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‘देह ही देश’ भग्न देह और विदीर्ण मन का कोलाज

आज जब पूरा विश्व साम्राज्यवादी-उग्र राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों और धार्मिक-सांप्रदायिक हिंसा की कार्रवाइयों के साथ-साथ विश्वयुद्ध के ख़तरे की ओर लगातार बढ़ रहा है; ऐसे समय में युद्ध एवं युद्धनीति की क्रूर सच्चाई बयाँ करती गरिमा श्रीवास्तव की क्रोएशिया प्रवास-डायरी ‘देह ही देश’ वैश्विक साम्राज्यवादी साजिशों एवं षड्यंत्रों से संचालित फासीवादी राष्ट्रवाद के ख़तरों की तरफ इशारा करती है। यह किताब ‘वृहद स्वच्छ सर्बिया’ के नाम पर बोस्निया, हर्जेगोविना, क्रोएशिया की निर्दोष और मासूम जनता के साथ किये जाने वाले बर्बरतम अत्याचारों का ज्वलंत दस्तावेज है। देह ही देश में सर्ब सैनिक तथा सर्ब प्रतिवेशियों द्वारा स्त्रियों के सामूहिक बलात्कार, एथनिक क्लींजिंग, धार्मिक जेनोसाइट के ब्यौरे गहरी संवेदनात्मक संलग्नता के साथ प्रस्तुत किए गए हैं। किताब में आँकड़े, रिपोर्ट, इंटरव्यू, बातचीत के माध्यम से बताया गया है कि 1991-95 के बीच ‘ग्रेटर सर्बिया’ के नाम पर सर्बियाई जनता के मन में उग्र राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भर दिया गया और उसके बाद शुरू हुआ स्त्रियों के सामूहिक बलात्कारों का सार्वजनिक प्रदर्शन। सैनिकों को 'एथनिक क्लींजिंग' का आदेश दिया गया। पाठ के दौरान किताब में दिए गए संवेदनात्मक विवरण पाठक की आत्मा को परत-दर-परत छीलते हैं और पाठक को ऐसा महसूस होता है कि वह इस गहरे ब्यौरों का स्वयंसाक्षी है।


जिस समय हमारे देश में सुनियोजित ढंग से ‘अखंड हिन्दू राष्ट्र’ की परियोजना चलाई जा रही है ठीक उसी समय पाठक इस डायरी के माध्यम से दो दशक पहले ‘वृहद स्वच्छ सर्बिया’ और ‘ग्रेटर सर्बिया’ के नाम पर हुए बर्बर नस्लवादी रक्तपात से होकर गुजरता हुआ एक यथार्थवादी दुस्वप्न देखता है। किताब को पढ़ते हुए कोई भी सजग पाठक उग्र राष्ट्रवाद के संभावित ख़तरे को भाँप सकता है। वैश्विक स्तर पर 1980-90 के दशक में पूंजीवादी फासीवादी ताकतों ने जातीय वर्चस्व एवं धार्मिक-सांप्रदायिक हिंसक परियोजनाओं को खूब खाद पानी दिया। नवें दशक का वैश्विक इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि ग्लोबल गांव के देवता और सांप्रदायिक ताकतों के आंतरिक गठजोड़ से लोकतांत्रिक मूल्य हाशिये पर चले गए और दुनिया का बड़ा भूभाग कचरे के ढेर में तब्दील होने लगा। यही वह समय है जब ग्लोबलाइजेशन के साथ-साथ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया भी तेज़ होने लगती है। अमेरिकी मजदूर नेता यूजीन डेब्स (1855-1926) ने ठीक ही कहा है कि “जिस वर्ग के पास बड़े पैमाने पर लूटने-खसोटने की ताकत होती है उसके पास सरकार को नियंत्रित करने और लूट-खसोट को क़ानूनी जामा पहनाने की भी ताकत होती है।”




यह यात्रा डायरी पाठक को इतिहास के अनकहे पन्नों की ओर खींच ले जाती है और अमेरिकी साम्राज्यवाद के बर्बर इतिहास एवं फासीवादी राष्ट्रवाद के अमानवीय परिणामों की पुनः पड़ताल करने पर हम विवश होने लगते हैं। 1989 में सर्बिया के राष्ट्रपति मिलोसेविच की उच्चतर राजनैतिक महत्वाकांक्षा एवं साम्राज्यवादी षड्यंत्रों ने सर्बियाई जनता को बर्बर नस्लवादी रक्तपात के घिनौने अभियान में धकेल दिया। इस अमानुषिक अभियान के बाद बची रह जाती हैं ‘हवाओं में बिखरी अनंत कहानियाँ, शोषण, हिंसा और यातना की दास्तानें, जो ये बताती हैं कि स्त्रियों की देह पर नियंत्रण करना युद्धनीति का एक हिस्सा होता है।’(देह ही देश, पृष्ठ सं. 135) गरिमा श्रीवास्तव भूमिका में लिखती हैं कि इस पूरे दौर में युद्ध की जघन्य हिंसा का शिकार बनीं—स्त्रियाँ—क्योंकि उनकी देह ही शोषण की साइट थी। दुनिया का इतिहास गवाह है कि फासीवादी राष्ट्रवाद के उभार के साथ-साथ दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों पर बर्बरतम हमले तेज हुए हैं। इन बर्बरतम हमलों से स्त्रियाँ सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रही हैं और होने वाली हैं क्योंकि “देह पर ही सारी लड़ाइयाँ लड़ी जाती हैं और सरहदें तय होती हैं।”(फ्लैप से) इसी कारण लेखिका ने यह रक्तरंजित प्रवास-डायरी उन हज़ारों लाखों औरतों को समर्पित की है जिनकी देह पर  ही लड़े जाते हैं सारे युद्ध।


