन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित छात्रावास के अन्तःवासी हैं।
इनके ‘सिंह’ सरनेम को देखकर छात्रावास के सारे श्रीमंत और सामंतों को लगा कि साहब क्षत्रिय
कुलोद्भव हैं, फिर क्या था सिंह साहब की आवभगत शुरू हुई। साहब भी मुफ्त में मिले
सम्मान को खोना नहीं चाहते थे, उन्होंने भी मन बना लिया कि अगर कोई पूछेगा तब तो ठीक
ठीक बता दूंगा वरना कौन मुफ्त में मिले सम्मान को खोये। एक दिन राज खुल गया, सारे
श्रीमंतों और सामंतों को छूत लग गया; आनन फानन में छात्रावास में झंडेवालान के
पुरोहित की देख-रेख में जाति-शुद्धि यज्ञ का आयोजन हुआ। दरअसल भारतीय जाति व्यवस्था
में घर कर गयी विसंगतियों ने एक भ्रम की स्थिति पैदा की है। छात्र तो छात्र, इन
मामलों में फूंक-फूंक कर कदम रखने वाले ‘तथाकथित सवर्ण प्रगतिशील अध्यापक’ को भी
धोखा खाते हुए हमने देखा है। हुआ यूँ कि एक अध्यापक महोदय शोध छात्र चयन के दौरान सरनेम
के मोहजाल में फँस कर गच्चा खा गए। जब तक पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आध्यापक
की इस गलती का खामियाजा भी अंततः बच्चे को ही भुगतना पड़ा। शोध के दौरान आपको हज़ारों
की संख्या में ऐसे बच्चे मिल जायेगें, जिनकी व्यथा-कथा सुनकर भारतीय समाज व्यवस्था
और जाति व्यवस्था के साथ-साथ आकादमिक जगत की सिफारिशी प्रक्रिया पर एक मुक्त शोध किया जा सकता है।
जिनके
पास कोई सिफारिश नहीं होती, वो अपने रीढ़ से निकले हुए उस द्रव्य पर भरोसा करते हैं
जो संबंधित अधिकारी को शांति और संतुष्टि प्रदान कर सके। ये बच्चे पीएचडी में
प्रवेश पाने के लिए स्नातक और परास्नातक से ही अपने संबंध बनाने में जुट जाते हैं,
क्योंकि इन्हें पता होता है कि बिना संबंध के प्रवेश पाना बेहद ही मुश्किल काम है।
इन्हीं कारणों के चलते अमूमन ये देखने को मिलता है कि विश्वविद्यालयों के शोध
छात्र प्रायः वही होते हैं जिन्होंने वहां से स्नातक या परास्नातक की डिग्री ली हो।
इस संदर्भ में मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का जिक्र करना चाहूँगा।
पिछले 4-5 सालों में मैंने देखा है कि यहाँ अधिकांश बच्चे विभाग से ही संबंधित होते
हैं, एकाध अपवाद हो सकते हैं जिनका लिंक बहुत तगड़ा होता है। गौरतलब है कि इस विभाग
में हर साल कुल 500 अभ्यर्थियों में से कम से कम 250 अभ्यर्थी देश के अन्य हिस्सों
से किस्मत आजमाने आते हैं। तब सवाल उठता है कि क्या भारत के तमाम ‘काशी प्रांत’
में सिर्फ काशी के पंडित ही मान्य होंगें? मैंने बहुत करीब से देखा है इस व्यवस्था
के मारे उन छात्रों को, जो प्रवेश पाने के लिए पढ़ने की बजाय महीनों विभाग के
इर्द-गिर्द चप्पल घिसते हैं। मैंने उन छात्रों को भी देखा है जो नियुक्ति पाने के
लिए मठाधीशों के कार्यालयों से लेकर मंत्रालयों तक की यात्रा बिना थके हुए करते
हैं। बातचीत के दौरान ये छात्र हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार उदय प्रकाश के उस कथन की
ओर इशारा करते हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि-‘हिंदी विभाग में शोध-प्रवेश से लेकर
नियुक्ति तक तमाम योग्यताओं के बावजूद आपको विशेष योग्यता की जरुरत होती है’। ये
विशेष योग्यता आपकी जाति हो सकती है, क्षेत्र हो सकता है, धर्म हो सकता है या फिर
आपकी रीढ़ से निकला हुआ वो द्रव्य। पूर्वांचल के कुछ विश्वविद्यालयों में देखा जाता
है कि अध्यापक प्रायःशोध-छात्र चयन के दौरान दो तरह के बच्चों को ज्यादा तवज्जों
देते हैं। पहली कोटि में वे छात्र आते हैं जो टेबल वर्क में दक्ष होते हैं, जो समय
की मांग के हिसाब से बेहद सफल साहित्यिक-संजाल खड़ा कर सकें। इन छात्रों के पास
आकादमिक योग्यता के अलावा टाइपिंग में दक्षता के साथ-साथ एक अच्छी साहित्यिक समझ
जरुरी होती है, क्योंकि मौके-बेमौके इन्हें अपने शोध निर्देशक के अध्ययन-अध्यापन
