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| मधुबन गोष्ठी |
पराग पावन की कुछ कविताएं साझा कर रहा हूँ।
पराग अभी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में परास्नातक पाठ्यक्रम में अध्ययनरत हैं।
स्नातक की शिक्षा इन्होने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ग्रहण की। कविता और
कवि-कर्म के प्रति बेहद ही सचेत हैं पराग;
स्नातक के दौरान ही इन्होनें इस क्षेत्र में समझ रखने वाले अपने
कुछ जिज्ञासु मित्रों को एकजुट किया और इस संदर्भ में चर्चा-परिचर्चा की शुरुआत
की। पराग और इनके सारे मित्र हर रविवार को मधुबन (काशी हिंदू विश्वविद्यालय में
संगीत मंच कला संकाय के बगल का उद्यान) में काव्य-गोष्ठी का आयोजन करते थे,
जो अभी भी मुसलसल जारी है। इस गोष्ठी में कविता से सम्बन्धित समझ
और रूचि रखने वाले छात्र आते हैं और अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ करते हैं,
साथ ही कविता की बारीकियों पर भी चर्चा होती है। जिस दौर में
हिंदी कविता बिना अकादमिक प्रचार-प्रसार और बिना दरबारी आलोचना के एक कदम चलने में
भी हांफने लगती है उसी दौर में ‘मधुबन गोष्ठी’ के सारे साथी कविता रच रहे होते
हैं। एक रविवार आमंत्रण मिलने पर मैं भी घूमते टहलते मधुबन पहुँचा, वहां कई युवा साथियों से भेंट हुई जो अच्छी कविताएं लिख रहे थे। उसी
दिन मैंने ‘ये धान रोपती औरतें’ कविता पराग से सुनी थी और उसके बाद तो कई बार
आग्रह करके मैं ये कविता सुन चुका हूँ। इन्होनें अपनी कविताओं में समकालीन समय,
समाज और परिवेश को बखूबी व्यक्त किया है। पराग के कहन की शैली
बिलकुल ही अलहदा और बेजोड़ है। शब्द चयन और बिम्ब संयोजन के दौरान पराग बेहद सचेत
होते हैं। इस कारण कई बार ऐसा होता है कि कविता रूमानी एप्रोच के साथ पाठक के पास
पहुँचती है; लेकिन समय के साथ पराग की कविता धारदार होती
जा रही है। मैं पराग की काव्ययात्रा की तीन कवितायें आपसे साझा कर रहा हूँ। पराग
की आखिरी कविता को सहृदय पाठक ज़रूर देखें। यह वही कविता है जिसके पाठ के दौरान एक
आयोजन में 'वरिष्ठ कवि और सत्र के अध्यक्ष' मदन कश्यप ने परम्परा का निर्वाह करते हुए अपना कान बंद कर लिया। जी
हाँ परंपरा का ही!! यह घटना भले ही उस परम्परा की कोटि में नहीं आएगी लेकिन हिंदी
साहित्य में उपेक्षा की राजनीति चरम पर है। अक्सर काइयां किस्म के मंचमार रचनाकार
और अवसरवादी आलोचक यह कहते पाए जाते हैं कि-“फलां कवि अच्छी कविता लिखते हैं,
चिलां के विचार बहुत अच्छे हैं लेकिन उसपर कोई चर्चा ना करो
चर्चा करने मात्र से फ़िजूल में उसकी TRP बढेगी”। इस मामले
में आलोचक बहुत ही शातिर और चालाक होते जा रहे हैं। हमें इस चालाकी को समझना होगा
और इससे मुठभेड़ भी करना होगा।भले ही हिंदी आलोचना और तथाकथित वरिष्ठ कवि कान बंद
कर लें लेकिन सहृदय पाठकों के रहते कविता की अनुगूँजें आकादमिक दुनिया में सुनायी
देंगी और इसे दर्ज किया जाएगा। बहरहाल आपलोग पराग की कविता को यहाँ पढ़ सकते हैं।
(१)
ये
धान रोपती औरतें
बान कलम से
गीली मिट्टी की स्याही से
खेत के कागज पर
आखिर क्या लिखतीं हैं?
बान कलम से
गीली मिट्टी की स्याही से
खेत के कागज पर
आखिर क्या लिखतीं हैं?
साँझ ढले
धरती की ढोलक पर
पैरों की थाप देती हुई
ये घर को लौट जायेंगी
फिर खुद को झोंक देंगी चूल्हे के भुक्खड़ मुँह में
जिसकी ताप से चावल पककर भात बन जायेगा
दाल, दाल बन जायेगी
पति को खिलायेंगी
बच्चों को खिलायेंगी
कुछ बच गया तो खुद भी खायेंगी
फिर कल सुबह सबसे पहले उठने के लिये
रात को सबसे बाद में सो जायेंगी।
धरती की ढोलक पर
पैरों की थाप देती हुई
ये घर को लौट जायेंगी
फिर खुद को झोंक देंगी चूल्हे के भुक्खड़ मुँह में
जिसकी ताप से चावल पककर भात बन जायेगा
दाल, दाल बन जायेगी
पति को खिलायेंगी
बच्चों को खिलायेंगी
कुछ बच गया तो खुद भी खायेंगी
फिर कल सुबह सबसे पहले उठने के लिये
रात को सबसे बाद में सो जायेंगी।
ये औरतें
गृहस्थ-रथ-आरूढ़ बेताज़ रानियाँ हैं
गृहस्थ-रथ-आरूढ़ बेताज़ रानियाँ हैं
और उनके पुरुष जुतते रहे हैं उसी रथ में
ऐसा महसूसते, गीली मेंड़ पर खड़े होकर
मैं अब भी यही सोच रहा हूँ
ऐसा महसूसते, गीली मेंड़ पर खड़े होकर
मैं अब भी यही सोच रहा हूँ
ये धान रोपती औरतें
बान की कलम से
गीली मिट्टी की स्याही से
खेत के कागज पर
आखिर क्या लिखती हैं?