यह यात्रा-वृत्तान्त अब तक के यात्रा वृत्तांतों से बिलकुल अलग है जो स्त्रियों के भयानक दैहिक शोषण और बलात्कार की मनोसामाजिकी को उद्घाटित करती है। आज जब ‘जल-जंगल-ज़मीन’ की लूट के ख़िलाफ़ आदिवासियों के उलगुलान को दबाने के लिए आदिवासी स्त्रियों की देह पर सुनियोजित ढंग से लड़ाई लड़ी जा रही है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सैनिकों द्वारा आदिवासी महिलाओं का बर्बर बलात्कार हो रहा है, बलात्कार का सार्वजनिक प्रदर्शन हो रहा है, तब देह पर लड़े जा रहे इस युद्ध की रणनीति पर लेखिका कहती है कि ‘स्त्रियों के बर्बर बलात्कार के द्वारा ये ताकतें अपने तीन उदेश्य साधती  हैं-पहला आम नागरिकों में भय का संचार, दूसरा नागरिकों का विस्थापन और तीसरा सैनिकों को बलात्कार की छूट देकर पुरस्कृत करना।’(देह ही देश, पृष्ठ सं. 135) अभी जब मैं यह सब लिख रहा हूँ ठीक इसी समय उड़ीसा के कोरापुट जिले के कुण्डुली में सीआरपीएफ के चार सैनिकों ने मिलकर पन्द्रह साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार किया और खनिज-संसाधनों की निर्बाध लूट के मिशन को अंजाम तक पहुंचाने के लिए एक कदम और आगे बढ़ाया। एक ओर जहाँ बाज़ारवादी ताकतें खनिज तथा बहुमूल्य रत्नों की लूट के लिए इस पैटर्न का इस्तेमाल करती हैं तो वहीं दूसरी ओर धार्मिक-सांप्रदायिक ताकतें जातीय वर्चस्व एवं रक्त की शुद्धता के नाम पर इसी रणनीति के तहत स्त्रियों की देह को घर्षित करती आई हैं।


आज जब दुनियाभर के तमाम विकासशील देशों की जनता बाहरी साम्राज्यवादी विकसित राष्ट्रों के ‘बाज़ारवादी-हथियारवादी राष्ट्रवाद’ तथा आंतरिक ‘उन्मादी-सांप्रदायिक राष्ट्रवाद’ के दो पाटों के बीच पिस रही है, ऐसे में देह ही देश’ अमेरिकी साम्राज्यवाद की साजिशों को परत-दर-परत खोलने का प्रयास करती है। बीसवीं शताब्दी के मध्य में उपनिवेशवाद के पतन के फलस्वरूप एक ओर जहाँ विश्व क्षितिज पर नए-नए राष्ट्र-राज्यों का उदय हो रहा था, वहीं दूसरी ओर अमेरिका दुनिया में साम्राज्यवादी ताकत के रूप में उभर रहा था। सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका के साम्राज्यवादी नाख़ून बढ़ते गए और दुनिया का इतिहास-भूगोल और लहूलुहान होता गया। गरिमा श्रीवास्तव लिखती हैं कि “यहाँ का नागरिक इतिहास कहता है कि युगोस्लाविया को गृहयुद्धों की ओर धकेलने में अमेरिका ने बड़ी षड्यंत्रकारी भूमिका निभाई। अमेरिका द्वारा लगाए आर्थिक प्रतिबंध और नाटो की बमबारी से, सर्बिया के बेगुनाह नागरिकों, जिन्हें अपने व्यवसाय और कृषि से फ़ुर्सत न थी, जो बोस्नियाई और क्रोएशियाई लोगों से विवाह संबंध बनाते थे, का जीना दूभर हो गया। ‘वार इन टाइम ऑफ़ पीस’ में डेविड हाबर स्टाम ने अमेरिकी नीतियों के अंतर्विरोधों का विश्लेष्ण करने की प्रक्रिया में अपने हित में जनतंत्र की स्थापना का पाखंड रचने वाली गैर लोकतांत्रिक और मानवाधिकार के भयंकर और निरंतर उल्लंघन करने वाली शक्ति के रूप में याद किया है।” (देह ही देश, पृष्ठ सं. 133-34)

