महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी
विश्वविद्यालय में शोधरत शैलेन्द्र कुमार शुक्ल साहित्य में अपने खास तेवर और
पक्षधरता के लिए जाने जाते हैं। आप इनके लेखन में इनका तेवर और इनकी पक्षधरता देख
सकते हैं। “यह समय बहुत ही खतरनाक दौर से गुजर रहा है। जब हत्यारे हत्याएं कर रहे
हैं और राजनीतिक भक्त मदांध हो कर हत्यारों की पूजा में लगे हुए हैं। वह अपने सारे
तर्कों के साथ इन हत्यारों की आरती उतारते रहते हैं जब तक उनकी खुद हत्या न हो
जाए। ऐसे ही हत्यारों को अखाड़ा बनी इस समय की भारतीय राजनीति, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, उत्तरधुनिकता की आंधियों में खुद को सुरक्षित पाती है। उसे जनता से
खतरा ही महसूस नहीं होता। उसे लगता है जनता गहरे नशे में सो रही है। बौद्धिक,
कवि, रचनाकर इस जनता को जगाना चाहते हैं,
तो उनकी हत्या कर दी जाती है। और आज के राजनीतिक भक्त
बुद्धिजीवियों को गरियाने में अपनी भलाई समझ रहे हैं।"(फेसबुक वाल से)
शैलेन्द्र हिंदी और तुलनात्मक साहित्य विभाग, वर्धा के
गंभीर अध्येता हैं। अपने समय, समाज, राजनीति और साहित्य पर सुचिंतित समझ रखने वाले शैलेन्द्र के लेखन में
आप मौजूदा संघर्ष की आहट महसूस कर सकते हैं। “हमें जवाबों से भटकाया जा रहा है। यह
रियाज भर है- कुंठा की ओर लौटो, तप की ओर लौटो, पौराणिक जहालत की ओर लौटो। लौटो कि जैसे कुछ नहीं बदला, जैसे तुम दर्द की हद से गुजर चुके हो, लौटो और
शहंशाह से कह दो हमें दवा में दर्द चाहिए।"(जनसत्ता, दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना) अपने समय, समाज, राजनीति और साहित्य पर गंभीर समझ रखने
वाले शैलेन्द्र जब आदिवासी कविता की युवा आवाज जसिन्ता केरकेट्टा को सुनते हैं तो
जसिन्ता की कविताओं के बारे में उनकी क्या समझ बनती है, वे
जसिन्ता की कविताओं को कहाँ पाते हैं? आइये देखते हैं एक
युवा आलोचक जसिन्ता केरकेट्टा की कविताओं की पड़ताल किस तरह करता है---
भूख की आग पर तपती हुई कविता
भूख की आग पर तपती हुई कविता
आज की कविता घायल शांति की निर्मम
हूक है। कराह से बाहर निकल चेतना से चौकन्ना करती, वार झेलती हुई,
प्रतिपक्ष पर निर्णायक भूमिका में खड़ी है आज की कविता। आज कविता का रास्ता कठिन
जरूर हुआ है लेकिन संवेदना और बौद्धिकता के स्तर पर कविता अपनी भरपूर ज़िम्मेदारी
निभा रही है। कविता का काम है चेताना। आज कविता के कई महत्वपूर्ण तेवर दिखाई दे
रहे हैं जिसमें स्त्री, दलित, आदिवासी
स्वर अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करावा रहे हैं। आज कविता का मायर बदल रहा है। इस
बदलते मायर की एक युवा आवाज हैं- जसिन्ता केरकेट्टा। जसिन्ता
की कविताएं आदिवासी जलवायु की उपज हैं। कविताओं में अनगढ़ता किसी गढ़ी हुई पच्चीकारी
की शिकार नहीं। हाल में ही उनका कविता संग्रह ‘अंगोर’ हिंदी और अंग्रेजी भाषा में एक साथ छप कर आया है। उनका यह संग्रह जर्मन
में Glut नाम से साथ में ही प्रकाशित हुआ है। जर्मनी में