बान की कलम से
गीली मिट्टी की स्याही से
खेत के कागज पर
आखिर क्या लिखती हैं?
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(२)
हमारे जीने के तमाम तरीकों में
एक तरीका कुत्तों का भी हो सकता था
कि हम साँसी खेलते हुए लड़ते
और जीने का भरम रखते।
एक तरीका कुत्तों का भी हो सकता था
कि हम साँसी खेलते हुए लड़ते
और जीने का भरम रखते।
हम मेमनों की तरह दिशाओं को
मासूम बनाते हुए जी सकते थे
हम मछलियों की तरह नदी-नालों-तालाबों को
सजाते हुए जी सकते थे
दो रुपये की फिरहिरी पर
एक बच्ची की तरह
दुपहरिया नचाते हुए भी जिया जा सकता था
मासूम बनाते हुए जी सकते थे
हम मछलियों की तरह नदी-नालों-तालाबों को
सजाते हुए जी सकते थे
दो रुपये की फिरहिरी पर
एक बच्ची की तरह
दुपहरिया नचाते हुए भी जिया जा सकता था
या यूँ भी तो जी सकते थे
कि सीने में गुब्बारे की तरह
मुहब्बत का गुमान भरकर फूलते
और फटाक् से फूटकर बिखर जाते एक दिन
कि हमारे जीने के तमाम तरीकों में
एक तरीक़ा कुत्तों का भी हो सकता था।
जिसे आदमी का छूत लगता है
सबसे पहले उसका कुत्तापन छूट जाता है
तमाम दलिद्दर छायाएँ उसके बगल से गुज़र जाती हैं
और वह भूँकने की कला बिसार देता है
सबसे पहले उसका कुत्तापन छूट जाता है
तमाम दलिद्दर छायाएँ उसके बगल से गुज़र जाती हैं
और वह भूँकने की कला बिसार देता है
किसी प्राकृतिक हादसे में
अगर आप मुसलमान हो गए हों
या किसी कुदरती दुर्घटना में हिन्दू
तो वक्त को
भारतीय होने से बचाने की जिम्मेदारी
असल में सबसे बड़े देशप्रेम है
इस लिहाज से कुत्तों की कोटियाँ तय हो।
अब हमों हामियाँ भर देनी चाहिए
यह सबसे माकूल घड़ी है
अब कुत्तों की गालियां के बाहर
की सत्ता की पहचान की जाए
पाई-पाई हिसाब हो उनके रतजग्गों का
और इस संभावना पर विचार किया जाए
कि हमारे जीने के तमाम तरीकों में
एक तरीका कुत्तों का भी हो सकता है।
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(३)
इस धरती पर बम फोड़ने की
जगह है
बलात्कार करने की जगह है
दंगों के लिए जगह है
ईश्वर और अल्लाह के
पसरने की भी जगह है
पर तुमसे मुलाकात के लिए
पंजे पर जमीन भी नहीं है
इस धरती के पास।
जब भी मैं तुमसे मिलने आता
हूँ
भैया की दहेजुवा बाइक लेकर
सभ्यतायें उखाड़ ले जाती है
उसका स्पार्क प्लग
संस्कृतियाँ पंक्चर कर
जाती हैं उसके टायर
धर्म फोड़ जाता है उसका
हेडलाइट
वेद की ऋचायें मुखबिरी कर
देती हैं
तुम्हारे गांव में
और लाल मिर्जई बांधें
रामायण
तलब करता है मुझे इतिहास
के अदालत में
मैं चीखता चाहता हूँ
कि देवताओं को लाया जाय
मेरे मुकाबिल
और पूछा जाय कि
कहाँ गयी वह जमीन
जिस पर दो जोड़ी पैर टिका
सकते थे
अपना कस्बाई प्यार
मैं चीखना चाहता हूँ कि
धर्मग्रन्थों को मेरे
मुकाबिल लाया जाय
और पूछा जाय कि
कहाँ गए वे पन्ने
जिसपर दर्ज किया जा सकता
था
प्रेम का ककहरा
मैं चीखना चाहता हूँ कि
लथेरते हुए खींचकर लाया
जाय
पीर और पुरोहित को और
पूछा जाय कि क्या हुआ उन
सूक्तियों का
जो दो दिलों के महकते भाँप
से उपजी थी
मेरे बरक्स तलब किया जाना
चाहिए
इन सबों को
और तजवीज़ के पहले
बहसें देवताओं पर होनो
चाहिए
पीर और पुरोहित पर होनी
चाहिए
आप देखेंगें कि देवता
बहस पसंद नहीं करते
मुझे फोन पर कहना था और
कह दिया है अपनी प्रेमिका
से
कि तुम चाँद पर सूत कातती
बुढ़िया बन जाओ
मैं अपनी लोक कथाओं का कोई
बूढा
सदियों पार जब बम और
बलात्कार से
बच जाएगी पीढ़ा भर मुकद्दस
जमीन
तब तुम उतर जाना चाँद से
मैं निकल आऊंगा कथाओं से
तब झूमकर भेंटना मुझे इस
तरह
कि सिरज उट्ठे कोई कालिदास
का वंशज
अभी तो इस धरती पर बम
फोड़ने की जगह है
दंगों के लिए जगह है
ईश्वर के पसरने की भी जगह
है
पर तुमसे मुलाकात के लिए
पंजे भर जमीन भी नहीं है
इस धरती के पास।


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