  
सभ्यता-संकट के इस सर्वग्रासी दौर में साक्ष्यों और आख्यानों के आधार पर किया विश्लेष्ण पाठकों के लिए नई रोशनी का काम कर सकता है। युगोस्लाविया के विखंडन का सच बयान करने वाली यह पहली पुस्तक हिंदी में आई है जो एक ओर उग्र राष्ट्रवाद के उभार के साथ भीषण बलात्कार, यौन-हिंसा, बर्बर नस्लवादी रक्तपात के करुण साक्ष्य प्रस्तुत करती है तो दूसरी ओर आकड़े, तथ्य और सूचनाओं के माध्यम से अमेरिकी साम्राज्यवादी नीतियों की शिनाख्त़ करती हैं। “मेरे सामने परत-दर-परत अमेरिका खुल रहा है क्योंकि अमेरिकी स्त्रीवादियों ने बोस्नियाई स्त्रियों के प्रति यौन हिंसा के तमाम आँकड़े इकट्ठे कर उनका विश्लेष्ण किया। विश्लेष्ण के अनन्तर दिए आँकड़ों में मुझे दो बातें बुरी तरह खटक रही हैं पहली तो यह कि जहाँ बोस्निया सरकार के आँकड़े बलात्कार के 50,000 मामले बताते हैं (जो कि वास्तव में इससे कहीं अधिक थे), वहीं अमेरिकी स्वयंसेवी संस्थाएँ इनकी संख्या लगभग 20,000 बताती हैं। दूसरी बात यह है कि उनका मानना है कि जहाँ भी युद्ध होते हैं, वहाँ बलात्कार और यौन हिंसा के मामले होना भी स्वाभाविक ही है, यह भी जब बोस्नियाई और क्रोआती सैनिक सीमा पर चले गए तो पीछे से उनके घरों की स्त्रियों को सर्ब सैनिकों की टुकड़ियों ने लुभा लिया। युद्धकाल में प्रेम और यौन के आवेग के फलस्वरूप अधिकांश स्त्रियों ने सर्बों को स्वयं ही आमंत्रित किया और यौन संबंध बनाए...युद्ध के दौरान हुई हिंसा के दौरान बलात्कृत स्त्रियों को इन हादसों को विस्मृत कर सामान्य जीवन जीने की दिशा में प्रयास करने को कहा और यह माना गया कि युद्धकालीन अधिकांश समागम ऐच्छिक थे।”(देह ही देश, पृष्ठ सं. 134) किताब के इन अंशों को पढ़ते हुए पाठक को 1978 का ‘मथुरा बलात्कार कांड’ याद आ सकता; याद आ सकता है भारतीय न्यायपालिका के न्यायधीशों का अटल विश्वास कि पुलिस स्टेशन में मथुरा के साथ बलात्कार नहीं किया गया बल्कि मथुरा की संभोग में सहमति थी और उसने अपनी इच्छा से यह कार्य किया।


कहना न होगा कि एशिया हो या सुदूर यूरोप हर जगह स्त्रियों के मामले इसी तरह निपटाये जाते हैं। बात-बात में मानवाधिकार और स्त्री सशक्तीकरण के नाम पर कलाबाजी और गलाबाजी करने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका के इस अमानवीय और स्त्री विरोधी आंकड़े एवं विश्लेष्ण को देखने के बाद इतना तो स्पष्ट हो ही गया होगा कि पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतें अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। युद्ध के बाद प्रति व्यक्ति आय में आई भयानक गिरावट और बेरोज़गारी के आंकड़ों को प्रस्तुत करते हुए लेखिका बताती हैं कि आर्थिक मंदी, बेरोज़गारी और भुखमरी के कारण हज़ारों औरतें शारीरिक शोषण और ट्रेफ़िकिंग का शिकार हुई। बोस्निया का एरिज़ोना मार्केट, जहाँ युद्ध के दौरान रोज़मर्रा की चीज़ों की खरीद-फ़रोख्त हुआ करती थी, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्धोत्तर सर्ब, क्रोआती और बोस्नियायियों के बीच संबंध सुधारने के केंद्र के रूप में स्थापित-प्रचारित किया गया, दिसम्बर 1995 में युद्ध खत्म होने के बाद देह एवं दास-व्यापार और पोर्नोग्राफ़ी के आर्थिक केंद्र के रूप में उभरा। इस आर्थिक सेक्टर से सबसे ज्यादा लाभ अमेरिका को हुआ। पूंजीवादी राष्ट्र अमेरिका ने अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर एरिज़ोना मार्केट को मुक्त बाज़ार के रूप में विकसित किया और उसके बाद शुरू हुआ स्त्री देह पर पैशाचिक अनुष्ठान। लेखिका ने आँकड़े, तथ्य और भूतपूर्व पुलिस अधिकारी की रिपोर्टों के आधार पर बताया है कि इस पैशाचिक अनुष्ठान में 80 प्रतिशत निवेश यू.एन, नाटो और अमेरिका का था। इस किताब में तथ्यों और रिपोर्टों के आधार पर लेखिका लिखती हैं कि युद्ध नव साम्राज्यवादी दौर का उद्योग है जिसके माध्यम से पूंजी की भयानक लूट होती है। यह किताब पूंजीवादी ताकतों द्वारा प्रायोजित युद्ध उद्योग का पड़ताल करती है। युद्ध कहीं भी हो, किसी भी रूप में लड़ा जा रहा हो इसका सीधा लाभ इन नव साम्राज्यवादी ताकतों को ही मिलता है। युद्ध के दौरान यह लाभ बम-बारूद, अत्याधुनिक मशीनों-मिसाईलों की सप्लाई से मिलता है तो युद्ध के बाद विस्थापन और इस परिस्थिति से उपजे देह और दास व्यापार से।