उनकी कविताओं को खूब सराहा जा रहा है।
जसिन्ता
झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जनपद में सारंडा जंगल से सटे झारखंड व ओड़ीसा की सीमा पर
स्थित मनोहरपुर प्रखण्ड के खुदपोस गाँव से हैं। वह खाँटी आदिवासी जीवन संघर्षों की
जीवट युवती हैं। उनकी कविता इसी कांतार प्रदेश की माटी से जन्मी है, इन्हें अपनी तासीर
पता है। जसिन्ता पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। 2014 में आदिवासियों के
स्थानीय संघर्ष पर उनकी एक रिपोर्ट पर बतौर आदिवासी महिला पत्रकार उन्हें इंडिजिनस
वायस ऑफ एशिया का रिक्गनिशन अवार्ड, एशिया इंडिजिनस पीपुल्स
पैक्ट, थाईलैंड की ओर से दिया गया और उसी वर्ष विश्व आदिवासी
दिवस के अवसर पर झारखंड इंडिजिनस पीपुल्स फोरम की ओर से उन्हें कविताओं के लिए
सम्मानित किया गया। 2015 में उन्हें रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार
दिया गया। अभी हाल में ही में जर्मनी में उनका कविताओं के साथ सम्मान किया गया।
उनकी कविता अपनी मिजाज के अनुरूप अपनी शानदार पहचान बना रही हैं।
जसिन्ता
कविता की समाजशास्त्रीय परिभाषिकता पर यकीन करती नजर आती हैं। वह कविता में
आत्मपरकता को भाषिक संरचना के साथ समाजिकता के गहरे बोध तक ले जाती हैं। उनकी
आत्मपरकता वैयक्तिक संक्रिणता को तिरोहित कर एक सामूहिकता का स्वाभाविक गान रचती
है। कविता यह गवाही देती है कि कवि जीवंतता में खुद को एक समाज की उपज ही मानती है, उनकी कविताई उस
समाज की उपस्थिति को उसके स्वाभाविक तौर तरीकों पर ही, एक
फ़लक पर दर्ज करना अपना दायित्व-बोध अनुभव करती है। वह कविता के बारे में कहती हैं
और यह जो कहती हैं उसके प्रमाण उनकी कविता में जगह जगह मिलते रहते हैं, यह संघर्षों की एक लंबी यात्रा है जो उनकी वैचारिक सघनता में नैसर्गिक
प्रतिबद्धता को बनाए रखती है। वह कविता में कविता के बारे में लिखती हैं-
“कविता, भूख की आग पर
पकती हुई गुनगुनाती है,
और उठने लगती है एक साथ
कई घरों की आग
भूख के सारे कारणों के खिलाफ।”
यह पंक्तियाँ ‘भूख का आग बनाना’ शीर्षक से कविता की सबसे आख़िर की पंक्तियाँ हैं। इस कविता में पाँच
स्टेंजा हैं। माने यह पाँच सोपान की एक सीढ़ी है जिस पर आप मानसिक तौर पर जब उतरते
हैं तो इन पंक्तियों से भेंट होती है। अब कविता का पहला स्टेंजा देखें तो कविता के
स्वास्थ्य पर सुचिंतित हो सकते हैं- “भूख जब आग बन रही हो/ तब डिग्रियाँ चुपचाप
उठकर/ उस आग की ओर चल देती हैं/ और कागज पर उतरने से पहले/ स्याही की देह, घुलने लगती है/ किसी गहरी चिंता में।” कविता का पहला पद कवि की वैयक्तिक-समाजिकता
का बोधक बन आया है जिसमें स्याही की देह का रूप निजता की महान सलिलता, कोमलता, तरलता अपने निशान छोडती आगे बढ़ती हैं। ये
निशान कविता में अपनी स्वाभाविकता से स्पष्ट अपने प्रतिरोध और संघर्ष को जिंदा
संस्कृति में रचते रहेंगे। यह जो अखंड निजता स्याही की देह के रूप में घुलती नजर
आई थी यह कविता की आखिरी पंक्ति को पैदा करती है। याने सवाल और सिर्फ सवाल ही नहीं