से संबंधित कार्य को भी देखना होता है; भले ही इनका अपना शोध-कार्य अधर में क्यों
न लटका हो। इन छात्रों की मदद से अध्यापक अक्सर साहित्यिक प्रोपेगेंडा भी रचते हैं,
जिससे दरबारी आलोचना और दरबारी शोध का जन्म होता है। भले ही ये लोग अपने लेखन में
ताउम्र दरबार का विरोध करते रहे हों लेकिन अंततः साहित्य का दरबार ही सजाते हैं,
जिसमें सिर्फ और सिर्फ गीत गाया जाता है। बकौल मैनेजर पाण्डेय-‘जो लोग जीवन और
साहित्य में सुविधा चाहते हैं वो दुविधा की भाषा में अपनी बात रखते हैं, मने ये भी
ठीक है, वो भी ठीक है, सबकुछ ठीक है।’ ये छात्र अपनी मेधा का उपयोग गलत दिशा में
करते हैं या यूँ कहूँ कि इनसे इनकी मेधा का गलत दिशा में उपयोग करवाया जाता है। यह
बात जब मैं लिख रहा हूँ तो उस समय मेरे जेहन में वो सारी बातें हैं जिसके तहत
आकादमिक लड़ाई में बच्चों को टूल्स की तरह प्रयोग किया जाता है। अपने साथी अध्यापक
के ख़िलाफ मोर्चा खोलने के लिए बच्चों से जबरदस्ती सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखवाया
जाता है।
बहरहाल
मैं दूसरी कोटि पर आता हूँ। दूसरी कोटि के अंतर्गत फील्ड वर्क में दक्ष छात्र होते
हैं, जिन पर तमाम घरेलू और बाहरी कार्यों का जिम्मा होता है। इस कोटि के छात्रों
के लिए आकादमिक योग्यता और शोध विषय पर समझ ज्यादा मायने नहीं रखती, बस इनके
समर्पण का भाव ही इन्हें वो जगह दे देता है; जिससे सैकड़ों प्रतिभावान शोधार्थी
महरूम रह जाते हैं। दरअसल यहाँ पर अध्यापक महोदय को जिज्ञासु शोधार्थी नहीं समर्पित
सारथि चाहिए होता है। कहना ना होगा कि अध्यापक महोदय को एक ऐसा शोधार्थी चाहिये जो
उन्हें साहित्य की दुनिया की सैर कराते हुए, समय-समय पर उनको और उनके परिजनों को
गंतव्य तक पहुंचा सके। सुनने में तो ये भी आया है कि पूर्वांचल के कुछ
विश्वविद्यालयों में शोध-छात्र चयन के समय अध्यापक महोदय विषय से पहले छात्र से
पूछते हैं कि आपको गाड़ी चलानी आती है की नहीं? मैं समझ नहीं पा रहा कि मेरे गाड़ी
चलाने से मेरे शोध का क्या संबंध है? तब मुझे लगता है कि मैं बेहद ही लिजलिजे
किस्म के समाज में रह रहा हूँ। एक ऐसे समाज में जिसमें रेलवे जीएम की कुर्सी पर
बैठा अधिकारी महिला क्लर्क पर इसलिए भी नाराज हो सकता है कि उस महिला को साहब के
साथ गाना गाने का मन नहीं है।
इसलिए
साथियों हमारी समस्याएं बेहद ही जटिल हैं। हम एक आधे-अधूरे समय में जी रहे हैं। इस
समय की चाल को ठीक करना हमारी ही नैतिक जिम्मेदारी है, लेकिन आज हमारा युवा-वर्ग
बेहद ही डरा हुआ है; इन परिस्थितियों में वह घुटा-घुटा सा महसूस करता है। इसलिए वह
भी एक मौके की तलाश में रहता है। यह ठीक है कि नौजवानी की ताकत पहाड़ी नदी की शक्ति
के समान है लेकिन यह भी सच है कि आज हमारा युवा वर्ग घोर अवसरवाद का शिकार है।
उच्च पद पाने के लिए वह हर तरह की कारगुजारियां करने के लिए तैयार है। लम्बे लम्बे
लेख लिखने और जोरदार भाषण देने वाला युवा भी आखिर में किसी भी तरह कुर्सी की चाह
पाले हुए है। हमारे इसी काइयांपन से हमारे समाज का निर्माण हुआ है। कुर्सी पाकर हम
बेहतर पद पा सकते हैं, बहुत संभव है कि हम बेहतर व्यक्ति भी बन जाएँ लेकिन हम
बेहतर समाज और बेहतर संस्कृति का निर्माण नहीं कर पाते। ब्रेख्त ने ठीक ही कहा है कि
‘हम एक बेहतर व्यक्ति के रूप में विदा लें इससे ज्यादा जरुरी है कि हम एक बेहतर
समाज के रूप में विदा लें’। इसलिए साथियों हमें इन सारे मुद्दों पर गंभीरता से
सोचने की जरुरत है क्योंकि दोस्तों मैं चाहता हूँ तुम सच को जानों और उसे बोलो!--
उसका मुस्तैदी से सामना करो।
![]() |
| सुधांशु कुमार
संपर्क सूत्र-7839114692
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Good piece.
ReplyDeleteशुक्रिया मैम!!
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