यह एक ऐसी पुस्तक है जिसमें दिए तमाम प्रमाणिक आँकड़े, तथ्य और सूचनाएं शोध-छात्रों के लिए महत्त्वपूर्ण स्त्रोत का काम कर सकती है। यह पुस्तक पाठकीय रुचि का विकास और परिष्कार करते हुए पाठकों के सामने 'वैश्विक स्त्रीवाद' की समझ भी पेश करती है। किताब पढ़ते हुए पाठक के सामने पितृसत्ताक सामंती व्यवस्था की सबसे निचले पायदान पर दबी-कुचली आधी आबादी थी जिसे कभी परिवार के नाम पर, कभी जातीय वर्चस्व के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर तो कभी रक्त की शुद्धता के नाम पर दबाया और घर्षित किया जाता रहा है। यह अनायास ही नहीं है कि पाठ के दौरान पाठक यूरोप की स्त्रियों के साथ-साथ उड़ीसा के कोरापुट जिले की 15 वर्षीय आदिवासी लड़की के लिए भी व्यथित है। किताब पढ़ते हुए यूरोप का एक नया चेहरा सामने आता है, ऐसा चेहरा जिससे मेरा देश अपरिचित था।




गरिमा श्रीवास्तव इस क्रोएशिया प्रवास-डायरी ‘देह ही देश’ में दो विश्वयुद्धों के दौरान घर्षित हजारों-लाखों महिलाओं की चीखें कैद हैं। दब गई और दबा दी गई ये चीखें पाठक को विचलित कर सकती हैं। “प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बेल्जियम और रूस औरतों के लिए सामूहिक मरण स्थली बने, वहीं दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान रूस, जापान, इटली, कोरिया, चीन, फिलिपींस और जर्मनी में बड़े पैमाने पर स्त्रियों को घर्षित किया गया। आपसी छोटी-बड़ी मुठभेड़ों में अफगानिस्तान, अल्जीरिया, अर्जेंटीना, बांग्लादेश, ब्राजील, बोस्निया, कंबोडिया, कांगो, क्रोएशिया, साइप्रस, अल सल्वाडोर, ग्वाटेमाला, हैती, भारत, इंडोनेशिया, कुवैत, कोलंबो, लाइबेरिया, मोजांबीक, निकारागुआ, पेरू, पाकिस्तान, रवांडा, सर्बिया, सोमालिया, टर्की, युगांडा, वियतनाम और जिम्बाब्वे जैसे देशों की लंबी सूची है—जहाँ यौन हिंसा और स्त्री घर्षण की घटनाएँ हुईं और बड़े-बड़े भाषणों, राजनैतिक समझौतों के बीच प्रतिरोधी आवाजें दब गयीं, दबा दी गयीं।”(देह ही देश, पृष्ठ सं. 51) आज जब ‘मेक इन इंडिया’ के जुमले में इंडिया का डेवलपमेंट हो रहा है, मूडीज द्वारा दिये गये रेटिंग्स से खाये पिये अघाये मध्यमवर्ग को विकास का ग्राफिक्स दिखाया जा रहा है तब यह किताब ‘कल्याणी अगेन’ के बहाने आंध्रप्रदेश के उन निर्धन गांवों में ले जाती है जहाँ पर अधिकांश परिवारों में जीविकोपार्जन के लिए एक न एक लड़की देह श्रमिक है। गरिमा श्रीवास्तव की यह पुस्तक देह श्रमिक, सेक्स वर्कर और यौन दासियों को लेकर एक अलग समझ प्रस्तुत करती है।


इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पुस्तक स्त्री को एक श्रमिक के रूप में भी देखती है। शुरू में ही लेखिका ने ‘देह श्रमिक’ शब्द का प्रयोग कर अपनी वैचारिकी को स्पष्ट कर दिया है। स्त्री के श्रम को लेकर प्रखर मार्क्सवादी चिंतक पी.सी.जोशी की जो चिंता थी वह चिंता इस पुस्तक में भी दिखाई देती है। यह ठीक है कि यह चिंता इस पुस्तक में केंद्रीय रूप में नहीं दिखाई देती लेकिन लेखिका की वैचारिकी बहते पानी की तरह साफ है। पी.सी.जोशी इस बात से बेहद चिंतित थे कि ‘स्त्रीवाद के पश्चिमी एजेंडे में स्त्री का श्रम नहीं, बल्कि उसका शरीर मुख्य हो जाता है और हमारा ध्यान श्रमिक स्त्री के शोषण तथा श्रम के बाजार में उसके साथ होने वाले भेदभाव से हट जाता है। स्त्रीवादी आंदोलन पुरुष-वर्चस्व के विरोध तक ही सीमित होता जा रहा है।’ ऐसे में गरिमा श्रीवास्तव अपनी पुस्तक ‘देह ही देश’ में सिर्फ स्त्रियों की देह पर लड़े जा रहे युद्ध, यौन हिंसा, बर्बर बलात्कार जैसे दमन और उत्पीड़न की तरफ की इशारा ही नहीं करतीं बल्कि देह श्रमिकों, यौन दासियों और सेक्स वर्करों के श्रम का उचित मूल्यांकन भी करती हैं।


लेखिका ने पुस्तक में आधी आबादी की समस्याओं को बेहद ही संजीदगी से उठाया है। ‘लेखिका की संवेदनात्मक संलग्नता और संवेदनात्मक तीव्रता एक धारदार चाकू के समान है जिससे लेखिका किसी यथार्थ या अनुभव को परत दर परत चीरते हुए बता रही हैं कि खून यहाँ से बहता है, नसें यहाँ से फूटती हैं, दर्द ठीक यहाँ पर होता है।’ स्त्रीवाद का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि वह स्त्री मुक्ति का प्रश्न परिवार में स्त्री-पुरुष के संबंध के स्तर पर उठाता है और वहां के समाज और राज्य तक जो पितृसत्ता हावी है, उसकी शिनाख्त़ करता है और उसके उन्मूलन की माँग करता है। लेखिका इस पुस्तक में एक तरफ अलग-अलग ख़तों एवं विवरणों के माध्यम से परिवार में पितृसत्तात्मक नियंत्रण को रेखांकित करती हैं तो वहीं दूसरी तरफ तान्या और एंजोलिना के माध्यम से प्रेम के वैश्विक पैटर्न और स्त्री के साथ हो रहे छलावे को दिखाते हुए भारतीय पुरुष पर क्रिटीक भी रचती हैं। “ज़्यादातर भारतीय पुरुष अपनी पत्नी और दोस्त में माँ ढूढ़तें हैं, जो उन्हें खिला-पिला-दुलरा कर सुला दे, सुबह उठाकर तैयार कर दे, और हर समय उनके लिए उपलब्ध रहे।”(देह ही देश, पृष्ठ सं. 77) कहना न होगा कि लेखिका इस पुस्तक के माध्यम से स्त्रीवाद के वैश्विक परिपेक्ष्य को बहुत ही कलात्मक ढंग से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती हैं।


इस पुस्तक की एक बड़ी विशेषता इसकी कलात्मक प्रस्तुति भी है। यह किताब अपनी कलात्मक प्रस्तुति में विधाओं का अतिक्रमण करती है। कोई भी पाठक पूरी जिम्मेदारी के साथ यह नहीं कह सकता कि यह फलां विधा की रचना है। लेखिका खुद भी पेशोपेश में हैं कि इसे किस विधा के अंतर्गत रखा जाए। भूमिका में लेखिका लिखती हैं कि ‘इसे डायरी कहा जा सकता है’।  मतलब यह हुआ कि लेखिका भी दावे के साथ यह नहीं कह पा रही हैं कि यह किस विधा की रचना है। इस पुस्तक में मौजूद लेखिका का एकांत, उसका अकेलापन, उसका आत्मसंघर्ष एवं सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत जीवन झांकी पुस्तक को आत्मकथ्य की ओर प्रवृत्त करती है। डायरी और यात्रावृतांत के सूत्र तो जगह-जगह मिलते हैं तो कुछ जगहों पर इंटरव्यू विधा भी मौजूद है। आकंड़ों द्वारा वार जोन (क्रोएशिया, बोस्निया, सर्बिया, हर्जेगोविना) और एरिजोना मार्केट के सेक्स वर्करों की अंतहीन पीड़ा की रिपोर्टिंग को देखने के बाद पाठक पुस्तक में मौजूद रिपोतार्ज विधा को भी देख लेता है। सहज, रोचक और प्रवाहमयी भाषा में कथात्मक ब्यौरों की इतनी सघनता है कि पाठक को यह भ्रम हो सकता है कि वह उपन्यास या लंबी कहानी जैसी किसी विधा की रचना को पढ़ रहा है जिसमें हजारों-लाखों स्त्रियों के भयानक शोषण और दमन की दास्तां कही गई है।