यहाँ तो निष्कर्ष है, सवाल यहाँ निढाल हो जाते हैं। कविता की
आखिरी पंक्ति शर्मिंदा सवालों के मुह पर लिखी हुई नसीहत लगती है। ‘भूख के सारे कारणों के खिलाफ’। यह वैयक्तिकता-समाजिकता
की सामाजिक-वैयक्तिकता की ओर अनवरत यात्रा है।
भूख
एक शारीरिक आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति प्राकृतिक परिस्थिति से उपजती है।
यह उपज अपनी संरचना में सतत समाजिकता के संबंध बनाती है। इस संबंध को बयान करती
हैं ये पंक्तियाँ “तब एक दिन/ उठती है कहीं/ कुरथी की दाल की लहक/ पत्ते में
लिपटी/ रोटी से राख की महक/ और बदल जाती है कविता में।” यहाँ भूख का आग में बदलना
और कविता होना एक जटिल यात्रा तक पहुँचना है। तुलसी के एक छंद से जोड़ कर देखने से
स्पष्ट होता है, ‘द्वारे से ललात बिललात द्वार द्वार दीन/ जानत हौं
चारि फल चारि ही चनक को।’ फिर कहते हैं ‘आगि बड़वागि से बड़ी है आगि पेट की’। ‘समय’, ‘प्रजाति’ और युग का दर्शन, के भेद हैं। यहाँ तुलसी का समय और
समाज जसिन्ता के समय और समाज से अलग है। परिस्थितियाँ बदली हैं लेकिन भूख वही है।
जसिन्ता भूख को समाजिकता का जामा देती हैं, उसे आगे ले जाती
हैं। बदलाव और परिस्थितियों में कारण खोजती हैं। वह सवाल नहीं दागतीं वह उत्तरों
से संवाद करती हैं। तुलसी अपनी भूख के बारे में लिखते हैं लेकिन इसमें भी सामाजिक
परिस्थितियाँ हैं, जिसमें उनकी तड़प बोलती है, यह तड़प भी समाज में प्रासंगिक है लेकिन जसिन्ता की भूख उनके उस आदिवासी
समाज की भूख है जिससे उसके हिस्से का भोजन साज़िशों का शिकार हुआ है, उस समाज से उसका परिवेश छीना जा रहा है, उससे उसके
प्रकृतिक परंपरागत संसाधन छीने जा रहे हैं, उन्हें गोलियों
से मारा जा रहा है, उनके जंगल काटे जा रहे हैं, उनके घर छीने जा रहे हैं, उनका बलात्कार हो रहा है।
वह लड़ रहे हैं अपने जिंदा रहने के लिए, उनमें जिंदगी की भूख
है। यह भूख एक-दो रात भूखे सोने की ‘भूख’ नहीं। जसिन्ता कविता में भूख के सारे कारण तलाशती हैं, यह काम निहायत खतरनाक है, वह संवेदना के रास्ते
कविता का रास्ता चुनती हैं। उनके यहाँ कविता मनोहारिणी,
शांति देने वाली, रससिक्त कर देने वाले मिजाज से कोसों दूर
जिंदगी जीने की हूक है, संघर्ष के पथ पर अन्याय से लहूलुहान प्रतिरोध में सार्थक चीख है, उनके यहाँ कविता का मतलब एक ईमानदार प्रतिरोध को खुद में एक ताकत की तरह
महसूस करना है।
जसिन्ता के कविता संग्रह का नाम ‘अंगोर’ है। अंगोर एक बिम्ब के रूप में सारी कविताओं को सजगता से बांधे हुये
दिखता है। इन कविताओं की जो मेन थीम है उसमें अंगोर प्रतिकात्मक अलख के रूप में
प्रतिनिधित्व करता दिखता है। इस किताब के परिशिष्ट में इसे व्याख्यायित किया गया
है। “छोटा नागपुर की कई आदिवासी बोलियों में हिंदी शब्द ‘अंगार’ के बदले ‘अंगोर’ का प्रयोग
किया जाता है। साहित्य चर्चा में ‘अंगार’ अंगार का प्रतीकात्मक संबंध विरोध अथवा विद्रोह के साथ समझा जाता है, परंतु आदिवासी संदर्भ में ‘अंगोर’ का अतिरिक्त तात्पर्य है, शोषण और अत्याचार के
विरुद्ध दबी हुई चिंगारी। आदिवासी स्त्रियाँ अपना चूल्हा जलाने के लिए पड़ोस के
दूसरे घर से अंगोर लेकर आती हैं। यह विपरीत परिस्थितियों में उनकी एकजुटता का
प्रतीक है।” यह एक सघन परंपरा है जिसमें समूहिक सम्बन्धों की एक जंजीर दिखती है।
यह जंजीर अपनी प्रतत्येक कड़ी में समूह और समुदाय की धनात्मक आवृत्ति को सतत पुष्ट
करती रहती है। आदिवासी समाज अपने आदिम मूल्यों को अपनी देशज संस्कृति में सँजोये
हुये है। यह ‘संस्कृतिकरण’ के कोई
महिमामंडन की चीज नहीं यह उनकी आवश्यकता है। उनके जीवन-निर्वाह में जो संसाधन
प्रासंगिक है उनकी आवश्यकता उन्हें है, उनका वह अपने परिवेश
में इस्तेमाल करते हैं। उनके रहन-सहन में जब स्वाभाविक परिवर्तन होगा तो यह
सामाजिक तत्व प्रभावित होंगे, तब तक यह जिंदा रहेंगे। आज
आदिवासी समाज और शहरी समाज के बीच टकराहट दिखाई देती है। इस टकराहट के पीछे
वर्चस्व या संप्रभुता हावी होती जा रही है। यह हावी होती संप्रभुता अपने
अर्थ-तंत्र के लोलुप विस्तार के लिए आदिवासियों के प्रकृतिक ठिकानों का भरपूर शोषण
करती है। आज जो साम्राज्यवाद की कट्टरता के रूप में अमरीका का रुख छोटे-छोटे इराक सरीखे देशों की तरफ है वैसे ही
और उससे बदतर कट्टर रुख भारत की वर्चस्वशाली सत्ता का उसके ही देश में बसे आदिवासी
इलाकों पर है। अपने ही देश में रह रहे इन समूहों के लोगों को बेरहमी से उनके ठिकानों
से निकाला जा रहा है, क्योंकि वहाँ खनिज संपदाएँ हैं जिनका
दोहन करना सत्ता का आधिकारिक कर्म है। गुमनाम गांवों के उदास खंडहरों में इन
क्षेत्रों को बदला जा रहा है। जसिन्ता की कविता में इस दर्द के भयानक निशान दिखाई
देते हैं। “गुमनाम गाँव/ जिसने कभी देखी नहीं/बाहर की
दुनिया/ साँसे चलती हैं जहां/ अंधेरे में चुपचाप/छोडती हैं देह का साथ/ कत्ल होकर
गुमनाम/ बह जाती है लाश बन/ लाल नदी में कहीं/ सारंडा के उन्हीं जंगलों में/ बेखौफ
घूमते फिरते हैं/ कुछ शाही रथ/ सिर्फ चंद चिन्हित गांवों में/ छोड़ने के पहले अपनी
छाप/ मिटते हैं शेरों के निशान/ और फिर कोड़ते हैं/ पहाड़ों पर दबे लौह युगों को/
मगर ढूंढ नहीं पते युगों से घायल/ सैकड़ों गुमनाम गांवों का पता।” यह उजाड़ एकदम आसानी से नहीं हो रहा है। आदिवासी अपनी तरह से सतत
संघर्षशील लड़ते हुये भयंकर निर्मम शक्तियों के सामने शहीद होते रहे हैं। वह अपनी
परंपरागत तौर-तरीकों से अपनी अस्मिता को बचाने के किए लड़ते आए हैं। जसिन्ता की कविता गहन उधेड़बुन
करती हुई सभ्यता और संस्कृति की पोल खोलती हैं। एक तरफ देश की देशज स्वाभाविक
संस्कृति है तो दूसरी तरफ सत्ता की लोलुपता में जीभ लपलपाती,
शिष्टता का ढोंग बनाए, रंगी हुई और दोगली वृत्ति है जिसे
संस्कृति की दावेदारी से नवाजा जा रहा है। यहाँ संस्कृति ठेकेदारी की बेहूदी ठसक
लिए साम्राज्यवादी मिजाज से सामंती पूंजीवादी मानसिकता से गलबहियाँ कर रही है।
जसिन्ता इस साजिश को अपनी कविता में बेनकाब करती हुई, अंगोर
जैसे खाँटी देशज बिम्ब को पक्षधरता के रूपक में ढालती हैं। अंगोर कविता ही देखिये-