इस पुस्तक की भाषा इतनी रोचक और सहज है कि ‘पृष्ठ-दर-पृष्ठ सीने के भीतर उतरते तेज नश्तर’ भी पाठक को आतंकित नहीं करते। किसी भी लेखक की भाषा की सफलता इसी में है कि वह पाठक को जुगुप्सा पैदा करने वाले वीभत्स वर्णनों को भी बिना आतंकित किए पढ़ा ले जाए और अपनी बात भी पूरी गंभीरता और तीव्रता के साथ कह दे। हिंदी साहित्य में अममून देखा जाता है कि लेखक बलात्कार, यौन हिंसा, देह शोषण जैसे वर्णनों की प्रस्तुति में चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने पाठकों के बीच सॉफ्ट पोर्न परोस देता है और पाठक के मन मस्तिष्क में अलग-अलग पोर्नोग्राफिक साइट चलने लगती है। आज दुनिया का पुरुष समाज बलात्कार जैसे भीषण कुकृत्यों में भी उत्तेजना ढूढ़ लेता है, वर्जिन सेक्स और रेप सेक्स के अलग-अलग किस्मों के वीडियो को ढूढ़ते-ढूढ़ते सर्च इंजन गूगल त्रस्त हो चुका है। आज जब बाज़ार सैडिस्ट ग्राहकों को रिझाने के लिए विज्ञापनों में यौन हिंसा को दिखा रहा है, पुरुषों की यौन कुंठा को शांत करने के लिए सिगरेट की राखदान के लिए स्त्री की योनि को ऐश-ट्रे बनाकर बेच रहा है। आज जब बाज़ार के दवाब में नामी-गिरामी लेखक (स्त्री और पुरुष दोनों) भी अपने लेखन में सेक्स की छौंक लगा रहे हैं।


आज जब भाषा को पोर्नोग्राफिक्स में बदला जा रहा है। आज जब लेखक और प्रकाशक बाज़ार के हिसाब से मसालेदार विषयों एवं चटपटी भाषा को परोस कर सुनियोजित ढंग से पाठकों को उत्तेजना, कुंठा और सनसनी के संसार में ले जा रहे हैं, ऐसे समय में गरिमा श्रीवास्तव की पुस्तक ‘देह ही देश’ में बलात्कार, यौन हिंसा, दैहिक शोषण के विवरण/रिपोर्टिंग उत्तेजना, कुंठा और सनसनी के संसार से परे सुरुचिपूर्ण करुणामयी संसार में ले जाती है। लेखिका इन विवरणों में जाते वक्त भाषा के प्रयोग को लेकर इतनी सतर्क हैं कि जहाँ भी उन्हें लगता है कि बलात्कार और दैहिक शोषण के इस वर्णन में पाठक का एक वर्ग (जिसे बाज़ार ने बीमार बना दिया है) कामोत्तेजना ढूढ़ सकता है वहाँ पर तुरंत बलात्कार के दौरान जुगुप्सा पैदा करने वाले भीषण दृश्य को हुबहू रख देती हैं; जिससे पाठक के मन में कामोत्तेजना की जगह पीड़ित के प्रति करुणा उमड़ती है। यही करुणा इस किताब का उत्स है जो पाठक को एक सुरुचिपूर्ण संसार में ले जाता है। एक बड़े लेखक का दायित्व होता है कि वह पाठकीय रुचि का परिष्कार करें; गरिमा श्रीवास्तव इस पुस्तक के माध्यम से यह बखूबी कर रहीं हैं।इस पुस्तक को सुरुचिपूर्ण बनाने के लिए लेखिका ने किताब में ख़तों एवं कविताओं का अद्भुत समायोजन किया है जो इस किताब को और रोचक बनाता है। 


आखिर में दो ज़रूरी जानकारियाँ दे दूँ। पहला, इस किताब के प्रकाशक हैं ‘राजपाल एण्ड सन्ज़’ प्रकाशकों ने इसका मूल्य 285 रूपये रखा है। दूसरी बात यह है कि यह देह विमर्श की किताब नहीं है। यह जानकारी इसलिए ज़रूरी है क्योंकि कुछ विज्ञ आलोचक और समीक्षक बिना किताब पढ़े शीर्षक के ‘देह’ शब्द को देखकर बिदक रहे हैं तो कुछ ‘देह’ देखकर रोमांचित हो रहे हैं, जो पाठक या आलोचक इस किताब में देह को ढूढ़ने निकलेगें, किताब पढ़ने के बाद उनको बहुत निराशा हाथ लगने वाली है।


नोट:- यह समीक्षात्मक आलेख 'बनास जन' पत्रिका के जनवरी-मार्च 2018 (प्रकाशित अगस्त 2018) के अंक में शामिल है. इस ब्लॉग पर यह आलेख बिना किसी कांट-छांट/संपादन के लगाया जा रहा है.   