“शहर का अंगार
जलता है, जलाता है
फिर राख हो जाता है
गाँव के अंगोर
एक चूल्हे से
जाते हैं दूसरे चूल्हे तक
और सभी चूल्हे सुलग उठाते हैं।”
क्या है शहर का अंगार! कविता सवाल
नहीं सभ्यता की दुर्घटना के संस्कृतिकरण के वहम को चकनाचूर कर देने वाले नकाब-पोष
कारकों को नग्न करती है। शहर का अंगार सनसनीखेज बवंडर है जो जनता की मति को मार कर
गलत से गलत निर्णय के लिए छंभंगुर लोभ में उसे फंसा ले जाता है और फिर देखते ही
देखते जनता की सारी उम्मीदों पर बलात्कृत-अश्लीलता का खेल आड़ में बैठ कर खेलता है और मैदान अपने अंधकार को
ओढ़ कर कोढ़ी होते रहते हैं। शहर क्या है यह सोचेंगे तो एक परजीवी याने शोषण और
साज़िशों पर टिका हुआ एक सत्ताधारी ऐयास वर्ग का झमेला सामने दिखेगा। यह खेती नहीं
करता लेकिन खेत की सबसे बेहतरीन फसल का भोग लगता है। यह बागवानी नहीं करता लेकिन
सबसे लजीज फल यही खाता है। यह ईंट-भट्ठों पर काम नहीं करता, मजदूरों से घोर
घृणा करता है लेकिन आलीशान इमारतों में रहता है। आखिर ऐसा क्या है जो यह करता है? वह इतना मानवता मूलक है कि संसार की सबसे सुविधा सम्पन्न वस्तुओं पर इसी
वर्ग का एकाधिकार है? आप सोचेंगे तो इस कविता की यह
पंक्तियाँ समझ में आएँगी ‘शहर का अंगार/ जलता है जलाता है/
फिर राख हो जाता है।’ याने यह एक साजिश है, भ्रम है, शोषण का हथियार है। लेकिन गाँव का अंगोर
शृंखलाबद्ध स्वाभाविक प्रतिबद्धता का सृजनात्मक प्रतीक है। यहाँ प्रत्येक घटक
एक-दूसरे से सहज सम्बद्ध दिखाई देता है। यहाँ भ्रम नहीं स्वाभाविक सत्यता है। यह
वर्ग-संघर्ष की जटिल होती संरचना को एक बिम्ब के माध्यम से कविता में उपस्थित किया
गया है।
भूमंडलीकरण के दौर में समय की जटिलता और सामाजिक संरचना में प्रभुसत्ता की खतरनाक साजिशें जीवन को एक दुरूह युग में ले आई हैं। इसका परिणाम अपनी भयावहता के रूप में लगातार सामने आता रहता है। एक तरफ स्वाभाविक विकास को रोक कर बनावटी ढोंग के मुलम्मे को प्रचारित किया जा है। यह साम्राज्यवाद का पूंजीवादी हितों के साथ राष्ट्रवाद की खाल में जनता के मध्यवर्ग को चकमा देना है, और निम्नवर्ग का भरपूर शोषण करना है। आज निम्नवर्ग जो आदिवासी इलाकों में बसता है वहाँ से जो जिंदा आवाज आ रही है उसे मध्यवर्ग को सुनना चाहिए, यह आवाज उनके भी हित में है। एक चेतावनी देती आवाज-
भूमंडलीकरण के दौर में समय की जटिलता और सामाजिक संरचना में प्रभुसत्ता की खतरनाक साजिशें जीवन को एक दुरूह युग में ले आई हैं। इसका परिणाम अपनी भयावहता के रूप में लगातार सामने आता रहता है। एक तरफ स्वाभाविक विकास को रोक कर बनावटी ढोंग के मुलम्मे को प्रचारित किया जा है। यह साम्राज्यवाद का पूंजीवादी हितों के साथ राष्ट्रवाद की खाल में जनता के मध्यवर्ग को चकमा देना है, और निम्नवर्ग का भरपूर शोषण करना है। आज निम्नवर्ग जो आदिवासी इलाकों में बसता है वहाँ से जो जिंदा आवाज आ रही है उसे मध्यवर्ग को सुनना चाहिए, यह आवाज उनके भी हित में है। एक चेतावनी देती आवाज-
भूमंडलीकरण के दौर में समय की जटिलता और सामाजिक संरचना में प्रभुसत्ता की खतरनाक साजिशें जीवन को एक दुरूह युग में ले आई हैं। इसका परिणाम अपनी भयावहता के रूप में लगातार सामने आता रहता है। एक तरफ स्वाभाविक विकास को रोक कर बनावटी ढोंग के मुलम्मे को प्रचारित किया जा है। यह साम्राज्यवाद का पूंजीवादी हितों के साथ राष्ट्रवाद की खाल में जनता के मध्यवर्ग को चकमा देना है, और निम्नवर्ग का भरपूर शोषण करना है। आज निम्नवर्ग जो आदिवासी इलाकों में बसता है वहाँ से जो जिंदा आवाज आ रही है उसे मध्यवर्ग को सुनना चाहिए, यह आवाज उनके भी हित में है। एक चेतावनी देती आवाज-
“मुट्ठी भर दाना
बचा रहे पृथ्वी पर
इसलिए भूसा ओसाने
खड़ा है हर गाँव
गर्म हवाओं के खिलाफ
खलिहान में सूप लेकर।”
यह है इस आवाज की ताकत। जो दिशा
विहीन हवाओं के बवंडर के खिलाफ लड़ रहा है, और इसलिए कि मुट्ठी भर दाना बचा रहे पृथ्वी
पर। क्योकि यह दाना ही इस भूतल पर जीवन का बीज है। जीवन को जहां संचित किया जाता है
वहीं उसके खिलाफ उसी की ताकत पर जिंदा रहने वाला वर्ग उसे ही निपटाने के लिए
लगातार प्रयत्नरत है। विकास के बनावटी बवंडर में असली देश कहाँ है यह चेताती है कविता।
एक ऐसी ही कविता और है शहर से संवाद की, देखें –
“भागते हुये छोड़कर अपना घर
पुआल, मिट्टी और खपरे
पूछते हैं अक्सर
ओ शहर !
क्या तुम कभी उजड़ते हो
किसी विकास के नाम पर ?”
यह एक संजीदा सवाल है जो उजड़ते
हुये एक-एक कर पूछते रहते हैं आदिवासी इलाकों के गाँव। यह है हमारे विकास का मॉडल, जो उजाड़ तो करता
है लेकिन उजाड़ की भरपाई की कोई ज़िम्मेदारी इनकी नहीं, एक
अपार त्रशाद पीड़ा लिए, दर-दर भटकने को मजबूर ये लोग शहरों
में कचरों के ढूह पर कबाड़ बीन का बेहद दरिद्र जीवन जीने को मजबूर होते हैं। हमारा
सिस्टम इस तरफ नजर उठा कर भी नहीं देखना चाहता। जसिन्ता इन सवालों से जूझती हुई, कविता में इसके कारणों को बेनकाब करती दिखाई देती हैं।
जसिन्ता
अपनी कविता में उन हूलों की सहादत भी याद करती हैं जो शोषण पर टिकी व्यवस्था से
सतत संघर्ष करते हुये शहीद हुये। उनकी टीस की संवेदना इतनी गहरी है कि साधारण पाठक
का हृदय कचोट जाता है । जसिन्ता कविता को अपने इतिहास की ताकत देती हैं। वह भावना
में बह कर विलाप नहीं करती, वह सिस्टम से संवाद करती हैं, जवाब देती हैं, शोषण की सारी नीतियों की नग्ननता को वह खोलती हैं। वह स्पष्ट करती हैं कि
कविता को कविता हम किस लिए कहें। उनकी कविता कहाँ से उपजती है, कविता के इस अंश को पढ़ कर महसूस कीजिये-
“उसके छटपटाते पैर के अंगूठे
टकराए थे मेरे सीने से
ठीक वहीं जहां मेरा कलेजा धड़कता है
वहीं से आज भी रिसता है खून
हूल-हूल पुकारता हुआ ।” · शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
शोध-छात्र-हिंदी एवं तुलनात्मक
साहित्य विभाग
म.गां.अं.हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)
मो.7057467780
ईमेल- shailendrashukla.mgahv@gmail.com 


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