सुधांशु कुमार
शोधार्थी, हिंदी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय
दिल्ली
मो :-7839114692
ईमेल:-sudhanshuchaudhary1991@gmail.com 

   

Comments

  1. Mitr Sudhanshu apne es samikshatmk lekh ko likhne me bahut parishram kiya hoga. Ye lekh ko pd spsht ho jata h. Aapne lekh me deh hi desh pustk ko likhte samy lekhika ki pida aur usme vykt satriton ki pida ko mahsus kiya h. Sath hi apne bhartiy sandrbhon ko jodkr jo pustk ki aalochna ki h. Vh kabile tarif h. Lekh ki bhasha pathak ki bor nhi hone deti h
    Mitr Sudhanshu aapko bahut bahut badhaee

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    1. बहुत शुक्रिया सर ! लेखक के लेखन को पाठक पसंद करें यही लेखक की सफलता है.

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  2. अच्छी पुस्तक समीक्षा की पहचान है कि पाठक उस पुस्तक को खरीदकर पढ़ना तय कर ले। इस मानक पर यह पुस्तक समीक्षा 100% सटीक बैठती है।

    साम्राज्यवाद और समाजवाद के संघर्ष में समाजवाद के हार से उन स्त्रियों की सत्ता को पहचाना गया है या नहीं- यह तो पढ़कर ही पता चलेगा। समाजवाद में वही स्त्री किन भूमिकाओं को निभा रही थीं - समीक्षा में इसका जिक्र नहीं आया है। संभव है यह इस पुस्तक की सीमा हो।

    कुलमिलाकर उम्दा किताब की उम्दा समीक्षा लग रही है। बाकी पुस्तक पढ़कर प्रतिक्रिया दूँगा। ऐसी किताबें हिंदी में नगण्य ही है। इसका स्वागत होना चाहिए।

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    1. बिलकुल सर ! किताब काफ़ी उम्दा है इसे जरूर पढ़ा जाना चाहिए. वाकई में हिंदी में इस तरह की किताबें सीमित हैं इस कारण यह किताब और भी जरूरी लगती है......सर ! जहाँ तक सीमा की बात है वहाँ मैं अपनी तरफ से सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि पुस्तक, लेख, समीक्षा, संस्मरण, कथा, कहानी यहाँ तक व्यक्ति के विचार की भी एक सीमा होती है. कई बार पुस्तक की कथावस्तु और शिल्प का चुनाव भी उस सीमा को नियंत्रित करता है.....

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    2. सर ! किताब पढने के बाद आपको लगे कि कुछ जरूरी मुद्दे छूट गए हैं या फिर किसी जगह पर मेरी समझदारी चूक गयी है तो उस दिशा में मेरा ध्यान जरूर ले जाएँ.मुझे प्रसन्नता होगी.

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  3. बहुत ही तार्किक समीक्षा . मुझे लगता है इसे गुलाबी डायरी नहीं बल्कि स्त्री देह जो कि रक्त से सनी हुई है , के लिए इसे रक्त -रंजित डायरी कहना चाहिए. इतने सारे देशों में स्त्री देह का जिस प्रकार मर्दन और घर्षण किया गया उसके लिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि दुनिया की ऐसी कौन सी मिट्टी है जहाँ औरत को नंगा न किया गया हो . बहुत तीखा व्यंग्य भी है उन तमाम क्षिद्रान्वेशियों के लिए जिन्होंने इस पुस्तक को पढे बिना ही इसकी शीर्षक को अश्लीलता की श्रेणी में रख दिया था , अपनी सेखी बघारने और अपना थोथा पंडिताऊपना दिखाने हेतु . सस्ती लोकप्रियता पाने हेतु . ऐसे आलोचकों से मेरा व्यक्तिगत निवेदन है कि कृपया किसी भी पुस्तक के विषय में अपनी राय देने से पूर्व एक बार उसे अच्छे से अवश्य पढ लें . इससे होगा ये कि जो लोग आपके अनुगामी होंगे कम-से-कम वो लोग इस पुर्वाग्रह से बच जाएंंगे . स्त्री को जिस दिन मनुष्य समझ लिया जाएगा उस दिन कोई भी युद्ध स्त्री देह को लेकर उस प्रकार से नहीं लड़ा जाएगा जैसे कि इन देशों में लड़ा गया . उस दिन स्त्री का संघर्ष एक स्थायीत्व को प्राप्त करने में ज़रूर सफल होगी .

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  4. छिद्रान्वेषी

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मूर्खता का सौन्दर्यशास्त्रीय विवेचन बनाम बलम परदेशी जायका!! गप्प  आज पूरे एक साल बाद रामाधार से भेंट हुई ।   रामाधार बहुत गुस्से में था । कुछ दिन पहले ही मुझे पता चला कि रामाधार को ब्लड प्रेशर की   बीमारी हो गयी है। मैंने उससे कहा था कि अकादमिक जगत को दिल से मत लगाओ , दिल के मरीज हो जाओगे।   लेकिन बददिमाग सुनता ही नहीं किसी की।   अपनी ही धुन में जीता है , अपने मन की करता है। उसे तनिक भी परवाह नहीं कि आगे क्या होगा ?  जब भी मैं उसे डांटता हूँ तो वो कहता है, ‘एक ही जिंदगी तो मिली है घुट-घुट के नहीं जियूँगा , समझौतापरस्ती मुझसे नहीं होगी दोस्त।’ आज उसका पारा गरम था। गुस्से में आया और परिचय 2017 का अंक मेरे सामने फेंकते हुए बोला, ‘देखो इसमें क्या-क्या लिखा है शुक्ला जी ने’ ! मैं जब तक कुछ समझता रामाधार ने बोलना शुरू किया, ‘ इनकी आदत   बहुत खराब है। जैसे ही कोई पदमुक्त होता है या पद से हटाया जाता है , वैसे ही ये हज़रत उसको सार्वजनिक रूप से गरियाना शुरू करते हैं। जैसे विनय सिंह के पद से हटाए जाने पर इन्होनें रविशंकर भैया की श्रद्धांजलि की आड़ में उन...
"यह समझने के लिए कि मैं क्या कहता हूँ, किसी को भी मेरा आचरण देखना होगा..."- महात्मा गांधी के इस कथन के ठीक बाद, मैं यहाँ एक बड़े आचार्य मने एक प्रोफेसर साहब की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ. शायद उन्होंने यह कविता दीक्षा ग्रहण करते समय अपने किसी आचार्य को ध्यान में रखते हुए लिखी होगी. मैं उनकी यह कविता उनको और उनकी बिरादरी को समर्पित करता हूँ. कविता का शीर्षक है -"इतना तो लोग जानते ही हैं"....   आचार्य दुनिया जहान की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं एक ही कविता और कहानी की अनेक व्याख्याएं और प्रतिव्याख्याएं कर सकतें हैं आदर्श और नैतिकता की उनसे अच्छी व्याख्या कोई क्या कर सकता है पर अपने जीवन में इसका उलट व्यवहार करते हैं वे व्याख्या की अद्भुत क्षमता राजनीति और षडयंत्र द्वारा अर्जित शक्ति के नाते उनकी पूछ और ज़रुरत बनी रहती है लोग उनसे डरते हैं, क्योंकि उन्हीं से अपना काम निकालना होता है इसलिए कोई कुछ नहीं कहता, पर इतना तो लोग जानते ही हैं कि ऐसे लोग किसी का आदर्श नहीं बन सकते आदर्श बनने के लिए नैतिक आचरण देखते हैं लोग अनैतिक आचरण से उ...

रेडियो का वक़्त - ब्रेख्त

फासीवाद के चरमकाल में जर्मनी के ब्रेख्त ने कई नाटक लिखे । इनमें से कुछ नाटकों का अनुवाद अमृतराय ने 'खौफ़ की परछाइयाँ' नाम से किया ।  वैसे तो इस संग्रह के सभी नाटक महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन इस समय मैं आपके सामने एक नाटक को रखता हूँ।  नाटक का शीर्षक-  'रेडियों का वक्त' । भले ही यह नाटक फासीवादी दौर का है लेकिन आप जब इससे होकर गुजरेंगे तो आपको लगेगा यह नाटक तो हमारे समय का है । यह नाटक तो  दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की कहानी कह रहा है ।   आप इस नाटक से होकर गुजरते जाइए आपको महसूस होगा कि नाटक का मुख्य पात्र तो आपका जाना पहचाना है । आपको महसूस होगा कि आप तो उसे रोज टी.वी. पर देखते हैं । आपको महसूस होगा कि इस नाटक  अनाउंसर  तो दिनभर प्राइम टाइम तथा अन्य तमाम बहसों में दिखता रहता है ।     रेडियो का वक़्त   (एक कारखाने में शॉप सुपरिटेंडेंट का दफ्तर। एक रेडियो अनाउंसर हाथ में माइक्रोफोन लेकर एक अधेड़ मजदूर, एक बुड्ढी मजदूरनी और एक कम उम्र मजदूरनी से बातचीत करता है। इन लोगों से पीछे की ओर एक कारखाने का अफसर और एक नाजी सैनिक की पोशाक...